आजकल हर तरफ AI की चर्चा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जो मशीनों को इंसानों जैसा सोचने-समझने की ताकत दे रही है.भारत में प्राइवेट और गवर्नमेंट सेक्टर में काम करने वाले बहुत से लोग अब सोच रहे हैं कि ये AI उनकी नौकरी छीन लेगा या नहीं. लेकिन ये बात नई नहीं है. याद कीजिए 1980 और 1990 के दशक को, जब कंप्यूटर भारत में आने लगे थे. तब भी यही डर था. मजदूर यूनियनें सड़कों पर उतर आईं, हड़तालें कीं. उनका दावा था कि कंप्यूटर नौकरियां खा जाएगा. सरकारी दफ्तरों में, बैंक में, रेलवे में, हर जगह कंप्यूटर का विरोध हुआ.
मैं उस दौर में हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के संपादकीय विभाग में काम कर रहा था. मुझे याद है कि तब बहुत सारे पत्रकार और गैर-पत्रकार साफ तौर पर कह रहे थे कि वे कम्प्यूटर नहीं सीखेंगे. यकीन मानिए कि जो लोग उस वक्त कंप्यूटर सीखने से पीछे हट गए, उन्हें बाद में करियर में बड़ा नुकसान हुआ. आज AI के साथ भी वही हो रहा है. बेहतर है कि सब लोग वक्त के साथ चलें, नई तकनीक को अपनाएं.
तब क्या हुआ था?
भारत में कंप्यूटर की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी, लेकिन असली बवाल 1990 के दशक में मचा. उस वक्त भारत सोशलिस्ट इकोनॉमी की तरफ था, जहां गवर्नमेंट सब कुछ कंट्रोल करती थी. प्राइवेट सेक्टर में भी लाइसेंस राज था. कंप्यूटर को लोग 'जॉब किलर' मानते थे. क्यों? क्योंकि कंप्यूटर से काम तेज होता, लेकिन कम लोगों की जरूरत पड़ती. देश की मजदूर यूनियनों ने कंप्यूटर का विरोध किया. उन्हें लगता था कि ये अमीरों की साजिश है, जो गरीब मजदूरों की नौकरी छीन लेगी.
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उदाहरण लीजिए बैंकिंग सेक्टर का. 1980 के दशक में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने कंप्यूटरीकरण को बढ़ावा दिया. 1984 में रंगराजन कमेटी बनी.उसने बैंकों में कंप्यूटर लगाने की सिफारिश की. लेकिन ट्रेड यूनियनों ने 1984 को 'एंटी-कंप्यूटरीकरण ईयर' घोषित कर दिया. बैंक कर्मचारियों ने हड़तालें कीं. लाखों कर्मचारी सड़कों पर उतरे. वे कहते थे कि कंप्यूटर से हजारों क्लर्कों की नौकरी चली जाएगी. एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस वक्त बैंक में कंप्यूटर लगाने से 20-30 फीसदी स्टाफ कम होने का अनुमान था. यूनियन के नेता नारा लगाते थे, 'कंप्यूटर नहीं चलेगा, मजदूरों का हक नहीं जाएगा!' केरल में माकपा ने कंप्यूटरीकरण का खुलकर विरोध किया. 1980 के आखिर और 1990 की शुरुआत में माकपा के नेता कहते थे कि कंप्यूटर बुर्जुआ क्लास की साजिश है, जो मजदूरों को बेरोजगार करेगा. वहां गवर्नमेंट दफ्तरों में कंप्यूटर लगाने पर पिकेटिंग हुई, मशीनें तोड़ी गईं.
सरकारी सेक्टर में भी यही हाल था. रेलवे में 1980 में जब कंप्यूटराइज्ड रिजर्वेशन सिस्टम लाने की कोशिश हुई, तो ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन ने विरोध किया. मुझे याद है कि एक बार मैं रिपोर्टिंग के लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन गया तो, वहां भी कम्प्यूटर का कसकर विरोध हो रहा था. तब रेलवे की मजदूर संघों का कहना था कि टिकट बुकिंग, अकाउंटिंग सब मैनुअल है, कंप्यूटर आएगा तो हजारों क्लर्क बेकार हो जाएंगे.
साल 1990 तक रेलवे में कंप्यूटर बहुत कम थे. टाटा और बिड़ला जैसे प्राइवेट सेक्टर में भी यूनियनें मैनेजमेंट से लड़ती थीं. 'इंडियन IT इंडस्ट्री एंड नियोलाइबरलिज्म' में लिखा है कि कंप्यूटरीकरण को यूनियनों ने सफलतापूर्वक रोका था, लेकिन राजीव गांधी की रुचि की वजह से ये आगे बढ़ा.
किसे क्या नुकसान हुआ?
जो लोग उस वक्त कंप्यूटर नहीं सीखे, उन्हें बड़ा झटका लगा. 1990 के दशक में जब इकोनॉमिक रिफॉर्म्स आए, तो कंप्यूटर हर जगह लग गए. बैंक में ATM आ गए, रेलवे में टिकटों की ऑनलाइन बुकिंग शुरू हो गई. लेकिन जो क्लर्क कंप्यूटर नहीं जानते थे, उन्हें प्रमोशन नहीं मिला या रिटायरमेंट लेना पड़ा. एक स्टडी में कहा गया है कि 1980-2000 के बीच, जो सेक्टर कंप्यूटरीकृत हुए, वहां प्रोडक्टिविटी 50 फीसदी बढ़ी, लेकिन अनस्किल्ड वर्कर्स की सैलरी नहीं बढ़ी. कई लोग बेरोजगार हो गए.
एक उदाहरण लें. बैंक ऑफ इंडिया में 1980 में विरोध करने वाले कर्मचारी 1990 में पिछड़ गए. नए रिक्रूट्स कंप्यूटर स्किल्स वाले थे. यूनियन लीडर्स भी बाद में मानते थे कि विरोध गलत था. 'As debate rages over AI displacing jobs, history offers some insights' शीर्षक वाली एक रिपोर्ट में लिखा है कि कंप्यूटरीकरण से शुरू में डर था, लेकिन बाद में ये प्रोडक्टिविटी बढ़ाने वाला साबित हुआ. जो नहीं अपनाए, वे मार्केट से बाहर हो गए. इसी दौर में भारत में इंफोसिस,टीसीएस और विप्रो जैसी कंपनियां कंप्यूटर साफ्टवेयर के फिल्ड में उतरीं और आईटी इंडस्ट्री की दुनिया की सरताज हैं.
दुनिया से सीख
भारत अकेला नहीं था. अमेरिका में 1960 में ऑटोमेशन से यूनियनें विरोध करती थीं. ब्रिटेन में माइनर्स स्ट्राइक (1984) में कंप्यूटरीकरण एक मुद्दा था. लेकिन जो अपनाए, वे आगे बढ़े. जापान ने 1980 में रोबोट्स अपनाए और इकोनॉमी बूम हुई. भारत में भी, सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री 1990 में ग्रो की क्योंकि कुछ लोगों ने कंप्यूटर सीखा. आज भारत आईटी हब है, लेकिन शुरुआत में विरोध से देरी हुई.
पुरानी गलती फिर मत दोहराना
आज AI आ रहा है. चैटजीपीटी, मशीन लर्निंग, ऑटोमेशन. बैंक में AI चैटबॉट्स कस्टमर सर्विस कर रहे हैं. फैक्टरियों में रोबोट्स. गवर्नमेंट में ई-गवर्नेंस AI से. लेकिन फिर वही डर. मजदूर यूनियनें कह रही हैं कि AI नौकरियां छीनेगा. 2023-24 में भारत में कई हड़तालें हुईं, जैसे कि IT सेक्टर में छटनी के खिलाफ. लेकिन इतिहास बताता है कि विरोध से कुछ नहीं होगा. पुराने उदाहरण बताते हैं कि तकनीक रोक नहीं सकती. कंप्यूटरीकरण से भारत IT सुपरपावर बना. AI से भी बनेगा, लेकिन उसे अपनाओ. इस दौर में जो उसका विरोध करेंगे, उनका नुकसान होगा. आओ सब मिलकर आगे बढ़ें.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














