भारत से ट्रेड डील के लिए क्यों तैयार हुआ अमेरिका, नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप कैसे बदल रहे हैं वर्ल्ड ऑर्डर

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डॉ. नीरज कुमार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में 80 साल से चली या रही वैश्विक व्यवस्था पर आक्रामक हैं. उनका मानना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा निर्मित वैश्विक व्यवस्था के ढांचे में 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' के उद्देश्य को पूरा नहीं किया जा सकता है. इसलिए अमेरिकी विदेश नीति में एक आक्रामकता और छटपटाहट दोनों एक साथ देखा जा सकता है. जो अमेरिका मुक्त व्यापार और नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था का प्रबल समर्थक था. आज वही हर रोज किसी ना किसी देश पर टैरिफ बढ़ाने कि घोषणा कर रहा है. यहां तक कि वह अब किसी देश की संप्रभुता का उल्लंघन करने से भी परहेज नहीं कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक बदलाव के दौर से गुजर रही है. अमेरिका और यूरोप अपने ऐतिहासिक साझेदारी को नजरंदाज कर संबंधों को फिर से परिभाषित कर रहे हैं. वहीं रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक ऐसी त्रिपक्षीय दुनिया चाहते हैं, जिसे मॉस्को, वॉशिंगटन और बीजिंग के साथ मिलकर आकार दे सकें.  शी जिनपिंग पूर्वी एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को पलटना चाहते हैं. वो चीनी विशेषताओं वाली विश्व व्यवस्था चाहते हैं. जबकि, भारत और ब्राजील जैसे देश एक बहुध्रुवीय दुनिया में ध्रुव बनना चाहते हैं, जो नियम आधारित व्यवस्था हो, जिसमें विकासशील देश स्वायत्तता कि गारंटी के साथ-साथ विकसित और विकासशील देश एक-दूसरे के विकास में पूर्णतः साझेदार हों. वहीं ट्रंप पुरानी व्यवस्था को एक हवाई किले कि कल्पना मानते हैं. उनका कहना है कि अमेरिका को अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति के इस्तेमाल में रोका नहीं जाना चाहिए और यह दिखाना है कि उसे रोका नहीं जाएगा. 

ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था में भारत अपने राष्ट्रीय हितों को कैसे साधता है. संयोग से भारत को नरेंद्र मोदी के रूप में एक कुशल और दूरदर्शी नेतृत्व मिल हुआ है. जिन्होंने अमेरिका के आक्रामक नीति को संतुलित करते हुए आखिरकार ट्रंप को भारत कि ओर झुकने पर मजबूर किया है. महाशक्तियों के साथ कोई टकराव किए बिना भारत को 2047 तक विकसित देश बनाना इस सरकार की विदेश और अर्थ नीति का मुख्य उद्देश्य है. अब सवाल यह उठता है कि नरेंद्र मोदी कैसे डोनाल्ड ट्रंप के साथ ट्रेड डील करने में सफल हुए. वह भी ऐसे समय जब ट्रंप बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों से भारत को नीच दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. 

मौन कूटनीति का प्रयोग

नरेंद्र मोदी ने अपने धैर्य और आत्मविश्वास के बल पर मौन कूटनीति का परिचय दिया. अमेरिका के लाख उकसावे के बाद भी उन्होंने किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच से डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना नहीं की. ट्रंप के बड़बोलेपन और अड़ियल रवैये को नजरअंदाज करते हुए मोदी ने अमेरिका के साथ लगातार संवाद बनाए रखा. उन्होंने भारत अमेरिका व्यापार समझौते के बाद कहा कि लोगों ने अमेरिकी टैरिफ के बाद हमारी भरपूर आलोचना की, लेकिन हमने धैर्य बनाए रखा, इसी का सकारात्मक परिणाम आज देश को मिला है. उन्होंने ये भी लिखा,''आत्मविश्वास वह शक्ति है, जिससे सब कुछ संभव है. देश के लोगों की यह शक्ति विकसित भारत के सपने को पूरा करने में काम आएगी."

इंडिया-ईयू ट्रेड डील का मास्टर स्ट्रोक

भारत ने जब यूरोपीय यूनियन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) किया तो विश्लेषकों ने उसे 'मदर ऑफ ऑल डील' कहा. इस डील के जरिए भारत ने अमेरिका को संदेश दिया किया कि अमेरिका के संरक्षणवादी नीतियों का विकल्प खोज लिया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने ट्रंप पर परोक्ष रूप से निशाना साधा, वैश्विक व्यवस्था में उथल-पुथल, बढ़ते संकट और बढ़ती अनिश्चितताओं का जिक्र किया. इन टिप्पणियों को बड़े पैमाने पर अमेरिका के हालिया रवैये की ओर इशारा माना गया. वहीं दूसरी ओर भारत इसी तरह के समझौतों को लेकर कनाडा, न्यूजीलैंड और ओमान से भी बातचीत कर रहा है.इससे ट्रंप को एहसास हुआ कि विश्व व्यापार संतुलन अब भारत कि ओर झुक रहा है. यही कारण है कि ट्रंप भारत कि ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए मजबूर हुए. 

भारत और यूरोपीय यूनियन ने 26 जनवरी को एक मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तखत किए थे.

ट्रेड डील से भारत को फायदा

पिछले साल के ट्रेड डेटा के मुताबिक भारत और अमेरिका ने 129.2 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार किया.यह भारत का किसी देश के साथ सबसे अधिक व्यापार है.वहीं भारत-चीन ने 127.7 अरब डॉलर का व्यापार किया. यह द्विपक्षीय बैलेंस शीट चीन के पक्ष में ज्यादा झुकी हुई है, क्योंकि भारत के साथ करीब 95 अरब डॉलर का ट्रेड डेफिसिट है. वहीं  अमेरिका के साथ भारत का ट्रेड बैलेंस कहीं ज्यादा बेहतर है. साल 2024 में भारत को अमेरिकी एक्सपोर्ट करीब 41 अरब डॉलर का था. जबकि तेल और ईंधन का हिस्सा, करीब 30 फीसदी या 13 अरब डॉलर का है. इसके बाद कीमती मोती और पत्थर हैं, जिनकी कीमत 5.16 अरब डॉलर है. भारत अमेरिका से न्यूक्लियर रिएक्टर के पार्ट्स, इलेक्ट्रिकल मशीनरी और उपकरण, और मेडिकल उपकरण भी इंपोर्ट करता है. साल 2024 में अमेरिका, जो भारत का सबसे बड़ा बाजार है, उसे भारतीय एक्सपोर्ट करीब  87 अरब डॉलर का था. इसमें मोती, इलेक्ट्रिकल मशीनरी और फार्मास्युटिकल उत्पाद प्रमुख थे. 

अमेरिका भारतीय सामान पर 18 फीसदी का टैरिफ लगाएगा. वहीं अमेरिका भारत के प्रतिद्वंद्वी पड़ोसियों जैसे पाकिस्तान (19 फीसदी), बांग्लादेश और वियतनाम (20 फीसदी) और चीन (34 फीसदी) से बेहतर स्थिति में रखता है. हालांकि भारत के करीब सभी पड़ोसी अमेरिका के जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज रियायत के लाभार्थी हैं. इसके तहत अमेरिका विकासशील देशों से चुने हुए सामान के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए ड्यूटी-फ्री इंट्री देता है.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना बेहतरीन दोस्त बताते रहे हैं.

भारत-अमेरिका संबंधों का नया चरण

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप और मोदी के सार्वजनिक बयान संबंधों में एक बड़ी नरमी का संकेत देते हैं, जो पिछले साल जनवरी में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद ठंडे पड़ गए थे. तनाव के कारणों में अमेरिका में भारतीय प्रवासियों के साथ व्यवहार, अमेरिका के H-1B वर्कर वीज़ा के लिए फीस में भारी बढ़ोतरी, भारत द्वारा रूसी तेल की लगातार खरीद और रुकी हुई व्यापार वार्ता शामिल हैं. ट्रंप ने पिछले साल मई में पाकिस्तान के खिलाफ भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' में युद्ध विराम कराने का दावा कई बार किया. इसके बाद से पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति की भूमिका की सराहना की और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया. वहीं भारत ने इस बात से इनकार किया कि ट्रंप ने कोई बड़ी भूमिका निभाई थी.

ट्रंप अपने घरेलू समर्थकों को यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि इससे एक बड़ी जीत हासिल हो रही है. वहीं दूसरी ओर मोदी के लिए भी यह दिखाना उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह अमेरिका के दबाव का सामना करने में सक्षम है. लेकिन इस ट्रेड के साथ ही एक नए चरण की शुरुआत हुई, जहां नेताओं के लिए कई चीजों पर स्पष्टता के साथ संबंध एक अलग रूप लेंगे. हालांकि, दोनों पक्षों के बीच, खासकर भारत के दृष्टिकोण से पूरी तरह से विश्वास बहाल करने में अभी भी समय लगेगा जैसे कि रूसी तेल की खरीद जैसे मुद्दे बने रहेंगे. क्योंकि, भारत रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों की भी रक्षा करने की कोशिश करेगा. लेकिन तमाम चुनौतियों के साथ इन छोटी-मोटी समस्याओं को हल करना आसान हो सकता है.

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(डिस्क्लेमर: डॉ नीरज कुमार बिहार के वैशाली स्थित सीवी रमन विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं. लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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