आप लोगों को 'पंचायत' वेब सीरीज़ तो याद ही होगी... प्रधान जी को आप भूले नहीं होंगे और मंजू देवी को तो भला भूल भी कैसे सकते हैं...कागजों पर मंजू देवी ग्राम पंचायत की मुखिया थीं, लेकिन ध्वजारोहण से लेकर विकास योजनाओं की फ़ाइलें निपटाने तक कुर्सी पर बैठे दिखते थे उनके पति ब्रजभूषण दुबे असली 'प्रधानपति'. यह सिर्फ रील की कहानी नहीं, एक समय में यही समाज की सच्चाई थी. यूपी, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में महिलाओं के लिए सीट आरक्षित होने के बाद भी निर्णय वही पुराने ताक़तवर पुरुष ही लेते थे. ये 'प्रधानपति' पूरे तंत्र पर हावी रहते थे. लेकिन कहानी यहीं रुकी नहीं. संसद के गलियारों में 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को लेकर छिड़ी बहस और सियासी घमासान के बीच भारत के लोकतंत्र की एक मूक लेकिन बेहद शक्तिशाली तस्वीर देश के गांवों और कस्बों से उभर रही है.
तेजी से बढ़ता महिलाओं का नेतृत्व
16 अप्रैल की मध्य रात्रि से लागू हुए महिला आरक्षण के ऐतिहासिक कानून के पीछे की सबसे बड़ी प्रेरणा और प्रमाण वे लाखों महिलाएं हैं, जिन्होंने पिछले तीन दशकों में स्थानीय निकायों की दहलीज लांघकर सत्ता के समीकरण को बदला है. 1990 के दशक में आए 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद पंचायतों और नगर निकायों में कम से कम एक तिहाई और बाद में कई राज्यों में 50 फीसदी तक सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हुईं. नतीजा यह हुआ कि आज देश के पंचायती राज संस्थानों में चुने गए प्रतिनिधियों में लगभग आधी महिलाएं हैं.
ईपीआरए इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टिडिप्लनरी रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और ज़िला पंचायत अध्यक्ष के पदों पर 2015 से 2021 के बीच महिलाओं की हिस्सेदारी 45 फीसदी से बढ़कर 54 फीसदी तक पहुंच गई. यह वही स्तर है, जहां कभी किसी महिला का नाम तक सुना जाना मुश्किल था. रिसर्च के मुताबिक यूपी में ग्राम प्रधानों में महिलाओं की हिस्सेदारी 2015 के 45 फीसदी से बढ़कर 2021 में 53.7 फीसदी हो गई. वहीं, ब्लॉक प्रमुखों में यह आंकड़ा 54.2 फीसद और ज़िला पंचायत अध्यक्षों के पदों पर 56 फीसद तक पहुंच गया. यह संख्या भर नहीं बदली, राजनीति का चेहरा भी बदला.
महिला जनप्रतिनिधियों ने क्या-क्या बदला
गांवों में चुनी गई महिला प्रतिनिधियों ने पानी, स्वच्छता, स्कूल, आंगनबाड़ी, राशन, सड़क, शौचालय और स्वास्थ्य केंद्र जैसे मुद्दों को ग्राम सभा के केंद्र में लाना शुरू किया. बिहार में स्थानीय स्तर पर महिला नेतृत्व मज़बूत होने के साथ ही महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य संकेतकों, बैंक खाते और आर्थिक फैसलों में भागीदारी जैसे सूचकांकों में सुधार दर्ज हुआ. कई अध्ययन दिखाते हैं कि जहां सरपंच या पार्षद महिला होती हैं, वहां न सिर्फ़ पीने के पानी और सफ़ाई के काम ज़्यादा तेज़ी से होते हैं, बल्कि स्कूलों, आंगनबाड़ी और महिलाओं से जुड़ी योजनाओं पर भी ज़्यादा ध्यान जाता है.
पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं को आरक्षण मिलने से केवल नीतियां ही नहीं बदलीं, लड़कियों और औरतों के सपने भी बदले. जिन घरों में कभी औरत का घर से बाहर निकलना मुश्किल था, वहां अब मां या भाभी ग्राम सभा में माइक पर बोलती दिखीं. इससे एक रोल मॉडल इफ़ेक्ट बना, जब गांव की औरतें सत्ता की कुर्सी पर दिखने लगीं, तो बेटियां भी पढ़ने-लिखने, नौकरी करने और आगे चलकर चुनाव लड़ने के सपने देखने लगीं. यह असर सिर्फ़ गांव तक सीमित नहीं रहा; शोध बताते हैं कि स्थानीय निकायों में कोटे से आई महिलाएं बाद में ज़िला, विधानसभा और यहां तक कि लोकसभा चुनाव तक में उतरने लगीं. यानी नीचे की राजनीति में मिला आरक्षण ऊपर की राजनीति तक 'स्पिलओवर'(Spillover) बनकर पहुंचा.
बिहार का 50 फीसद आरक्षण मॉडल क्या है
बिहार में महिलाओं को 2006 में पंचायती राज संस्थाओं (ग्राम पंचायत) में 50 फीसदी आरक्षण दिया गया. इसके बाद 2007 में नगर निकायों में भी महिलाओं को 50 फीसदी का आरक्षण मिला. महिलाओं के लिए यह पहल करने वाला बिहार देश का पहला राज्य था. इसे 'उच्च आरक्षण वाला मॉडल' माना गया. ईपीआरए इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टिडिप्लनरी रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) के तीसरे, चौथे और पांचवें दौर के सर्वे पर आधारित विश्लेषण बताता हैं कि 2004-05 से 2019-21 के बीच बिहार में महिला साक्षरता 37 फीसद से बढ़कर 57.8 फीसद हुई. 10 साल से अधिक की स्कूली शिक्षा का आंकड़ा 13.2 फीसद से 28.8 फीसद तक पहुंचा. कुल प्रजनन दर 4 से घटकर 3 पर आ गई और संस्थागत प्रसव में भारी सुधार हुआ. यह साफ़ दिखाता है कि जब ग्राम स्तर पर महिलाएं चुनी गईं, तो स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी ढांचे में जान आ गई.
इसके साथ ही यह सच भी है कि मंजू देवी और ब्रजभूषण वाला दृश्य पूरी तरह गायब नहीं हुआ है. आज भी कई जगह महिलाएं नाममात्र की प्रतिनिधि हैं, असली फैसले पति या परिवार के पुरुष लेते हैं. कम पढ़ाई, संसाधनों पर सीमित पकड़, डिजिटल और कानूनी जानकारी की कमी, जाति और समुदाय की बाधाएं और पार्टी संगठन का दबाव, ये सब उनकी स्वायत्तता को कम करते हैं. कुछ जगह आरक्षण की रोटेशन प्रणाली भी समस्या बनती है, जैसे ही सीट बदलती है, महिला को फिर से चुनकर आने का मौका नहीं मिलता और वह शुरू-शुरू में सीखे गए कौशल का गहराई से इस्तेमाल नहीं कर पाती है.
महिलाओं की राजनीतिक पाठशाला
इसके बाद भी तस्वीर का दूसरा हिस्सा अधिक ताकतवर है. केरल, कर्नाटक, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, अरुणाचल जैसे प्रदेशों के अध्ययनों में दिखा है कि समय के साथ एक बड़ा हिस्सा ऐसी महिलाओं का उभरा है जो प्रॉक्सी नहीं, वास्तविक नेता हैं. केरल में 2015 के स्थानीय चुनावों में महिला प्रतिनिधियों की संख्या पुरुषों से भी अधिक रही. जम्मू-कश्मीर के राजौरी और अनंतनाग जैसे इलाकों की महिलाएं आरक्षण की वजह से घर की चारदीवारी से बाहर निकलीं और ग्राम सभा, विवाद समाधान और निगरानी की भूमिका में पहुंचीं. महिला 80 फीसद से अधिक ने माना कि उनका घरेलू और सामाजिक दायरा बढ़ा है.
राजनीति के लिए इसका बड़ा अर्थ यह है कि लोकतंत्र का निचला पायदान पहले से कहीं ज़्यादा स्त्री-समान हुआ है. आज की कई युवा महिलाएं जो लोकसभा और विधानसभा के लिए टिकट मांग रही हैं, उनका पहला राजनीतिक स्कूल यही पंचायत और नगरीय निकाय हैं. इसी अनुभव ने उन्हें कागज़ पढ़ना, प्रस्ताव बनाना, बजट पर सवाल करना और अफ़सर से बहस करना सिखाया है.
अनेक इलाक़ों में यह भी देखा गया है कि महिला सरपंचों वाले गांवों में सरकारी योजनाओं की निगरानी बेहतर हुई और भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक अंकुश लगा. इसलिए जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम के ज़रिये संसद और विधानसभाओं में 33 फीसद आरक्षण की बात होती है, तो उसके पीछे खड़ी सबसे मज़बूत दलील यही स्थानीय स्तर का अनुभव है. पंचायतों और नगर निकायों में आरक्षण ने साफ़ दिखा दिया कि अगर संविधान और क़ानून रास्ता खोलें, तो महिलाएं सिर्फ़ संख्या नहीं बढ़ातीं, राजनीति के एजेंडे और समाज के सोचने का तरीका भी बदल देती हैं. मंजू देवी जैसे नाम अब सिर्फ़ पर्दे की पटकथा नहीं, ज़मीन की राजनीति भी लिख रहीं हैं. यही भारत की लोकतांत्रिक कहानी का नया अध्याय है.
(डिस्क्लेमर: लेखक देश की राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं. वो राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














