गांधी, गोडसे और चयनात्मक नैतिकता, क्या कहते हैं ऐतिहासिक तथ्य

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वैसे मेरी भाषा हिंदी है. मैं हिंदी में सोच, लिख यहां तक कि सपना भी हिंदी में ही देखता हूं. मगर कुछ दिन पहले प्रसिद्ध लेखक तथा कथाकार जावेद अख़्तर जी ने हिंदुस्तानी में एक भाषण दिया तो कोशिश कर रहा हूं, उनको समझ आ सके ऐसी भाषा में जवाब दूं.

जावेद अख्तर ने कहा क्या है

जावेद अख़्तर ने फ़रमाया कि 'गांधी को भी माला दी गई और गांधी मारने वाले को भी माला दी गई'. ये जुमला सुनने में बड़ा दिलकश लगा, बड़ा तराशा हुआ. ठीक वैसे ही जैसे उनकी नज़्मों में हर लफ़्ज़ अपनी जगह पर तौल कर बिठाया जाता है. दाद देनी होगी कि फ़िक़रा गढ़ने का हुनर उनसे बेहतर शायद ही किसी के पास हो. मगर उनसे इजाज़त लेकर एक बात अर्ज़ करुंगा कि तारीख़ स्क्रीनप्ले नहीं होती. जनाब, तारीख का कोई डायरेक्टर नहीं होता जो सीन को अपनी मर्ज़ी से एडिट कर दे. तारीख़ दर्ज होती है, कमीशन की रिपोर्टों में, गृह मंत्रालय की चिट्ठियों में, अदालत के फ़ैसलों में, अख़बारों के पीले पड़ चुके पन्नों में और जब उन दस्तावेज़ों की धूल झाड़ी जाती है तो ये ख़ूबसूरत जुमला अपने ही वज़न तले दब कर बैठ जाता है. तो एक-एक करके अदालत के कटघरे में खड़ा करते हैं वो पूरा उनका अंदाज़-ए-बयां. उनका ही इल्ज़ाम, उनकी ही तरतीब में मगर पूरी सख़्ती के साथ भी. तभी कहते है कि -फ़ैसला सुनाने से पहले कभी सुबूत भी मांग लिया कर, हर इल्ज़ाम को इतनी आसानी से सच मान लिया कर.

जिस लम्हे दिल्ली में गोली की आवाज़ गूंजी और गांधी जी का जिस्म ज़मीन पर गिरा, उसी लम्हे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवलकर सैकड़ों मील दूर चेन्नई में एक बैठक कर रहे थे. ख़बर पहुंचते ही उन्होंने जो पहला हुक्म दिया, वो जश्न का नहीं, मातम का था. देशभर की हर शाखा को तेरह दिन का शोक मनाने, हर कार्यक्रम स्थगित करने का हुक्म. अगली ही सुबह, 31 जनवरी 1948 को, गोलवलकर ने प्रधानमंत्री नेहरू और गृहमंत्री सरदार पटेल दोनों को अपने हाथ से शोक संदेश लिखा. यह किसी विजयी संगठन की भाषा नहीं, सोगवार की भाषा है.

आरएसएस पर कब लगी थी पाबंदी

फिर भी 2 फ़रवरी 1948 को गोलवलकर को गिरफ़्तार किया गया और 4 फ़रवरी को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया, वो भी एक ऐसे औपनिवेशिक बंगाल स्टेट प्रिज़नर्स एक्ट के तहत, जिसमें मुक़दमे की ज़हमत तक गवारा नहीं की गई. 17 हज़ार के क़रीब स्वयंसेवक बिना सुनवाई जेलों में ठूंस दिए गए और यह कोई संघ के अपने भोंपू का दावा नहीं बल्कि ख़ुद कांग्रेस के भीतर से क़बूल किया गया सच है. मध्य प्रांत के तत्कालीन गृहमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र ने अपनी आत्मकथा 'लिविंग इन एन एरा' में साफ़ लिखा कि गांधी हत्याकांड ने कुछ 'बेईमान राजनेताओं' को अपने राजनीतिक हरीफ़ों को कुचलने का सुनहरा मौक़ा दे दिया. नतीजा क्या निकला? जांच पूरी हुई, अदालत ने फ़ैसला सुनाया, गोडसे और आप्टे को हत्या का दोषी ठहराया गया, मगर संघ को बतौर संस्था किसी साज़िश में शरीक नहीं पाया गया. 16 महीने बाद, जुलाई 1949 में, प्रतिबंध बिना किसी शर्त के हटा लिया गया. अगर संघ ने सचमुच वो माला पहनाई होती जिसका जावेद साहब ज़िक्र कर रहे हैं, तो यह प्रतिबंध यूं बेशर्त हट ही नहीं सकता था.

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यह कोई संघ के दफ़्तर की किताब का दावा नहीं, यह रामचंद्र गुहा जैसे धुर पक्षपाती इतिहासकार अपनी मशहूर किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' में भी दर्ज करते हैं- गांधी जी 1934 में वर्धा के संघ शिविर में गए, स्वयंसेवकों के अनुशासन और जातिविहीन बर्ताव से बेहद मुतास्सिर हुए, हालांकि दूसरे मज़हबों के प्रति संघ के नज़रिए से पूरी तरह इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते थे. यह एक संतुलित, निष्पक्ष आलोचना थी, दुश्मनी नहीं और फिर बंटवारे के सबसे ख़ूनी दिनों में, 16 सितंबर 1947 को, यानी अपनी हत्या से महज़ चार महीने पहले, गांधी जी ख़ुद दिल्ली की वाल्मीकि बस्ती में पांच सौ स्वयंसेवकों के दरमियान गए और कहा, ''मैं वर्षों पहले आपके शिविर में गया था और मैं आपके अनुशासन, छुआछूत की मुकम्मल ग़ैर-मौजूदगी और सादगी से निहायत मुतास्सिर हुआ था.'' यह बयान कोई अफ़वाह नहीं, यह गांधी जी के अपने अख़बार 'हरिजन' के 28 सितंबर 1947 के अंक में सफ़ेद काग़ज़ पर काली स्याही से छपा मिलता है. जिस तंज़ीम को जावेद अख्तर हत्यारों का गिरोह ठहराना चाहते हैं, उसकी तारीफ़ में गांधी जी ख़ुद अपनी शहादत से चंद हफ़्ते पहले क़सीदे पढ़ रहे थे. वो कहते है ना जिसकी तारीफ़ ख़ुद मक़तूल की ज़ुबान से हुई हो, उसे क़ातिल ठहराने से पहले फिर सोचना ज़रूरी है.

गोडसे को देभभक्त बताना साध्वी को पड़ा भारी

अब ज़रा 2019 का पन्ना पलटते हैं, जब भाजपा की ही उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने गोडसे को 'देशभक्त' कह डाला. इसके बाद क्या हुआ, यह भी दर्ज है. ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने सरेआम कहा,''उन्होंने माफ़ी मांग ली है, यह अलग बात है, लेकिन मेरे दिल में मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं कर पाऊंगा.'' पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने फ़ौरन अनुशासनात्मक कार्रवाई का हुक्म दिया. प्रज्ञा ठाकुर को रक्षा मामलों की संसदीय सलाहकार समिति से बाहर किया गया और उन्हें सरेआम माफ़ीनामा पढ़ना पड़ा. यह किस चीज़ की तस्वीर है- किसी को माला पहनाने की या किसी को कटघरे में खड़ा करने की? हां, यह हक़ीक़त है कि हाशिये पर बैठे कुछ लोग, कहीं किसी मूर्ति पर फूल चढ़ाकर, कहीं कोई बदज़ुबानी करके, गोडसे का महिमामंडन करते रहे हैं. यह निंदनीय है, इसकी मुज़म्मत बिना किसी अगर-मगर के होनी चाहिए. लेकिन फ़र्क़ यही है, जावेद साहब, जब यह हुआ, तो सज़ा सत्ता के शिखर से आई. सवाल यह है, क्या उनकी पसंदीदा जमात में यह हिम्मत, यह फुर्ती, कभी नज़र आई?

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31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली की गलियों में जो हुआ, उसे ख़ुद दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने 2018 के फ़ैसले में 'मानवता के ख़िलाफ़ अपराध' क़रार दिया, सिर्फ़ दिल्ली में, महज़ चार दिनों में, 2,733 सिखों की हत्या. अदालत के अपने अल्फ़ाज़ थे कि इन जरायम के ज़्यादातर मुजरिमों को 'राजनीतिक संरक्षण' हासिल था और उन्हें बरसों इंसाफ़ से बचाया गया. सज्जन कुमार को मुजरिम ठहराए जाने में चौंतीस बरस लगे— 1984 से 2018 तक. इन 34 बरसों में वे कांग्रेस के भीतर ओहदेदार रहे, संसद की शोभा बढ़ाते रहे. जगदीश टाइटलर पर संगीन इल्ज़ाम लगे, फिर भी उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया गया. और ख़ुद राजीव गांधी ने, जो उसी हफ़्ते प्रधानमंत्री बने, उसी क़त्ल-ए-आम के हफ़्ते भर बाद खुले मंच से फ़रमाया, 'जब कोई बड़ा दरख़्त गिरता है, तो ज़मीन हिलती ही है.' यह जुमला हत्याओं की तौज़ीह है या नहीं, इसका फ़ैसला आप जैसे लफ़्ज़ों के जादूगर से बेहतर कौन कर सकता है? तो सवाल यह उठता है, जब गोडसे के चंद पैरोकारों की बात होती है तो पूरे हिंदू समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है. मगर जब बात 1984 की आती है, तो 'यह चंद लोगों का काम था' कहकर पूरी पार्टी, पूरा तंत्र बरी हो जाता है? माला दोनों तरफ़ बंटी थी, मगर जावेद साहब की निगाह सिर्फ़ एक ही सिम्त गई. ये भी उनका ही दोहरा मापदंड है कि हर दामन पर दाग़ है, कोई कम, कोई ज़्यादा, सिर्फ़ अपने हरीफ़ का दामन देखने का यह कैसा वाइज़ाना अंदाज़ है.

महात्मा गांधी पर उठते सवाल

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया गया, ठीक उसी दौर में जब गांधी-इरविन समझौते की स्याही सूख भी नहीं पाई थी. लाखों नौजवानों की चिट्ठियां, याचिकाएं, ख़ुद कई कांग्रेसी नेताओं का दबाव और सब इसी उम्मीद में था कि गांधी जी अपना प्रभाव इस्तेमाल करेंगे. यह इतिहास का एक ऐसा सवाल है जिस पर मुख़्तलिफ़ राय रखी जा सकती है — कुछ इतिहासकार गांधी जी की मजबूरियों को समझाते हैं, कुछ उनकी तन्क़ीद करते हैं. मगर जिस समाज ने यह सवाल दशकों तक उठाया, उसे कभी 'गांधी-विरोधी' या 'हत्यारों का हमदर्द' क़रार नहीं दिया गया. यह सवाल पूछना जायज़ था, है, और रहेगा — बिल्कुल वैसे ही जैसे 1948 में संघ के साथ जो हुआ, उस पर सवाल उठाना जायज़ है. जावेद अख्तर लफ़्ज़ों के उस्ताद हैं — उन्होंने 'शोले' और 'दीवार' जैसे संवाद रचे हैं जो तीन नस्लों की ज़ुबान पर आज भी ज़िंदा हैं. इस हुनर से इनकार किसे है? मगर एक ख़ूबसूरत जुमला और एक सच्ची तारीख़, दोनों अलग-अलग सल्तनतें हैं. एक तालियां बटोरती है, दूसरी जवाबदेही मांगती है. जिस दिन जावेद यह मान लेंगे कि तारीख़ किसी एक तरफ़ माला पहनाने और दूसरी तरफ़ फांसी का फंदा दिखाने का तमाशा नहीं, बल्कि हर विचारधारा, हर पार्टी के अपने दाग़ भी हैं और अपनी रोशनी भी, उस दिन शायद उनका फ़लसफ़ा ज़्यादा वज़नदार, ज़्यादा दियानतदार लगेगा.

तब तक, इतना अर्ज़ है

जिस सिम्त भी देखा, वहीं इल्ज़ाम था तेरा, अपने गिरेबान में झांकने का भी तो कोई मौसम हो.

तारीख़ को अदालत मत बनाओ अपनी मर्ज़ी की, वरना हर फ़ैसला एक दिन तुम्हारे ही ख़िलाफ़ भी हो.

(डिस्क्लेमर: लेखक राजनीतिक-सामाजिक टिप्पणीकार हैं और डॉ प्रशांत बर्थवाल दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं .इस लेख में व्यक्त विचार लेखकों के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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