विश्व रंगमंच दिवस: दिल्ली में रवींद्रनाथ टैगोर के सामने हुआ था पहला बंगाली नाटक, कैसी है कुमाऊंनी नाटक परंपरा

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विवेक शुक्ल

यदि कोई यह समझता है कि राजधानी दिल्ली में केवल हिंदी नाटक ही मंचित होते रहे हैं, तो उसे अपनी जानकारी को दुरुस्त कर लेनी चाहिए. यहां कुमाऊंनी, गढ़वाली, पंजाबी और बंगाली नाटकों की समृद्ध परंपरा रही है. यह प्रवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान, स्मृतियों और जड़ों को जीवंत रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है.

दिल्ली में पहला बंगाली नाटक कब खेला गया 

दिल्ली में बंगाली थियेटर की शुरुआत करीब 100 साल पहले हुई. यह बंगाली समुदाय की अपनी संस्कृति को बचाने और संरक्षित करने की निरंतर कोशिशों से जुड़ी हुई है. सबसे पुराना ज्ञात प्रदर्शन 1932 का है, जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर दिल्ली पधारे थे. उनके सम्मान में एक बंगाली नाटक मंचित किया गया था.

समय के साथ कश्मीरी गेट, करोल बाग और चित्तरंजन पार्क जैसे बंगाली-बहुल इलाकों में यह थियेटर काफी सक्रिय हो गया. शुरू में नाटक मुख्यतः दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा जैसे त्योहारों के दौरान स्कूलों या सामुदायिक हॉल में होते थे. अधिकांश नाटक कोलकाता से लिए जाते थे, जिनमें घर की याद और पारंपरिक संस्कृति की झलक साफ दिखती थी.

साल 1969 में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया. दिलीप बसु और उनके साथियों ने 'नाट्यकाल' नामक थियेटर समूह की स्थापना की. इस समूह ने मूल कहानियां लिखीं और नाटकों में राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों को शामिल किया. राज्य नियंत्रण, सामाजिक असमानता और नक्सलबाड़ी आंदोलन जैसे विषयों पर नाटक मंचित किए गए. सामूहिक लेखन, एक कलाकार द्वारा बहु-भूमिकाएं निभाना और सामाजिक संदेश देना दिल्ली के बंगाली थियेटर की प्रमुख विशेषता बन गया. यह कोलकाता के थियेटर से अधिक प्रयोगधर्मी और अलग था.

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बंगाली नाटकों का बदलता कैनवास

यूनियन एकेडमी स्कूल की पूर्व प्रिंसिपल मंजू मजूमदार कहती हैं कि आज दिल्ली का बंगाली थियेटर और भी विविध हो गया है. भाषा और परंपरा अभी भी मजबूत हैं, लेकिन कई समूह अब बहुभाषी नाटक और समकालीन विषयों पर काम कर रहे हैं. त्योहारों और सांस्कृतिक संगठनों के माध्यम से यह परंपरा जीवित है. यह थियेटर पुरानी यादों को संजोता है साथ ही नई सोच भी लाता है.

दिल्ली में बंगाली नाटकों की परंपरा सबसे समृद्ध और संगठित मानी जाती है. वर्तमान में करीब 22 पंजीकृत बंगाली थियेटर समूह सक्रिय हैं, जो मुक्तधारा ऑडिटोरियम (गोल मार्केट) और बीसी पाल ऑडिटोरियम (चित्तरंजन पार्क) जैसे स्थानों पर नियमित मंचन करते हैं. परेश दास, गौर दास, उत्पल मुखर्जी और निर्मल जैसे अग्रणी कलाकारों ने दिल्ली के बंगाली नाट्य को नई दिशा दी.साल 2002 में स्थापित आकृति थियेटर ग्रुप सामाजिक प्रासंगिकता वाले नाटकों पर विशेष जोर देता है.

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नई पीढ़ी के कलाकार पलाश दास,पूर्णेन्दु भट्टाचार्य, रवीशंकर कर आदि परंपरा और नवीनता का सुंदर मेल प्रस्तुत करते हैं. दिल्ली में बंगाली थियेटर दुर्गा पूजा के अवसर पर जात्रा (लोक-नाट्य) को भी पुनर्जीवित करता है.
क्लासिक नाटकों जैसे 'पाथेर पांचाली' से लेकर प्रयोगात्मक प्रस्तुतियों तक यहां सब कुछ देखने को मिलता है. दर्शकों की संख्या में कभी-कभी कमी की शिकायत रहती है, फिर भी ये नाटक बंगाली डायस्पोरा की स्मृति और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती प्रदान करते हैं. 

दिल्ली में कुमाऊंनी नाटकों की परंपरा कब शुरू हुई

दिल्ली में कुमाऊंनी थियेटर भी काफी सशक्त रहा है. इसकी नींव सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और लोक-संगीत के मर्मज्ञ मोहन उप्रेती ने रखी.साल 1963 में दिल्ली आए मोहन उप्रेती ने 1968 में पर्वतीय कला केंद्र की स्थापना की, जिसमें पर्वतीय क्षेत्र के लोक कलाकारों का सहयोग प्राप्त था. इसके तहत कुमाऊंनी भाषा में अनेक नाटक मंचित होते रहे.

माना जाता है कि दिल्ली में कुमाऊंनी थियेटर की नींव रंगकर्मी और लोक-संगीत के मर्मज्ञ मोहन उप्रेती ने रखी थी. Photo Credit: Special Arrangement

उन्होंने राजुला-मालूशाही, रसिक-रमौल, जीतू-बगड़वाल, रामी-बौराणी, अजुवा-बफौल जैसी 13 प्रमुख लोक-कथाओं और विश्व की सबसे लंबी गाथा रामलीला का कुमाऊंनी और गढ़वाली में अनुवाद और मंचन किया. इनके प्रदर्शन कामयनी सभागार में होते थे, जहां सभागार खचाखच भर जाता था. विश्व मोहन बड़ोला,विनोद नागपाल, नईमा खान उप्रेती और उर्मिला नागर जैसे मंजे हुए कलाकार इन नाटकों से जुड़े रहे.

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मोहन उप्रेती की 1997 में असामयिक मृत्यु से दिल्ली के कुमाऊंनी रंगमंच को बड़ा झटका लगा. उन्होंने ही दिल्ली में कुमाऊंनी रामलीला की नींव रखी, जो संवाद-प्रधान होने के बजाय ओपेरा शैली में गायन-आधारित होती है.कुमाऊंनी नाटकों की जड़ें 1860 के दशक में कुमाऊंनी रामलीला और होली के 'स्वांग' से जुड़ी हैं. यहां रामलीला गीतात्मक-नाट्य शैली में प्रस्तुत होती है,जिसमें संगीत, नृत्य और लोक-गीत प्रमुख भूमिका निभाते हैं.

दिल्ली सरकार की गढ़वाली-कुमाऊंनी एवं जौनसारी भाषा अकादमी इन नाटकों को सरकारी समर्थन देती है. हाल के सालों में 'घुघुती और कौव' जैसे नाटकों ने खासी चर्चा बटोरी. युगमंच जैसे समूह व्यंग्यात्मक नाटकों में कुमाऊंनी लोक-शैली का सफल प्रयोग करते हैं. रंगकर्मी निर्मल पंत के अनुसार, दर्शकों की कमी और डिजिटल मनोरंजन की बढ़ती लोकप्रियता चुनौतियां हैं, लेकिन कलाकार और सांस्कृतिक संगठन इसे बचाने तथा नया रूप देने में लगे हुए हैं.

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दिल्ली में गढ़वाली नाटकों की परंपरा

1980 के दशक के प्रारंभ तक दिल्ली में गढ़वाली नाटक खूब मंचित होते थे, खासतौर पर श्रीराम सेंटर में. एनडीएमसी के पूर्व सूचना निदेशक मदन थपलियाल ने भी कई गढ़वाली नाटकों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं. दिल्ली में गढ़वाली नाटकों की शुरुआत 1960 के आसपास हुई. ललित मोहन थपलियाल ने 'खांडू लापता', 'घरजवाई', 'काला राजा' जैसे कई नाटक लिखे. रिहर्सल किदवई नगर के कम्युनिटी सेंटर या सरोजनी नगर के सरकारी फ्लैटों की छत पर होती थी. इन नाटकों की अखबारों में समीक्षाएं भी प्रकाशित होती थीं. विश्व मोहन बड़ोला, उमाशंकर चंदोला और उनकी पत्नी सुषमा चंदोला (सिंधी मूल की) इनमें सक्रिय रहे.

राष्ट्रीय राजधानी में खेला गया एक गढ़वाली नाटक.
Photo Credit: Special Arrangement

वरिष्ठ लेखक सुनील नेगी के अनुसार, गढ़वाली नाटक भी उत्तराखंडी सांस्कृतिक धारा का हिस्सा हैं, लेकिन इनमें लोक-कॉमेडी और वीर-गाथाओं का प्रभाव अधिक है. आज ये नाटक मुख्यतः सांस्कृतिक कार्यक्रमों, दुर्गा पूजा और दिल्ली सरकार की अकादमी के आयोजनों में देखे जाते हैं. गढ़वाल भवन, डाबड़ी मोड़, विनोद नगर और किशनगंज जैसे क्षेत्रों में भी बीच-बीच में गढ़वाली नाटक मंचित होते रहते हैं.

दिल्ली में पंजाबी नाटकों की परंपरा

दिल्ली में पंजाबी नाटकों का इतिहास विभाजन के बाद की पंजाबी शरणार्थी संस्कृति से गहराई से जुड़ा है. साल 1947 के बंटवारे ने लाखों पंजाबियों को दिल्ली लाया, जहां उन्होंने अपनी भाषा, संगीत और लोक परंपराओं को बचाने के लिए नाट्य गतिविधियां शुरू कीं. दिल्ली पंजाबी थिएटर का प्रमुख केंद्र बन गया, जहां सप्रू हाउस और कम्युनिटी सेंटर्स जैसे मंचों पर प्रदर्शन हुए. आधुनिक पंजाबी नाटक सामाजिक मुद्दों, शरणार्थी जीवन, परिवारिक संबंधों और सांस्कृतिक पहचान पर केंद्रित रहे.

दिल्ली सरकार की पंजाबी अकादमी की ओर से आयोजित समारोह में नाटख खेलते कलाकार.

आधुनिक पंजाबी थिएटर की नींव आयरिश महिला नौरा रिचर्ड्स ने रखी, जो 1911 में भारत आईं और लाहौर में सरस्वती स्टेज सोसाइटी स्थापित की. उन्होंने सामाजिक यथार्थवादी नाटकों को बढ़ावा दिया, जैसे आईसी नंदा का 'सुहाग' (1913) जो बाल विवाह पर था. दिल्ली में उनका प्रभाव विभाजन के बाद भी महसूस हुआ. 1950-60 के दशक में दिल्ली आर्ट थिएटर की स्थापना हुई. इसमें शीला भाटिया (1916-2009) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनकी लिरिकल और ओपेरा स्टाइल की म्यूजिकल प्रोडक्शंस ने दिल्ली के पंजाबी दर्शकों को आकर्षित किया. उन्होंने पंजाबी कविता, संगीत और सांस्कृतिक संदर्भों को मंच पर जीवंत किया, जो विभाजन से टूटे समुदाय को नई पहचान दिलाने में मददगार साबित हुए. शीला भाटिया की प्रस्तुतियां सप्रू हाउस के व्यावसायिक, अश्लील और बफूनरी स्टाइल वाले नाटकों के विपरीत साहित्यिक गहराई लाईं.

1970 के दशक में प्रेम जालंधरी के सप्रू हाउस शो मध्यमवर्गीय पंजाबी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुए, हालांकि ये मनोरंजन पर अधिक केंद्रित थे. इसी दौर में गुरशरण सिंह (1929-2011) ने क्रांतिकारी योगदान दिया.वे इंजीनियर से थिएटरकर्मी बने और 'थर्रा थिएटर' (प्लेटफॉर्म थिएटर) की अवधारणा विकसित की. गांवों से लेकर दिल्ली तक वे सामाजिक जागरूकता, धार्मिक कट्टरता और किसान मुद्दों पर नाटक मंचित करते रहे. दिल्ली में उनके प्रदर्शन ने युवा कलाकारों को प्रेरित किया. अन्य प्रमुख नामों में बलवंत गर्गी, हरचरण सिंह, नवनींद्र बेहल, बलराज पंडित (नाटकवाला), केवल ढलीवाल और अतामजीत शामिल हैं, जिन्होंने नई अभिव्यक्ति शैलियां अपनाईं. एनएसडी दिल्ली ने भी पंजाबी नाटकों को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया, जहां प्रशिक्षित कलाकारों ने लोक और आधुनिक तत्वों का मिश्रण किया.कुल मिलाकर, दिल्ली पंजाबी थिएटर का प्राण केंद्र रहा है, जहां परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम हुआ. 

इन चारों नाट्य-परंपराओं का दिल्ली में सह-अस्तित्व सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है. कुमाऊंनी और गढ़वाली नाटक पहाड़ी लोक-संस्कृति को संरक्षित करते हैं, पंजाबी थिएटर पंजाबी जोश को जीवंत रखता है, जबकि बंगाली थिएटर बंगाल की गहन संवेदनाओं को मंचित करता है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी), दिल्ली सरकार की भाषा अकादमियां और विभिन्न समुदायिक प्रयास इन परंपराओं की निरंतरता सुनिश्चित कर रहे हैं. डिजिटलीकरण और युवा रुचि की कमी जैसी आधुनिक चुनौतियों के बावजूद, ये नाटक दिल्ली को सच्ची सांस्कृतिक राजधानी बनाए रखते हैं. ये केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता के सूत्र भी हैं. कुल मिलाकर, ये परंपराएं दिल्ली की विविधता का गौरव हैं और भविष्य में भी फलती-फूलती रहेंगी.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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