इंसान को किस ओर ले जा रहा है विकास, जाति, धर्म, भाषा में क्यों बंट रहा है समाज

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रविशंकर पांडेय

बीसवीं सदी से इक्कीसवीं सदी को प्रगति और आर्थिक-तकनीकी उन्नयन, वैश्विक संपर्क और आर्थिक विस्तार की सदी कहा जा रहा है, किन्तु यदि हम इस युग के भीतर झांकने का प्रयास करें तो बीसवीं सदी के सापेक्ष इक्कीसवीं सदी में एक गहरी सांस्कृतिक रिक्तता, मूल्यहीनता और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण का गहरा अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. वर्तमान समय वह समय है, जहां मानवजाति ने बाह्य विकास की ऊंचाइयों को तो छू लिया है, परन्तु अपने भीतर के आकाश और अपने संस्कार, अपने मूल्य, अपनी चेतना से वह लगातार दूर होता जा रहा है. यह दूरी वर्तमान समय की सांस्कृतिक विपन्नता का मूल कारण है.

क्या है संस्कृति

संस्कृति केवल नृत्य, संगीत या परंपराओं का प्रदर्शन नहीं होती, बल्कि वह जीवन जीने का एक सुसंगठित दृष्टिकोण होती है, जो मानवजाति को प्रकृति और समाज के साथ स्वयं का संतुलन स्थापित करना सिखाती है. जब यह संतुलन टूटता है, तब समाज में केवल भौतिक उपलब्धियां ही बचती हैं, परन्तु उनमें जीवन का सार नहीं रहता. इस तरह आज का मनुष्य उपभोक्ता तो बन गया है, पर संवेदनशील मनुष्य नहीं रह गया है.यह स्थिति सांस्कृतिक दरिद्रता का सबसे बड़ा संकेत है. जब-जब सांस्कृतिक मूल्य टकराते हैं, तब केवल विचारों का ही संघर्ष नहीं होता, बल्कि वह विचारों का संघर्ष आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण सामाजिक विभाजन का कारण बनता है. इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि सांस्कृतिक असहिष्णुता ने ही अनेक युद्धों को जन्म दिया है. आज भी विश्व के विभिन्न हिस्सों में जो संघर्ष दिखाई दे रहे हैं, उनके संघर्ष के मूल में केवल राजनीतिक या आर्थिक कारण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रिक्तता के कारण समाज के सामने असुरक्षा और अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है. जब एक संस्कृति स्वयं को श्रेष्ठ मानकर दूसरी को दबाने का प्रयास करती है, तब क्षेत्रीय असंतुलन और संघर्ष अपरिहार्य हो जाता है.

इक्कीसवीं सदी का मनुष्य औद्योगिक विकास के अहंकार में यह भूल गया है कि विविधता ही प्रकृति का मूल स्वभाव है. अगर उसने एकरूपता थोपने का प्रयास किया गया वह कृत्रिम रूप से कभी भाषा के रूप में तो कभी पहनावे के रूप में हम सबके मौलिक जीवनशैली और विचारों को प्रभावित किया है. इसके परिणामस्वरूप वैश्विक होते समाजों में संघर्ष का कारण बना. वर्तमान समाज ने सांस्कृतिक विविधता को सम्मान देने के बजाय उसे प्रतिस्पर्धा का विषय बना दिया है. जिसके परिणामस्वरूप समाज छोटे-छोटे खांचों में विभाजित होता गया, जिसके आधार में जाति, धर्म, भाषा, राष्ट्र और विचारधाराओं के रूप में देखने को मिलती हैं.

इंसान को क्या दे रहा है विकास

विचारधाराओं का विभाजन केवल सामाजिक स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसने मनुष्य के भीतर भी एक द्वंद्व पैदा किया है. सांस्कृतिक रिक्तता के अभाव में आज का समाज बाहर से तो आधुनिक है, पर भीतर से अस्थिर दिखता है. वह तकनीकी रूप से तो सक्षम है, पर भावनात्मक रूप से कमजोर चुका है. यही द्वंद्व उसे धीरे-धीरे आत्मविनाश की ओर ले जा रहा है. आज उद्योग और विकास को आधुनिक युग में प्रगति का पर्याय मान लिया गया है. परंतु यह विकास वास्तव में किसके लिए है? क्या यह विकास मानवजाति को संतुलित और सार्थक बना रहा है या उसे प्रकृति से दूर कर रहा है? यह प्रश्न बीते हुए कल की तरह ही आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. आद्योगिक विकास ने सुविधाएं तो प्रदान की हैं, परन्तु उन्होंने जीवन की सहजता और नैसर्गिकता को छीन लिया है.

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इस विषय पर हमने कभी ध्यान नही दिया कि प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध केवल संसाधन का नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का है. जो समाज प्रकृति को माता के रूप में देखता था, वह उसका शोषण नहीं करता था. लेकिन आधुनिक विकास की अवधारणा ने प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु बना दिया. जंगल कटे, नदियां प्रदूषित हुईं, वायु विषैली हुई और पृथ्वी का संतुलन बिगड़ता जा रहा है. यह सब औद्योगिक प्रगति और विकास के नाम पर हुआ. यहां एक गहरी विडंबना है, जिस विकास को हम प्रगति मानते हैं, वही हमारे अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है. मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं को इच्छाओं में और इच्छाओं ने समाज को लालच के रूप में बदल दिया है.इसके परिणामस्वरूप सामाजिक ढांचा प्रकृति के विरुद्ध खड़ा हो गया है. यह संघर्ष बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है,जो मानवजाति के लिए आत्मघाती है, क्योंकि प्रकृति के बिना मनुष्य का अस्तित्व संभव नहीं.

इंसान और पर्यावरणीय संकट

मानव जाति का यह आत्मविनाश केवल पर्यावरणीय संकट तक सीमित नहीं, बल्कि यह मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी दिखाई देता है. आज का मनुष्य अकेला है, जबकि वह भीड़ में रहता है. उसके पास साधन हैं, पर संतोष नहीं है. उसके पास जानकारी है, पर ज्ञान नहीं. यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि उसने अपने सांस्कृतिक मूल्यों को त्याग दिया.संस्कृति मनुष्य को संयम सिखाती है, संतुलन सिखाती है और यह समझ देती है कि जीवन केवल भोग के लिए नहीं बना, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाने के लिए बना है. जब मानवजाति में यह समझ समाप्त हो जाती है, तब जीवन केवल उपभोग का माध्यम बन जाता है. यही आज की सबसे बड़ी समस्या है.

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सांस्कृतिक विपन्नता का एक और गंभीर पहलू यह है कि उसने मानवजाति को अपनी पहचान से दूर कर दिया है. वह अपने इतिहास, अपनी परंपराओं और अपने मूल्यों से कट गया है. आज हमने पश्चिमी जीवनशैली को अपनाया अवश्य है, परन्तु उसे हम आत्मसात नहीं कर पा रहे हैं. जिसके परिणामस्वरूप भारतीय समाज न तो पूरी तरह स्वयं को आधुनिक बना सका और न ही अपनी परंपरा को बचा सका. यह स्थिति एक प्रकार की सांस्कृतिक विसंगति है.

जब समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, तब वह केवल बहुत बड़ी भीड़ बनकर रह जाता है. उसमें दिशा नहीं होती, उद्देश्य नहीं होता. यही स्थिति आज विश्व के अनेक समाजों में दिखाने को मिल रही है. लोग एक दूसरे से अधिक जुड़े हुए हैं, परन्तु एक-दूसरे से उतने ही दूर हैं. अन्य शताब्दियों की अपेक्षा संवाद बढ़ा है, पर समझ कम हुई है. यहां यह समझना आवश्यक है कि विकास का विरोध नहीं किया जा सकता, परन्तु विकास की दिशा पर प्रश्न अवश्य उठाया जा सकता है. विकास वह होना चाहिए जो मनुष्य को अधिक मानवीय बनाए, न कि केवल अधिक उपभोक्ता बनाए. वह विकास जो प्रकृति के साथ संतुलन नहीं बना पाता वह समाज प्रकृति को नष्ट कर देता है. ऐसा विकास  समाज को जोड़ता नहीं वह उसे विभाजित कर देता है.

सांस्कृतिक पुनर्जागरण की जरूरत

इक्कीसवीं सदी को यदि वास्तव में सार्थक बनाना है, तो हमें सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है. यह पुनर्जागरण केवल परंपराओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास नहीं होना चाहिए, बल्कि उन मूल्यों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास होना चाहिए जो मानवता को जोड़ते हैं, जो सत्य, अहिंसा, करुणा, सह-अस्तित्व और समरसता से जोड़ते हैं. उसके लिए यह आवश्यक है कि हम अपने बच्चों को केवल तकनीकी शिक्षा न दें, बल्कि उन्हें जीवन के मूल्यों की शिक्षा भी दें. उन्हें यह समझाया जाए कि सफलता केवल धन अर्जन में नहीं, बल्कि एक संतुलित और सार्थक जीवन जीने में है. उन्हें यह सिखाया जाए कि प्रकृति के साथ उनका संबंध कैसा होना चाहिए और समाज के प्रति उनकी क्या-क्या जिम्मेदारियां हैं. इसके साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि सांस्कृतिक विविधता कोई समस्या नहीं, बल्कि एक अवसर है. यह अवसर है एक दूसरे से सीखने और समझने का और एक-दूसरे के साथ सह-अस्तित्व में रहने का. यदि हम इस विविधता को स्वीकार कर लें, तो संघर्ष की संभावना स्वतः कम हो जाएगी.

अतः यह कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसे यह निर्णय लेना है कि वह किस दिशा में आगे बढ़ेगी, क्या वह केवल भौतिक विकास के मार्ग पर चलकर आत्मविनाश की ओर जाएगी या वह सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों को पुनर्जीवित कर एक संतुलित और समरस विश्व का निर्माण करेगी. वर्तमान समय की मानवजाति को यह समझना होगा कि वह प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका ही एक अभिन्न अंग है. उससे सहकार बनाते हुए अपने अहंकार को त्यागकर विनम्रता को अपनाना होगा. उसे यह स्वीकार करना होगा कि वास्तविक विकास बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक होता है. यदि हम वाह्य और आंतरिक विकास के इस सत्य को समझ लें, तो शायद हम इस सांस्कृतिक विपन्नता के दौर से बाहर निकल पाएंगे. अन्यथा, यह सदी केवल विकास की नहीं, बल्कि विनाश की सदी के रूप में याद की जाएगी.

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डिस्क्लेमर: इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ पीठ में वकालत करते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.

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