22 सितंबर 1857. मंगलवार. दिल्ली के काबुली दरवाजे के पास सुबह एक बैलगाड़ी आकर रुकी. इस बैलगाड़ी में अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के दो बेटों मिर्जा मुगल और मिर्जा खिज्र सुल्तान और उनके पौत्र मिर्जा अबू बकर सवार थे. इन तीनों को ईस्ट इंडिया कंपनी के हार्स रेजीमेंट के अधिकारी मेजर विलियम हॉडसन ने बैलगाड़ी से उतरवाया. उन्होंने तीनों के ऊपरी कपड़े उतरवाए. इसके बाद उसने तीनों की गोली मारकर हत्या कर दी. इस घटना के बाद से ही दिल्ली के काबुली दरवाजे को खूनी दरवाजा कहा जाने लगा.
कब मारी गई थी बहादुर शाह जफर के बेटों को गोली
यह घटना दिल्ली पर अंग्रेजी राज कायम होने के ठीक अगले दिन हुई. 21 सितंबर 1857 को सप्ताह भर की भीषण लड़ाई के बाद कंपनी सेना ने दिल्ली पर कब्जा जमा लिया था. बहादुर शाह जफर हुमायूं के मकबरे में शरण लिए बैठे थे. हॉडसन ने जीवन की गारंटी देकर उनका आत्मसमर्पण कराया था. इसके अगले दिन वह तीन राजकुमारों को भी बिना शर्त आत्मसमर्पण करवाकर मकबरे से लाल किले की ओर ले जा रहा था. काबुली दरवाजे के पास भीड़ जमा हुई. हॉडसन ने भीड़ के सामने ही तीनों को गोली मार दी थी.
इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने 'द लास्ट मुगल' में लिखा है कि यह कोल्ड ब्लडेड मर्डर था. इतिहासकार आरसी मजूमदार ने इसे 'अमानवीय अत्याचार' बताया है. उन्होंने अंग्रेजों के उस बहाने को खारिज किया था कि भीड़ शहजादों को छुड़ा लेती. मिर्जा मुगल करीब 40 साल के थे. वो 1857 के विद्रोह के शुरू से ही सैन्य नेतृत्व से जुड़े हुए थे. खिज्र सुल्तान 22-23 साल के थे और अबू बकर भी युवा ही थे. तीनों के शवों की चांदनी चौक की कोतवाली के सामने प्रदर्शनी लगाई गई थी.
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हॉडसन ने बाद में लिखा कि भीड़ ने उन्हें घेर लिया था. उन्होंने 'इन कसाइयों' को सजा दी जो महिलाओं-बच्चों की हत्या के जिम्मेदार थे. भारतीय इतिहासकारों के अनुसार यह अंग्रेजों का बहाना था. तीनों लोग निहत्थे थे, समर्पण कर चुके थे और उन पर कोई औपचारिक मुकदमा नहीं चला. कुछ किताबों में उनके सिर काटकर जफर को भेज जाने की भी चर्चा मिलती है. तीनों के शव कई दिन तक सड़ते रहे थे. उन्हें बीमारी फैलने के डर की वजह से दफनाया गया था.
यह घटना मुगल वंश के उत्तराधिकारियों का अंत थी. बहादुर शाह जफर पर मुकदमा चला. उन्हें रंगून निर्वासित किया गया था. वहां 1862 में उनकी मृत्यु हो गई.
किसने बनवाया था दिल्ली का 'खूनी दरवाजा'
खूनी दरवाजे के नाम से मशहूर हुए काबुली दरवाजे को शेर शाह सूरी ने 1540-45 के आसपास बनवाया था. इसका मूल नाम काबुली या लाल दरवाजा था. यह दरवाजा करीब 15.5 मीटर ऊंचा और 13 मीटर चौड़ा है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसे संरक्षित स्मारक मानता है. यह दरवाजा दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज और फिरोज शाह कोटला स्टेडियम के बीच यह खड़ा है. 1947 के विभाजन के समय भी यहां हिंसा हुई थी. साल 2002 की एक घटना के बाद इस दरवाजे को सील कर दिया गया था.
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर विनय अग्रवाल ने 1960 के दशक के अंतिम सालों में मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में ज्वाइन किया था.वे बताते हैं कि वे खूनी दरवाजे के आगे से गुजरते हुए इससे जुड़ी खूनी कहानी को याद करने लगते थे. उन कहानियों को उन्होंने अपने बचपन में सुना था.
कौन था विलियम हॉडसन
विलियम हॉडसन अंग्रेज घुड़सवार अधिकारी था. वह ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्मी से जुड़ा था. उसी ने 1857 में घुड़सवार रेजिमेंट हॉडसन हॉर्स खड़ी की. अंग्रेज सरकार उन्हें साहसी कमांडर मानती थी. लेकिन भारतीय इतिहासकार उन्हें हत्यारा मानते हैं. उन पर लूट और मनमानी के आरोप लगे. लखनऊ में बेगम कोठी (बेगम महल) पर हमले के दौरान 11 मार्च 1858 को उन्हें गोली लगी. इससे अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई थी. विडंबना यह है कि विलियम हॉडसन के नाम पर दिल्ली में हडसन लेन आज भी आबाद है.
दिल्ली का खूनी दरवाजा दिल्ली में मुगल साम्राज्य के अंत और अंग्रेजी राज की शुरुआत का गवाह है. यह दरवाजा केवल पत्थरों से बनी कोई संरचना भर नहीं है, बल्कि 1857 की प्रतिशोध की राजनीति और मुगल साम्राज्य के अंत का जीवित स्मारक है. दिल्ली की सड़कों से गुजरते हुए, इतिहास यहां ठहर सा जाता है.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)