क्या भगत सिंह की फांसी टालने के लिए गांधी जी ने की थी कोशिशें, दिल्ली के पार्क में क्यों की थी जनसभा

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विवेक शुक्ल

हर साल 23 मार्च को भगत सिंह के शहीदी दिवस के आसपास कुछ विद्वान दावा करने लगते हैं कि महात्मा गांधी ने उन्हें (भगत सिंह) को फांसी के फंदे से बचाने की कोई कोशिश नहीं की. इस तरह की डिबेट सोशल मीडिया में भी शुरू हो जाती है. इन दोनों को आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है, 'भगत सिंह बनाम गांधी'. एक तरफ अहिंसा और सत्याग्रह के पुजारी गांधी, दूसरी तरफ क्रांतिकारी और समाजवाद के प्रतीक भगत सिंह.ऐसे में सवाल उठता है- यह तुलना क्यों की जाती है? क्या यह सही है? क्या दोनों के रास्ते वाकई विरोधी थे या यह इतिहास का सरलीकरण है?

महात्मा गांधी और भगत सिंह का लक्ष्य क्या था

सबसे पहले पृष्ठभूमि समझें. महात्मा गांधी ने 1915 में भारत लौटकर अहिंसा और सत्याग्रह को राष्ट्रीय आंदोलन का आधार बनाया. चंपारण, खेड़ा, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन के माध्यम से उन्होंने करोड़ों सामान्य भारतीयों को जागृत किया. उनका मानना था कि साधन जितने शुद्ध होंगे, परिणाम उतने ही स्थायी होंगे. वहीं, भगत सिंह मात्र 23 साल की उम्र में शहीद हुए. लाहौर षड्यंत्र मामले, असेंबली में बम फेंकना और सांडर्स हत्या के लिए वे जाने जाते हैं. लेकिन वे सिर्फ 'बम फेंकने वाले' नहीं थे- वे नास्तिक, समाजवादी विचारक थे, जिन्होंने 'मैं नास्तिक क्यों हूँ?' जैसे निबंध लिखे और क्रांति को वैज्ञानिक आधार दिया. वे चिंतक क्रांतिकारी थे.

दोनों का लक्ष्य एक था, ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति और शोषण-रहित समाज. लेकिन साधन अलग थे. गांधी मानते थे कि हिंसा से हिंसा ही जन्म लेगी, जबकि भगत सिंह मानते थे कि साम्राज्यवादी ताकतें सिर्फ बल से ही समझती हैं. भगत सिंह ने गांधी के अहिंसक रास्ते को धीमा और समझौतावादी माना. उन्होंने कांग्रेस की नीति को कमजोर, सुधारवादी और संवैधानिक कहा.

इसके विपरीत, गांधी क्रांतिकारियों की बहादुरी का सम्मान करते थे. उन्होंने भगत सिंह को 'शहीदों का राजकुमार' कहा और उनकी फांसी के बाद कराची कांग्रेस (1931) में प्रस्ताव पास कराया.''यह कांग्रेस शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की बहादुरी और बलिदान की प्रशंसा दर्ज करती है.'' लेकिन उन्होंने हिंसा का अनुकरण कभी नहीं किया. चौरी-चौरा कांड (1922) के बाद उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, क्योंकि हिंसा उनके सिद्धांत के खिलाफ थी.

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भगत सिंह की फांसी रोकने के लिए गांधी जी ने कहां की थी जनसभा 

अब मुख्य सवाल, तुलना क्यों की जाती है? यह बहस 1931 की फांसी के बाद से शुरू हुई, लेकिन आज राजनीतिक ध्रुवीकरण ने इसे और तेज किया है. कुछ लोग भगत सिंह को असली स्वाधीनता सेनानी बताकर गांधी को समझौतावादी या ब्रिटिश एजेंट कहते हैं. यह बाएं-दाएं या हिंदुत्व बनाम सेकुलर बहस का हिस्सा बन गया है. युवा भगत सिंह की शहादत से प्रेरित होते हैं- हंसते-हंसते फांसी चढ़ने वाला 23 साल का लड़का, जो 'इंकलाब जिंदाबाद' का नारा देता है. वहीं गांधी की अहिंसा को 'निष्क्रिय' माना जाता है. सोशल मीडिया पर मीम्स और वीडियो इस तुलना को बढ़ावा देते हैं.

लेकिन क्या यह सही है? बिल्कुल नहीं. सबसे पहले, दोनों कभी आमने-सामने नहीं आए. वे मिले भी नहीं. भगत सिंह 1924 के बेलगाम कांग्रेस सत्र में अपने पिता के साथ गए थे, जहां गांधी अध्यक्ष थे, लेकिन कोई प्रत्यक्ष बातचीत का रिकॉर्ड नहीं है. उनकी उम्र और भूमिका अलग थी गांधी 61 साल के राष्ट्रीय नेता थे, भगत सिंह युवा क्रांतिकारी. गांधी पूरे देश को एकजुट करने वाले थे, जबकि भगत सिंह HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी) के माध्यम से युवाओं को प्रेरित करते थे.

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गांधी ने भगत सिंह की फांसी रोकने के लिए पूरी कोशिश की.दिल्ली वालों को पता है कि जिसे अब सुभाष पार्क कहा जाता है, वह कभी एडवर्ड पार्क  कहलाता था. उसी पार्क में सात मार्च, 1931 को महात्मा गांधी ने एक सार्वजनिक सभा को संबोधित किया था. वो सभा इसलिए आयोजित की गई थी ताकि गोरी सरकार पर भगत सिंह और उनके दोनों साथियों राजगुरु और सुखदेव को फांसी के फंदे से बचा लिया जाए. उस सभा में गांधी जी ने कहा था,''मैं किसी भी स्थिति में, किसी को फांसी की सजा देने को स्वीकार नहीं कर सकता हूं. मैं यह सोच भी नहीं सकता हूं कि भगत सिंह जैसे वीर पुरुष को फांसी हो.''

गांधी-इरविन समझौते (5 मार्च 1931) के दौरान गांधी ने वायसराय लॉर्ड इरविन से कई बार अपील की. 17 फरवरी 1931 को उन्होंने कहा, ''यह चर्चा से असंबंधित है, लेकिन वर्तमान माहौल को बेहतर बनाने के लिए भगत सिंह की फांसी को स्थगित कर दें.'' इरविन ने जवाब दिया कि स्थगन पर विचार किया जा सकता है. 18 फरवरी, 19 मार्च और 21-22 मार्च को भी बैठकें हुईं. अंतिम दिन 23 मार्च 1931 को गांधी ने इरविन को भावुक पत्र लिखा,''जनमत चाहे सही या गलत, सजा में रियायत मांगता है… शांति के हित में अंतिम अपील है.'' लेकिन ब्रिटिश सरकार ने फांसी एक दिन पहले (23 मार्च) कर दी ताकि कराची कांग्रेस प्रभावित न हो. गांधी ने इसे शर्त नहीं बनाया क्योंकि अहिंसा उनका मूल सिद्धांत था और समझौते की विश्वसनीयता बनाए रखनी थी.

क्या सुभाष चंद्र बोस ने भी की थी भगत सिंह की फांसी रुकवाने की कोशिश

सुभाष चंद्र बोस ने भी कहा कि उन्होंने बहुत कोशिश की. भगत सिंह खुद माफी की अर्जी नहीं देना चाहते थे, वे शहीद होना चाहते थे ताकि क्रांति का संदेश जाए. इसलिए आरोप कि गांधी ने नहीं बचाया गलत है और राजनीतिक प्रचार का हिस्सा है.
विचारधारा में अंतर था, लेकिन दोनों पूरक थे. भगत सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियों ने ब्रिटिश को डराया और गांधी के सत्याग्रह को मजबूती दी. दोनों धर्म के नाम पर नफरत के खिलाफ थे भगत सिंह नास्तिक थे, गांधी आस्तिक लेकिन सर्वधर्म समभाव के पक्षधर.

स्वतंत्रता संग्राम विविधता का था गांधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, आंबेडकर, सभी ने अलग-अलग योगदान दिया. भगत सिंह की शहादत ने युवाओं को जगाया, गांधी ने जनता को संगठित किया. दोनों बिना एक-दूसरे के अधूरे हैं. भगत सिंह ने जेल में भूख हड़ताल की, जो सत्याग्रह जैसी थी. गांधी ने हिंसा की निंदा की लेकिन बहादुरी का सम्मान किया. भगत सिंह बनाम गांधी एक मिथ्या बहस है. दोनों ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया. भगत सिंह की 23 साल की उम्र में शहादत और गांधी की 78 साल की अहिंसक यात्रा, दोनों प्रेरणा स्रोत हैं. हमें तुलना नहीं, सम्मान करना चाहिए. इतिहास से सीखें कि स्वतंत्रता के कई रास्ते होते हैं, लेकिन लक्ष्य एक. आज जब देश चुनौतियों का सामना कर रहा है, तो दोनों की विरासत—बहादुरी और अहिंसा—को एकजुट होकर अपनाएं.

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(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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