साल 2023 में गीतकार शैलेंद्र की 100वीं जयंती मनाई गई थी. इस साल यानी 30 अगस्त को उनकी 102वीं जयंती है. शैलेंद्र ने अपने 17 साल के फिल्मी करियर में करीब 900 गाने लिखे थे. इन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा गीतकार बताया गया है.
सिर्फ हिंदी ही नहीं भोजपुरी फिल्मों के भी सर्वश्रेष्ठ गीतकार हैं शैलेंद्र. भोजपुरी सिनेमा के अब तक के सफर (1962 से अब तक) में वैसा दूसरा गीतकार नहीं पैदा हुआ. उन्होंने भोजपुरी में भी कालजयी गीत दिए. आज जब भोजपुरी गीतों का स्तर रसातल में चला गया है, भोजपुरी गीतों को प्रतिष्ठा दिलाने वाले और उसे हिंदी के समकक्ष स्थापित करने वाले गीतकार शैलेंद्र बहुत याद आते हैं.
भोजपुरी की पहली फिल्म कौन सी है
हे गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो, सइयाँ से कर द मिलनवा हाय राम…
यह गीत प्रथम भोजपुरी फिल्म का टाइटल ट्रैक है, जो 1962 में रिलीज हुई और भोजपुरी सिनेमा को स्थापित करने में इस गीत की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही. फिल्मों की सफलता में गीतों की एक बड़ी भूमिका अब भी है. यदि उसके गीत सुपरहिट हो गए तो समझें कि फिल्म भी सुपरहिट होगी, लोग उसको जानेंगे और देखने जरूर जाएँगे. जब नाजिर हुसैन की कहानी और मार्गदर्शन पर कुंदन कुमार ने फिल्म 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' बनाई तो शैलेंद्र को अपनी फिल्म के सभी गीत लिखने का अधिकार दिया. चित्रगुप्त इसके संगीतकार थे. हिन्दी सिनेमा के बड़े नाम थे, शैलेंद्र. वो किसी परिचय के मोहताज नहीं थे. लुब्ब-ए-लुबाब यह कि गोपालगंज (बिहार) के चित्रगुप्त ने आरा (बिहार) के शैलेंद्र के लिखे गीतों को संगीतबद्ध किया.
आप चौंकेंगे कि शैलेंद्र तो रावलपिंडी, पंजाब (ब्रिटिश शासित भारत) में पैदा हुए, तो आरा वाले कैसे हो गए. अरे महाराज! आपको चौंकना तो तभी चाहिए था, जब उन्होंने अपनी फिल्म 'तीसरी कसम' के लोकप्रिय गीत 'चलत मुसाफिर मोह लियो रे, पिंजरे वाली मुनिया...' लिखा, 'पान खाए सइयाँ हमार हो, साँवली सुरतिया आ होंठ लाल...' भी लिखा. ये सब भी तो भोजपुरी भाषा के निकटस्थ गीत रहे. तो, इतना सटीक भोजपुरिया टोन आप तभी जान सकते हैं, जब आप उस माटी के हों या उस माटी में रहे हों. दरअसल शैलेंद्र के बाबूजी और दादा-परदादा आरा के अख्तियारपुर (बड़का गाँव) के निवासी थे. उनके घर में भोजपुरी बोलचाल की भाषा थी, जिसका असर उनके व्यक्तित्व पर था और बाद में उनके कृतित्व पर भी पड़ा. 'गाइड' फिल्म का गीत 'पिया तोसे नैना लागे रे, नैना लागे रे' तो आपने सुनी ही होगी. यह गीत उनके भोजपुरिया कनेक्शन को बहुत सुंदरता से दिखाती है. एक गीत है मधुमती फिल्म का, जो दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला पर फिल्माई गई है, जिसे शैलेंद्र ने ही लिखा था -
'ओ बिछुआ, हाय रे
पीपल छइयां बैठी पलभर हो भर के गगरिया, हाय रे
दईया रे, दईया रे, चढ़ गयो पापी बिछुआ
ओ हाय हाय रे मर गई, कोई उतारो बिछुआ'
शैलेंद्र का भोजपुरी से साथ
यह गीत 'टोनालिटी' से लेकर शब्दों के प्रयोग तक भोजपुरिया पुट से परिपूर्ण है. उनके ऐसे बहुत-से गीत हैं, जो इस बात के संकेत देते हैं कि इस गीतकार में भोजपुरिया संस्कार हैं. हालांकि जब शैलेंद्र युवावस्था को प्राप्त कर रहे थे, तब वे मथुरा में रहे. उनके पिताजी आरा से रावलपिंडी नौकरी की खोज में गए थे और फिर वहाँ से मथुरा आ गए. शैलेंद्र की युवावस्था की शुरुआत मथुरा में हुई. उनके एक मित्र थे इंद्र बहादुर खरे, जो खुद भी कवि थे. दोनों ने एक ही विद्यालय से पढ़ाई की और बाद में एक साथ कविताई भी की. कालांतर में शैलेंद्र रेलवे की नौकरी करने बंबई (सम्प्रति, मुम्बई) आ गए और उनके मित्र काव्य साहित्य में आगे बढ़ गए. यह भी कारण रहा कि शैलेंद्र के गीतों में भोजपुरी के साथ ब्रजभाषा छौंक भी थोड़ा-बहुत देखने को मिलता है. हालांकि भोजपुरी, अवधी, ब्रज ये सभी भाषा-भाषी लोग एक-दूसरे से सदैव जुड़े रहे हैं. ये क्षेत्र भौगोलिक रूप से भी एक-दूसरे के आसपास हैं.
भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती गीत शैलेंद्र ने ही लिखे
शैलेंद्र का भोजपुरिया परिचय ही था कि संगीतकार चित्रगुप्त ने उनको 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो' में सभी गीत लिखने के लिए कहा. इस फिल्म के गीत रेडियो पर और रिकॉर्ड पर ऐसे गूँजे कि यह फिल्म सिनेमाहाल में कई महीने तक चलती रही. लोग सिनेमाघर तक बैलगाड़ी से, पैदल गये, लेकिन फिल्म देखी जरूर. शैलेंद्र के लिखे इस फिल्म के गीत, जैसे- 'सोनवा के पिंजरा में बंद भइल हाय राम', 'मोरे करेजवा में पीर हाय राम', 'काहें बाँसुरिया बजवलs', 'लुक छिप बदरा में चमके जइसे चनवा', 'अब त लागल मोरा सोरहवा साल, लोगवा नजर लगावेला', सब के सब लोकप्रिय हुए और इसमें आप जीवन-दर्शन से लेकर अठखेली और लड़कपन भी देख सकते हैं. शैलेंद्र का रचना-संसार समृद्ध रहा.
शैलेंद्र ने भोजपुरी के अनेक उल्लेखनीय फिल्मों में गाने लिखे, जैसे - 'मितवा', 'नइहर छुटल जाए', 'गंगा', 'सइयां से नेहिया लगइबे', 'विधना नाच नचावे' आदि.
हालांकि गीतकार के रुप में उनका पहला गीत राजकपूर की फिल्म 'बरसात' (1949) में था, 'बरसात में तुमसे मिले हम सजन'. शैलेंद्र की लेखन-क्षमता का पता राजकपूर ने लगाया. इस फिल्म से एक नई संगीतकार जोड़ी ने भी अपनी शुरुआत की, जो थे, शंकर जयकिशन. इस जोड़ी और शैलेंद्र ने मिल कर एक से एक गीत हिन्दी फिल्म जगत को दिए.
शैलेंद्र का अंतिम गीत उनके बेटा ने पूरा किया
शैलेंद्र की सेहत ठीक नहीं चल रही थी, जिस कारण 13 दिसंबर 1966 के दिन वे अस्पताल जाने के रास्ते में राजकपूर के बुलावे पर उनके आरके काटेज मिलने गए. वही राजकपूर ने अपनी महत्त्वाकांक्षी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' का गीत 'जीना यहाँ मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ' को पूरा करने के लिए कहा. हालांकि शैलेंद्र उसे पूरा नहीं कर सके और अगले दिने 14 दिसंबर 1966 को दिवंगत हो गए. उस दिन राजकपूर का जन्मदिन भी था. अधूरे गीत से सम्बद्ध कुछ रिपोर्ट के अनुसार कहा जाता है कि उनके लड़के शैली शैलेंद्र ने पिता के उस अधूरे गीत 'जीना यहाँ मरना यहाँ' को पूरा किया. 30 अगस्त 1923 को जन्मे शैलेंद्र की मृत्यु मात्र 43 साल की उम्र में ही हो गई. संयोग देखें कि इसी साल उनके निर्माता के रूप में बनाई फिल्म 'तीसरी कसम' रिलीज हुई, जो रिलीज होने के कई सप्ताह बाद सुपरहिट हो गई. हालाँकि शैलेंद्र यह घटना अपनी आँखों के सामने होते नहीं देख पाए.
शंकरदास केसरीलाल शैलेंद्र की डायरी में उनके पैतृक गांव के बारे में जिक्र है. उनकी बेटी अमला शैलेंद्र मजुमदार दुबई में रहती हैं. वो आरा शहर से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित अपने पूर्वजों के गांव अख्तियारपुर (बड़का गाँव) 2019 में आई थीं. उनके बेटे भी आए थे इस गाँव में. अब तो वे लोग भी वृद्ध हो चुके हैं, पर गांव के लोग से उन्हें वैसा ही प्यार मिला, जैसा उनके बाबूजी और बाबा को मिलता रहा. भोजपुरिया विश्व के किसी भी कोने में चला जाए, पर दिल से भोजपुरिया ही रहता है.
शैलेंद्र को कितनी बार मिला था फिल्मफेयर पुरस्कार
तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित ('यहूदी' का गीत 'ये मेरा दीवानापन है या मोहब्बत का सुरूर' के लिए 1958 में, 'अनाड़ी' का गीत 'सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी, सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी' के लिए 1959 में और 'ब्रह्मचारी' फिल्म का गीत 'तुम गाओ मैं सो जाऊं'' 1968 में, मृत्योपरान्त), एकमात्र काव्य-संगह 'न्यौता और चुनौती' (मई 1955 में प्रकाशित) के प्रणेता, मार्क्सवादी कवि और अपने समय के सबसे लोकप्रिय और बॉलीवुड के सबसे महँगे गीतकारों में से एक शैलेंद्र की पावन स्मृति को नमन!
जब तक धरती-चांद रहे, दुनिया गुनगुनाती रहेगी, आशावादी रुझान के अपने प्रिय गीतकार शैलेंद्र को -
''तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत पर यकीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर"
"ये गम के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुजर, गुजर गए हजार दिन"
अस्वीकरण: लेखक मनोज भावुक भोजपुरी साहित्य-सिनेमा के जानकार हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.