फरवरी की हल्की गुलाबी ठंड, बाजारों में सजे लाल गुब्बारे, मोबाइल स्क्रीन पर तैरते दिल के इमोजी और 'रोज डे'से 'प्रपोज डे' तक चलने वाला सप्ताह. इन सबके बीच 14 फरवरी का 'वैलेंटाइन डे' आज की पीढ़ी के लिए प्रेम का सार्वजनिक उत्सव बन चुका है. इन दिनों में सोशल मीडिया पर LoveGoals, Situationship, Commitment Issues, Green Flag–Red Flag, Soulmate, Forever, Move On जैसी शब्दावलियां ट्रेंड करने लगती हैं. आज की पीढ़ी प्रेम को इमोजी, रील्स, डीएम और स्टेटस अपडेट के जरिए व्यक्त करती है. प्रेम का इज़हार अब केवल पत्रों या गुलाबों तक सीमित नहीं, बल्कि डिजिटल 'हार्ट' और 'रिलेशनशिप स्टेटस' तक फैल गया है. ऐसे समय में 'वैलेंटाइन डे' केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम की बदलती भाषा और संवेदना को समझने का अवसर भी है. डिजिटल और कामना आधारित पूंजीवादी समय में 'वैलेंटाइन डे' ने यह रूप अख्तियार कर लिया है. लेकिन प्रेम के इस दिवस का इतिहास तो आज की प्रेम की अवधारणा से अलग कहानी कहती है.
वैलेंटाइन डे का इतिहास: त्याग और करुणा की कथा
वैलेंटाइन डे के प्रारंभ का इतिहास देखें तो इसका संबंध तीसरी शताब्दी के रोमन साम्राज्य से जाकर जुड़ जाता है. सम्राट क्लॉडियस द्वितीय का मानना था कि अविवाहित पुरुष बेहतर सैनिक बनते हैं, इसलिए उसने युवाओं के विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया था. किंतु संत वैलेंटाइन ने प्रेम और विवाह को मानव का प्राकृतिक अधिकार मानते हुए गुप्त रूप से युवाओं का विवाह कराना जारी रखा. जब राजा को पता चला तो उसने 14 फरवरी को संत वैलेंटाइन को मृत्युदंड दे दिया. कहा यह भी जाता है कि जेल में रहते हुए उन्होंने जेलर की अंधी बेटी को आशीर्वाद दिया था, जिससे उसकी दृष्टि लौट आई. फांसी से पहले उन्होंने उसे एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने लिखा था- From your Valentine…
समय के साथ ये दो शब्द प्रेम-पत्रों की पहचान सी बन गए. इस ऐतिहासिक कथा में प्रेम केवल रोमांस का नहीं, बल्कि साहस, करुणा और त्याग का प्रतीक भी है. यह प्रेम सत्ता के विरुद्ध खड़ा होता है और मानवीय संबंधों की गरिमा की रक्षा करता है. संत वैलेंटाइन की शहादत का दिवस धीरे-धीरे पश्चिमी जगत में प्रेम के प्रतीक के रूप में बदलता चला गया और वैश्वीकरण ने इसे भारत सहित अनेक देशों में लोकप्रिय बना दिया.
किन्तु प्रश्न यह है कि क्या प्रेम का उत्सव हमारे लिए नया है! क्या प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए हमें किसी आयातित तिथि की आवश्यकता है! या प्रेम किसी एक दिन नहीं बल्कि पूरी उम्र हर क्षण जीवन में उतारने की आवश्यकता है! यदि हम अपनी सांस्कृतिक-स्मृति की ओर देखें, तो पाएंगे कि भारतीय परंपरा में प्रेम केवल एक भाव नहीं, बल्कि एक दार्शनिक, आध्यात्मिक और नैतिक मूल्य है- एक ऐसी विरासत, जो सहस्राब्दियों से हमारी चेतना को आलोकित करती आई है.
भारतीय चिंतन में प्रेम: कामना से साधना की यात्रा
भारतीय दर्शन में मानव जीवन के चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की बात कही गई है. यहां 'काम' केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि सौंदर्यबोध, अनुराग और सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है. प्राचीन ग्रंथ कामसूत्र में प्रेम और दांपत्य को कला और संवेदना के रूप में देखा गया है. वहीं उपनिषदों में प्रेम आत्मा और ब्रह्म के ऐक्य का माध्यम बन जाता है-'आत्मवत् सर्वभूतेषु' का भाव हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम अनन्य, स्वार्थरहित और व्यापक होता है. प्रेम में अपने प्रेमी/प्रेमिका या पति/पत्नी के प्रति अनन्यता और सकल संसार के लिए उस प्रेम का करुणा में रूपांतरित हो जाना. भारतीय काव्य परंपरा में प्रेम का शिखर हमें 'गीतगोविन्द' में मिलता है, जहां राधा-कृष्ण का मिलन केवल लौकिक नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के संयोग का प्रतीक बन जाता है. इस काव्य में प्रेम विरह से तपता है, मिलन से पूर्ण होता है और अंततः आध्यात्मिक उन्नयन का साधन बनता है.
राधा-कृष्ण, राम-सीता और शिव-पार्वती: अनन्यता और सर्मपण की सुगंध में खिला प्रेम
यदि हम भारतीय महाकाव्यों की ओर देखें, तो प्रेम केवल दैहिक आकर्षण नहीं, बल्कि एकनिष्ठता, उत्तरदायित्व और समर्पण का नाम है. रामायण में राम और सीता का संबंध आदर्श दांपत्य, त्याग और विश्वास का उदाहरण है. वहीं महाभारत में द्रौपदी और अर्जुन का संबंध केवल रोमांटिक नहीं, बल्कि संघर्ष और साझी नियति का प्रतीक है. राधा-कृष्ण की प्रेम कथा तो अद्भुत अतुलनीय है. इस प्रेम कथा में 'विरह' प्रेम का मर्म बन जाता है, जो मनुष्य के जन्मों-जन्मों की कलुषता को मिटाने का उपक्रम करता है. राधा-श्याम की प्रेम कथा भारतीय जनमानस में इतनी गहराई से रची-बसी है कि वह आज भी होली के रंगों, झूलों और लोकगीतों में जीवित है. यहां प्रेम सामाजिक बंधनों से परे एक आत्मिक संवाद है- वह प्रेम जो अधिकार नहीं, अपनत्व चाहता है.
भारतीय ग्रंथ 'कामसूत्र' में प्रेम और दांपत्य को कला और संवेदना के रूप में देखा गया है.
शिव और पार्वती की कथा तो दो व्यक्तित्वों का प्रेम में 'सत्यम् शिवम् संदरम्' हो जाने की कथा है. अनन्यता ऐसी कि सती के स्वाहा हो जाने के बाद शिव का वैराग पूरी धरती को दहला देता है.ध्याननिष्ठ योगी शिव युगों तक ध्यानमग्न होकर सती के पार्वती के रूप में आने की प्रतिक्षा करते हैं. युगों की प्रतिक्षा के बाद जब पार्वती और शिव का मिलन होता है, तो दोनों व्यक्तित्व अपनी स्वाधीनता बनाए रखते हुए एक आदर्श दांपत्य जीवन जीते हैं. शिव और पार्वती की बहुत सी कथाएं इस बात की मुनादी करती हैं.
भक्ति परंपराः प्रेम का लोकतंत्रीकरण
भारतीय भक्ति आंदोलन ने प्रेम को राजमहलों से निकालकर जनजीवन में स्थापित किया. संत कवियों ने ईश्वर को प्रेमी, मित्र, सखा और पति के रूप में अनुभव किया. मीरा बाई का कृष्ण के प्रति प्रेम सामाजिक रूढ़ियों से टकराने का साहस देता है. कबीर प्रेम को साधना का मूल मानते हैं- 'पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय; ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.' यहां प्रेम ज्ञान से भी ऊंचा मूल्य बन जाता है. भक्ति परंपरा में प्रेम जाति, लिंग और वर्ग की सीमाओं को तोड़ता है. यह प्रेम व्यक्ति को विनम्र बनाता है, अहंकार को गलाता है और समाज से जोड़ता है. इस दृष्टि से भारतीय परंपरा में प्रेम की अवधारणा केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का आधार भी है.
सूफ़ी परंपराः इश्क़ की सार्वभौमिकता
भारतीय भूमि पर सूफ़ी संतों ने 'इश्क़-ए-हक़ीकी' और 'इश्क़-ए-मजाज़ी' के माध्यम से प्रेम को आध्यात्मिक ऊंचाई दी. अमीर खुसरो और बुल्ले शाह जैसे कवियों ने प्रेम को मानवता का सेतु बनाया. उनके लिए प्रेम का अर्थ था- सीमा के पार जाना, 'मैं' को 'हम' में बदल देना. सूफ़ी और भक्ति परंपराएं मिलकर हमें बताती हैं कि प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच का आकर्षण नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति करुणा और एकात्मता का भाव है.
आधुनिक संदर्भः बाजार, मीडिया और प्रेम
आज वैलेंटाइन डे केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक सप्ताह का उत्सव है- रोज डे, चॉकलेट डे, टेडी डे. बाजार और पूँजीवाद ने प्रेम को उपहारों, ब्रांडेड गुलाबों और महंगे डिनर में तब्दील कर दिया है. सोशल मीडिया पर प्रेम की अभिव्यक्ति 'स्टेटस' और 'रील' में सिमट जाती है. यहां प्रश्न यह नहीं है कि वैलेंटाइन डे मनाया जाए या नहीं; प्रश्न यह है कि प्रेम का अर्थ क्या रह गया है? क्या वह केवल उपहारों और फोटो-फ्रेम में कैद मुस्कान है! या वह विश्वास, धैर्य और सहअस्तित्व की वह धारा है, जो कठिन समय में भी साथ निभाती है! भारतीय दृष्टि हमें याद दिलाती है कि प्रेम का मूल्य उपभोग में नहीं, बल्कि त्याग और उत्तरदायित्व में है. यदि प्रेम केवल प्रदर्शन बन जाए, तो वह क्षणिक है; यदि वह संवेदना बन जाए, तो वह शाश्वत है. और शाश्वत प्रेम अपनी अभिव्यक्ति के लिए किसी एक दिन या एक अवसर की मोहताज नहीं होती. वह तो हर क्षण प्रेम की निर्मलता को बांटती है. भारत में तो यही रिवाज रहा है.
भारतीय विरासतः उत्सवों में प्रेम
हमारे यहां वसंत पंचमी, होली और तीज जैसे उत्सवों में भी प्रेम की अनुगूंज है. वसंत ऋतु स्वयं कामदेव का प्रतीक मानी गई है. लोकगीतों में प्रियतम की प्रतीक्षा, सावन की फुहारों में मिलन की आकांक्षा और दीपावली पर घर लौटते राम का स्वागत- ये सब प्रेम के ही विविध रूप हैं. भारतीय संस्कृति में प्रेम केवल युगल संबंध तक सीमित नहीं; वह माता-पिता, गुरु-शिष्य, मित्र और समाज के प्रति दायित्व में भी प्रकट होता है. 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का आदर्श हमें बताता है कि समस्त विश्व एक परिवार है- यह प्रेम का वैश्विक विस्तार है.
संवाद और अभिव्यक्ति रिश्तों को सशक्त बनाते हैं.
युवा पीढ़ी और प्रेम की नई भाषा
आज की पीढ़ी प्रेम को खुलकर व्यक्त करना चाहती है. यह सकारात्मक परिवर्तन है, क्योंकि संवाद और अभिव्यक्ति रिश्तों को सशक्त बनाते हैं. परंतु आवश्यकता इस बात की है कि प्रेम की इस अभिव्यक्ति में गहराई भी हो. भारतीय परंपरा हमें सिखाती है कि प्रेम में सम्मान, समर्पण और समानता अनिवार्य हैं. यदि वैलेंटाइन डे हमें यह याद दिलाए कि प्रेम अधिकार नहीं, साझेदारी है; उपभोग नहीं, सहयोग है; तो यह उत्सव सार्थक हो सकता है.
वैलेंटाइन डे हमें अवसर देता है कि हम प्रेम के अर्थ पर पुनर्विचार करें. भारतीय विरासत हमें बताती है कि प्रेम कोई आयातित भावना नहीं; यह हमारी सभ्यता की आत्मा है. यह वह शक्ति है, जो राम-सीता के वनवास में धैर्य देती है, राधा-कृष्ण के विरह में माधुर्य भरती है, मीरा के गीतों में विद्रोह जगाती है और कबीर के दोहों में ज्ञान का प्रकाश बन जाती है. अतः 14 फरवरी को यदि हम प्रेम का उत्सव मनाएं, तो उसे केवल एक दिन तक सीमित न रखें. उसे अपने व्यवहार, संबंधों और सामाजिक उत्तरदायित्व में उतारें. प्रेम को उपहार की वस्तु नहीं, बल्कि मूल्य की विरासत बनाएं. तभी वैलेंटाइन डे भारतीय संदर्भ में केवल एक पश्चिमी उत्सव नहीं रहेगा, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना के साथ संवाद करता हुआ एक सार्थक पर्व बन सकेगा. प्रेम अंततः वही है, जो हमें मनुष्य बनाता है और हमारी संस्कृति की यह अमूल्य धरोहर हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम सीमाओं से परे, समय से परे और बाजार से परे होता है. गालिब बाबा ने ठीक कहा प्रेम के बारे में-
इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है ...
डिस्क्लेमर: लेखिका मेधा दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में पढ़ाती हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखिका के निजी हैं और उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.














