अमेरिकी शक्ति का वास्तविक और दीर्घकालिक स्रोत कभी केवल उसकी सैन्य श्रेष्ठता या आर्थिक क्षमता नहीं रहा, बल्कि वह सॉफ्ट पावर रही है जिसने अमेरिका को वैश्विक राजनीति में एक विशिष्ट नैतिक और वैचारिक स्थान दिलाया. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरी अमेरिकी नेतृत्वकारी भूमिका इस तथ्य पर आधारित थी कि अमेरिका न केवल शक्ति का प्रयोग करता था, बल्कि ऐसा करते समय वह संस्थागत वैधता, साझेदारी और साझा मूल्यों पर भी बल देता था. मार्शल प्लान, ब्रेटन वुड्स संस्थाएं, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली, वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे और विकास सहायता कार्यक्रम... ये सभी अमेरिकी सॉफ्ट पावर के ऐसे उपकरण थे, जिन्होंने शक्ति को स्वीकार्य और आकर्षक बनाया.
ट्रंप 2.0 में टूटा संतुलन
डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल (ट्रंप 2.0) में यह संतुलन लगभग पूरी तरह टूट चुका है. जनवरी 2025 के बाद से ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति का केंद्रीय स्वर सहयोग या नेतृत्व नहीं, बल्कि संकीर्ण राष्ट्रवाद, लेन-देन आधारित कूटनीति और सार्वजनिक अपमान के माध्यम से दबाव बनाने की प्रवृत्ति रही है. यह दृष्टिकोण न केवल अमेरिकी सॉफ्ट पावर को कमजोर करता है, बल्कि उसे सक्रिय रूप से नष्ट करता प्रतीत होता है. जिस अमेरिका को कभी संस्थागत स्थिरता और वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं का प्रदाता माना जाता था, वही अब अविश्वसनीय, अप्रत्याशित और आत्मकेंद्रित शक्ति के रूप में देखा जाने लगा है.
सॉफ्ट पावर की अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि प्रभाव केवल डर या दंड से नहीं, बल्कि आकर्षण, वैधता और भरोसे से आता है. अमेरिका की संस्कृति, उच्च शिक्षा प्रणाली, वैज्ञानिक नेतृत्व, उदार राजनीतिक आदर्श और बहुपक्षीय संस्थानों में उसकी अग्रणी भूमिका... इन सभी ने दशकों तक उसे वह नैतिक बढ़त दी, जिसे न तो सोवियत संघ और न ही बाद में चीन पूरी तरह चुनौती दे सके. किंतु ट्रंप 2.0 के तहत अमेरिका स्वयं इन स्रोतों को कमजोर कर रहा है.
वैश्विक नैतिक पूंजी को स्वेच्छा से नष्ट करने जैसा
विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका का औपचारिक और वैचारिक अलगाव, वैश्विक महामारी अनुभवों के बावजूद, इस मानसिकता को दर्शाता है कि बहुपक्षीय सहयोग अमेरिका के लिए बोझ है, संसाधन नहीं. इससे भी अधिक गंभीर निर्णय था यूएसएआईडी को बंद करना और विदेशी विकास सहायता को लगभग समाप्त कर देना. यूएसएआईडी केवल एक नौकरशाही संस्था नहीं थी, वह अमेरिकी सॉफ्ट पावर का सबसे ठोस, सबसे जमीनी और सबसे मानवीय चेहरा थी. अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में अमेरिका की उपस्थिति प्रायः सैनिकों से नहीं, बल्कि डॉक्टरों, शिक्षकों, इंजीनियरों और विकास विशेषज्ञों के माध्यम से महसूस की जाती थी. ट्रंप प्रशासन द्वारा इस तंत्र को समाप्त करना अमेरिका की वैश्विक नैतिक पूंजी को स्वेच्छा से नष्ट करने जैसा है.
इस निर्णय का प्रभाव केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं है. इससे अमेरिका की वह क्षमता भी क्षीण होती है, जिसके माध्यम से वह संकट के समय वैश्विक नेतृत्व कर सकता था. प्राकृतिक आपदाएं, स्वास्थ्य आपात स्थितियां, खाद्य असुरक्षा, इन सभी क्षेत्रों में अमेरिका की अनुपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अब वैश्विक सार्वजनिक हितों का स्वाभाविक संरक्षक नहीं रहना चाहता. यह सॉफ्ट पावर के परित्याग का सबसे खतरनाक संकेत है.
अमेरिका अब कर रहा सहयोगियों से भी सौदेबाजी!
यूरोप और कनाडा के साथ ट्रंप 2.0 के संबंधों ने इस गिरावट को और गहरा किया है. ग्रीनलैंड पर ट्रंप की सार्वजनिक टिप्पणियां, जिनमें रणनीतिक नियंत्रण की भाषा और आर्थिक दबाव की धमकियां शामिल थीं, उन्होंने ट्रांसअटलांटिक संबंधों को गहरी चोट पहुंचाई. यूरोपीय संघ के कई देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी केवल एक व्यापारिक विवाद नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रमाण थी कि अमेरिका अब सहयोगियों को नियम-आधारित व्यवस्था के साझेदार नहीं, बल्कि सौदेबाजी के प्रतिद्वंद्वी मानता है. कनाडा के साथ रिश्तों में यह प्रवृत्ति और भी अधिक चिंताजनक रही. सार्वजनिक मंचों पर कनाडा की संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न लगाना और यह संकेत देना कि उसका अस्तित्व अमेरिकी कृपा पर निर्भर है, उस लोकतांत्रिक आत्मीयता को नष्ट करता है जो दशकों तक दोनों देशों के संबंधों की आधारशिला रही है. सॉफ्ट पावर की दृष्टि से यह आत्मघाती नीति है, क्योंकि भरोसे और सम्मान के बिना गठबंधन टिक नहीं सकते.
ट्रंप की टैरिफ नीति से चीन को लाभ
ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति भी अमेरिकी सॉफ्ट पावर के क्षरण का एक केंद्रीय तत्व है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जिस मुक्त व्यापार व्यवस्था को अमेरिका ने स्वयं निर्मित और संरक्षित किया था, उसी के विरुद्ध अब वही देश सबसे आक्रामक दिखाई देता है. जब आर्थिक नीति को दंड और दबाव के उपकरण के रूप में प्रयोग किया जाता है, तब वह आकर्षण पैदा नहीं करती, बल्कि प्रतिरोध और वैकल्पिक गठबंधनों को जन्म देती है. इस संदर्भ में चीन की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है. अमेरिकी सॉफ्ट पावर के इस स्वैच्छिक क्षरण ने चीन के लिए रणनीतिक अवसर पैदा किए हैं. बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, वैश्विक दक्षिण में निवेश, बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भागीदारी और विकास सहायता के माध्यम से चीन स्वयं को एक स्थिर और उपलब्ध साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. भले ही चीन की मंशाओं पर प्रश्न उठते हों, किंतु यह निर्विवाद है कि अमेरिका द्वारा छोड़े गए स्थानों को वह तेजी से भर रहा है.
भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या असर?
इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिकी सॉफ्ट पावर के क्षरण के निहितार्थ भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं. भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़े हैं, किंतु यह साझेदारी केवल सैन्य सहयोग या व्यापार पर आधारित नहीं रही है. लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुपक्षीय व्यवस्था के प्रति साझा प्रतिबद्धता, वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं में सहभागिता और संस्थागत स्थिरता, इन सभी ने भारत-अमेरिका संबंधों को एक व्यापक वैचारिक आधार प्रदान किया है. ट्रंप 2.0 के तहत अमेरिकी सॉफ्ट पावर के कमजोर पड़ने से यही वैचारिक आधार अस्थिर होता दिखाई देता है. भारत की विदेश नीति पारंपरिक रूप से रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय संतुलन पर आधारित रही है. ऐसे में अमेरिका का बहुपक्षीय संस्थानों से पीछे हटना, चाहे वह WHO हो, विकास सहायता ढांचा हो या वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताएं, भारत के लिए एक जटिल स्थिति उत्पन्न करता है. एक ओर भारत अमेरिका के साथ सुरक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग को आगे बढ़ाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह एक ऐसे वैश्विक वातावरण में कार्य कर रहा है जहां संस्थागत नेतृत्व कमजोर हो रहा है और नियम-आधारित व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है.
अमेरिकी सॉफ्ट पावर के क्षरण से वह अंतरराष्ट्रीय मंच सिकुड़ता है जहां भारत अपनी जिम्मेदार, विकासोन्मुख और सहयोगी शक्ति की छवि को आगे बढ़ा सकता था. अमेरिकी सॉफ्ट पावर के इस क्षरण का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि वैश्विक व्यवस्था अधिक अराजक, प्रतिस्पर्धात्मक और अनिश्चित होती जा रही है. भारत जैसे देश, जो न तो स्थापित महाशक्ति हैं और न ही परंपरागत रूप से संशोधनवादी शक्ति, इस अस्थिरता में सबसे अधिक सावधानी के साथ आगे बढ़ने को विवश हैं. भारत के लिए यह समय केवल अमेरिका की नीतियों पर प्रतिक्रिया देने का नहीं, बल्कि अपनी स्वयं की सॉफ्ट पावर, सभ्यतागत मूल्यों, विकास सहयोग, तकनीकी नवाचार और लोकतांत्रिक अनुभव—को अधिक सक्रिय रूप से वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का भी है.
...तो भारत के सामने दोहरी चुनौती
यदि ट्रंप 2.0 के तहत अमेरिका सॉफ्ट पावर से पीछे हटता है, तो भारत के सामने एक दोहरी चुनौती और अवसर दोनों उपस्थित होते हैं- चुनौती यह कि वैश्विक नेतृत्व का पारंपरिक ढांचा कमजोर हो रहा है, और अवसर यह कि भारत स्वयं एक अधिक जिम्मेदार, संतुलित और भरोसेमंद शक्ति के रूप में उभर सकता है. किंतु यह तभी संभव है जब भारत यह समझे कि सॉफ्ट पावर केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि निरंतरता, वैधता और दीर्घकालिक दृष्टि से निर्मित होती है. ठीक वही तत्व जिनसे ट्रंप 2.0 के अमेरिका ने दूरी बना ली है. सॉफ्ट पावर का पतन केवल छवि का प्रश्न नहीं है. यह वैश्विक व्यवस्था की दिशा को प्रभावित करता है. मानवाधिकार, पर्यावरण, वैश्विक स्वास्थ्य और नियम-आधारित व्यवस्था, इन सभी के लिए नैतिक नेतृत्व आवश्यक होता है. जब अमेरिका स्वयं इन भूमिकाओं से पीछे हटता है, तब वह न केवल अपना प्रभाव खोता है, बल्कि वैश्विक राजनीति को अधिक अराजक और प्रतिस्पर्धात्मक बना देता है.
ट्रंप 2.0 के अंतर्गत अमेरिका एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां, वह शक्ति तो बनाए रखना चाहता है, लेकिन नेतृत्व के दायित्वों से पीछे हट रहा है. यह असंतुलन टिकाऊ नहीं है. इतिहास बताता है कि केवल हार्ड पावर पर आधारित प्रभुत्व अल्पकालिक होता है. यदि अमेरिका अपनी वैश्विक भूमिका को पुनर्स्थापित करना चाहता है, तो उसे सॉफ्ट पावर के मूल स्रोतों (संस्थाओं, साझेदारियों और नैतिक वैधता) की ओर लौटना होगा. अन्यथा, ट्रंप 2.0 का यह दौर अमेरिकी प्रभाव के दीर्घकालिक क्षरण के रूप में याद किया जाएगा, और वैश्विक व्यवस्था में नेतृत्व का स्थान धीरे-धीरे किसी और के हाथों में चला जाएगा.
(डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














