दिल्ली में गरमा-गरम बहसों का केंद्र थे समाजवादी मधु लिमये

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विवेक शुक्ल

समाजवादी चिंतक, स्वतंत्रता सेनानी, संसदीय योद्धा और निर्भीक लेखक मधु लिमये के बहुत सारे मित्र और साथी आज (1 मई) को उन्हें उनकी जयंती पर याद कर रहे हैं. राजधानी में आज हिन्दी भवन में बहुत सारे उनके प्रशंसक जुटेंगे. राम मनोहर लोहिया के सच्चे अनुयायी लिमये ने गोवा मुक्ति आंदोलन में सत्याग्रह किया, जेल गए, इमरजेंसी का विरोध किया और जनता पार्टी के प्रयोग में अहम भूमिका निभाई. लेकिन उनकी विरासत सिर्फ सड़कों, संसद और जेलों तक सीमित नहीं थी. दिल्ली के वेस्टर्न कोर्ट और पंडारा पार्क (पंडारा रोड) वाले उनके घर राजनीतिक-बौद्धिक चर्चाओं के जीवंत केंद्र बने रहे, जहां रोजाना डीयू (दिल्ली विश्वविद्यालय), जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) के छात्र, लेखक, पत्रकार, राजनीतिक कार्यकर्ता और विचारक इकट्ठा होते थे.

दिल्ली आगमन और राजनीतिक गतिविधियों वाला घर

महाराष्ट्र के पुणे के रहने वाले मधु लिमये के लिए दिल्ली 1960 के दशक में राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना. उन्होंने बिहार के मुंगेर और बांका से लोकसभा का चुनाव लड़ा और चार बार संसद पहुंचे. लेकिन राजनीति से हटकर भी उनका घर हमेशा खुला रहा. मधु लिमये के साथ लंबे समय सड़कों पर संघर्ष करने वाले रामजस कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉक्टर राजकुमार जैन बताते हैं कि जनपथ के वेस्टर्न कोर्ट में उनका एक कमरे का फ्लैट दशकों राजनीतिक चर्चाओं से गूंजा करता था. उनका पंडारा पार्क का घर भी इसी तरह का केंद्र था. इन घरों में शाम होते ही युवा और बुजुर्ग चेहरों की भीड़ जुट जाती थी. कोई किताब लेकर आता, कोई समसामयिक मुद्दे पर बहस करने, कोई सलाह लेने. लिमये जी की पत्नी चंपा लिमये भी इन चर्चाओं में सक्रिय रहतीं थीं. वो सबको चाय पिलाती. उनके घर में फ्रीज तक नहीं था. एससी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. अतिथियों को घड़े से पानी पिलाया जाता था.

मधु जी के घर में होने वाली बैठकें औपचारिक नहीं होती थीं. चाय की चुस्कियों के साथ अनौपचारिक संवाद चलता. लिमये जी की गहन ज्ञान-भंडार, तीखी टिप्पणियां और सवाल-जवाब की शैली सबको को आकर्षित करती थी. वे गांधी, लोहिया, आंबेडकर, नेहरू और मार्क्सवाद पर गहराई से चर्चा करते. छात्र सवाल पूछते,समाजवाद आज के भारत में कैसे लागू होगा? जाति-विरोधी संघर्ष क्या रूप ले? इमरजेंसी जैसे संकटों से लोकतंत्र कैसे बचे? लिमये जी के जवाब हमेशा तथ्यों, इतिहास और नैतिकता पर आधारित होता. वे कहते कि राजनीति नैतिकता का क्षेत्र है, न कि सत्ता का खेल.

बिहार के नब्ज की पकड़ 

मधु लिमये जब बिहारियों के भोजन प्रेम पर बोलते तो लगता था कि ना तो उनसे अधिक बिहार को कोई जानता है और ना ही बिहारियों से सच्चा कोई भोजन प्रेमी होगा. मूल रूप से महाराष्ट्र से संबंध रखने वाले मधु लिमये दो बार बिहार से लोकसभा पहुंचे थे. जाहिर है, वे बिहार के समाज और भूगोल को कायदे से जानते-समझते थे. एक बार चर्चा ने रुख ले लिया बिहारियों के भोजन प्रेम का. अब मधु जी बताने लगे कि बिहारी भोजन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों को लेकर बहुत सेंसटिव होते हैं. वह एक बार खाने लगते हैं तो फिर तबीयत से भोजन के साथ इंसाफ करते हैं. मधु लिमये बताते थे कि बिहारियों की मिष्ठान के प्रति आस्था अटूट और निविर्वाद होती है. उनका दावा था कि आपको शायद ही कभी कोई बिहारी मिले जिसकी मिठाई कमजोरी ना हो. बिहार की शादियों में विवाद का प्राय: कारण भोजन की मात्रा और मिष्ठान की गुणवत्ता को लेकर ही होता है.

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मधु लिमये ने एक बताया था कि गर्मियों में बिहारी को लगातार मीठे आम मिल जाएं तो वह तृप्त हो जाता है. इसी क्रम में वे जर्दालु आम के स्वाद पर बोले थे. उन्होंने बताया था कि  जर्दालु आम का स्वाद और खुशबू अद्वितीय होती है. इसकी फसल चंपारण क्षेत्र में होती है. इसके बारे में बिहार के बाहर के लोगों को लगभग कोई जानकारी नहीं है. बिहार में कई स्थानों पर जर्दालु आम खाने की प्रतियोगिताएं भी होती हैं. वहां का मंजर कमाल का होता है. थाली में दर्जनों आम और बगल में छिलकों का ढेर. कुर्सी पर बैठे कई लोग और सबके मन में एक ही उद्देश्य, जितना अधिक से अधिक आम खाया जा सके. इसमें सैकड़ों प्रतियोगी भाग लेते हैं.

शास्त्रीय संगीत के शौकीन मधु लिमये

मधु लिमये शास्त्रीय संगीत के बहुत शौकीन थे. जब कभी राजनीति से दुःखी और व्याकुल होते थे तो संगीत में अपना मन लगाते थे. भीम सेन जोशी, कुमार गंधर्व, पंडित जसराज, किशोरी आमोनकर शायद ही उस ज़माने का कोई ऐसा गायक होगा जिसका प्रोग्राम सुनने के लिए वे ना जाते हों. उस ज़माने के जितने भी प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक थे, वह सब भी उनको जानते थे और उनका आदर करते थे. मधु लिमये को अपना आदर्श मानने वाले दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हरीश खन्ना बताते हैं कि उन्हें उनके साथ इस तरह के कार्यक्रमों में जाने का सौभाग्य मिला.वे अपने उसूलों के पक्के थे. कभी भी सत्ता का मोह उन्हें विचलित नहीं कर सका. सादगी इतनी कि गाड़ी,बंगला,टीवी,फ्रिज, कूलर कुछ भी नहीं था उनके पास. सच्चे गांधीवादी और उनके आदर्शों पर चलने वाले.

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डीयू और जेएनयू के छात्र इन घरों के नियमित आगंतुक थे. 1970-80 के दशक में जेएनयू वामपंथी और समाजवादी विचारों का गढ़ था. लिमये जी के घर में  समाजवादी और लोकतांत्रिक विचारों की टकराहट होती थी, लेकिन सम्मानपूर्वक. छात्र अपने शोध-पत्र, थीसिस या आंदोलनों की कहानियां सुनाते. लिमये जी उन्हें पुस्तकें सुझाते, ऐतिहासिक संदर्भ देते और कभी-कभी आलोचना भी. कई छात्र बाद में पत्रकार, अकादमिक या राजनीतिक कार्यकर्ता बने, जिनमें लिमये जी की छाप साफ दिखती.

लेखक और पत्रकार भी आते. लिमये जी स्वयं 60 से अधिक पुस्तकें लिख चुके थे,जनता पार्टी एक्सपेरिमेंट, लिमिट्स टू अथॉरिटी, पार्लियामेंट, ज्यूडिशरी एंड पार्टीज जैसी रचनाएं. वे युवा लेखकों को प्रोत्साहित करते और उनके लेखों पर फीडबैक देते थे. राजनीतिक कार्यकर्ता-खासकर समाजवादी और जनता पार्टी से जुड़े-रणनीति, संगठन और नैतिक मुद्दों पर चर्चा करते. लिमये जी का जोर हमेशा सिद्धांतों पर अडिग रहने का होता.वे दोहरी सदस्यता (जनता पार्टी में आरएसएस से जुड़े लोगों) के खिलाफ थे. इसी विवाद ने जनता पार्टी की सरकार गिराई थी, लेकिन सिद्धांत की कीमत पर समझौता नहीं किया.

दिल्ली के एक छोटे से घर में बिताया बड़ा समय

इमरजेंसी (1975-77) के दौरान लिमये जी जेल गए, लेकिन बाहर आने के बाद घर फिर से सक्रिय हो गए. साल 1982 में सक्रिय राजनीति से संन्यास के बाद वेस्टर्न कोर्ट का छोटा सा कमरा उनका मुख्य कार्यस्थल बना, जहां पढ़ाई-लिखाई और मुलाकातें जारी रहीं.

उनके घर में होने वाली चर्चाएं बहुआयामी होतीं थीं. इनमें मुख्य विषय होते थे- समाजवाद और लोकतंत्र,जाति और सामाजिक न्याय,संसदीय मूल्य,सांप्रदायिकता का खतरा,संवैधानिक मुद्दे वगैरह. ये बैठकें अक्सर रात आठ बजे तक चलतीं थीं. लिमये जी का व्यक्तित्व सादा था. कोई दिखावा नहीं, सिर्फ ज्ञान और उत्साह. छात्रों को वे 'युवजन' कहकर संबोधित करते और उनकी ऊर्जा से खुद प्रेरित होते.

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मधु लिमये का निधन आठ जनवरी 1995 को दिल्ली में हुआ था. लेकिन उनके घरों की याद आज भी कई पुराने साथियों के जेहन में ताजा है. उन्होंने मंत्री पद ठुकराया, पेंशन अस्वीकार की और सादा जीवन जिया. आज जब राजनीति में सत्ता-केंद्रित संस्कृति हावी है, तब लिमये जी के घर जैसी अनौपचारिक बौद्धिक जगहों की कमी खलती है.

लिमये जी की जयंती पर इन घरों को याद करना सिर्फ स्मृति नहीं, प्रेरणा है. वे सिखाते हैं कि विचारों का मंच बनाना ही सच्ची राजनीति है.दिल्ली के इन दीवारों ने न सिर्फ चर्चाएं सुनीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए समाजवादी सपनों को सहेजा. आज के युवा अगर इन घरों की कहानी सुनें तो शायद नए मंच बना सकें, जहां बहस हो,विचार टकराएं और राष्ट्र का भविष्य गढ़ा जाए.

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डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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