खटिया पर लेटाकर बीमार महिला को अस्पताल ले जा रहे थे लोग, रास्ते में ही तोड़ा दम; फिर उसी चारपाई पर आया शव

बिहार के नवादा जिले के अजीतगढ़ से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली तस्वीर सामने आई है. गांव में सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस नहीं थी, जिस कारण बीमार महिला को खटिया पर ले जाया जा रहा था लेकिन रास्तें में ही उसने दम तोड़ दिया.

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बीमार महिला को चारपाई पर ले जाते ग्रामीण.
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  • नवादा जिले के अजीतगढ़ गांव में सड़क न होने के कारण बीमार महिला प्रमिला देवी को अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका
  • ग्रामीणों ने चारपाई पर महिला को कंधे पर उठाकर दो किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक ले जाने की कोशिश की
  • गांव में सड़क न होने से बीमार, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग अक्सर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते हैं
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नवादा:

बिहार से एक शर्मसार कर देने वाली हकीकत सामने आई है, जहां विकास के दावों के बीच एक महिला की मौत इसलिए हो गई, क्योंकि उसके गांव तक सड़क नहीं थी. यह कहानी है कि बिहार के नवादा जिले के मेसकौर प्रखंड अंतर्गत सहवाजपुर सराय पंचायत का अजीतगढ़ गांव की, जहां शनिवार को बीमार महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए न एंबुलेंस आई, न कोई वाहन की सुविधा. ग्रामीणों ने मजबूरी में महिला को चारपाई पर लिटाकर कंधे पर उठाया लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी सांसें थम गईं. 

चारपाई पर जिंदगी, रास्ते में मौत

जब प्रमिला देवी की तबीयत अचानक बिगड़ी, तो परिजनों ने एंबुलेंस बुलाने की कोशिश की. लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण कोई वाहन नहीं आ सका. मजबूरी में ग्रामीणों ने चारपाई को ही सहारा बनाया. चार लोग कंधे पर खटिया उठाकर महिला को गांव से मुख्य सड़क तक ले जाने लगे. करीब दो किलोमीटर दूर. लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था. मुख्य सड़क तक पहुंचने से पहले ही प्रमिला देवी ने दम तोड़ दिया. इसके बाद वही चारपाई, जो कुछ देर पहले जिंदगी की उम्मीद थी, अब शव ढोने का साधन बन गई. उसी खटिया से महिला का शव वापस गांव लाया गया.

यह पहली मौत नहीं, यह गांव की नियति है

ग्रामीणों के अनुसार यह कोई पहली घटना नहीं है. अजीतगढ़ में सड़क नहीं होने की वजह से बीमार, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग अक्सर ऐसी ही परिस्थितियों से गुजरते हैं. ग्रामीण उपेंद्र राजवंशी कहते हैं, 'गांव से करीब दो किलोमीटर दूर मुख्य सड़क है, लेकिन आज तक अजीतगढ़ तक सड़क नहीं बनी. बीमार पड़ने पर हम लोग भगवान भरोसे रहते हैं.'

विकास के वादे, चुनाव के बाद चुप्पी

ग्रामीणों की पीड़ा सिर्फ सड़क की नहीं है, बल्कि टूटे हुए वादों की है. लोग कहते हैं कि चुनाव के समय नेता आते हैं, हाथ जोड़ते हैं, सड़क बनाने का वादा करते हैं लेकिन चुनाव खत्म होते ही अजीतगढ़ फिर नक्शे से गायब हो जाता है. ग्रामीणों का कहना है कि वे आज भी खुद को आदिम युग में जीता हुआ महसूस करते हैं. जहां न सड़क है, न स्वास्थ्य सुविधा, न आपातकाल में मदद.

महादलित गांव, 60 परिवार और शून्य सुविधा

अजीतगढ़ गांव मेसकौर प्रखंड के सहवाजपुर सराय पंचायत क्षेत्र में स्थित है. यह एक महादलित गांव है, जहां रजवार जाति की बहुलता है. गांव में करीब 60 परिवार रहते हैं. भौगोलिक स्थिति यह है कि मंझवे–सीतामढ़ी मार्ग के महुआहरी मोड़ से अजीतगढ़ की दूरी लगभग 2 किलोमीटर है. बेलवान-ओरैना सड़क से टिमलबीघा मोड़ से पश्चिम में करीब डेढ़ किलोमीटर. लेकिन आज भी यह गांव सड़क सुविधा से पूरी तरह वंचित है.

स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली की पहली तस्वीर नही...

नवादा में बदहाल स्वास्थ व्यवस्था की पहली तस्वीर नही है. इसके पहले दिसंबर में दो तस्वीर सामने आई थी, जब एंबुलेंस की जगह ठेला और स्ट्रेचर से शव को गांव ले जाने को ग्रामीण मजबूर हुए थे. गोविंदपुर में अस्पताल से शव को ले जाने के लिए एंबुलेंस नही मिला. ठेला रिक्शा से शव को ग्रामीण  ले जाने को मजबूर हुए थे. इसके पहले अकबरपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की तस्वीर सामने आई थी, जब मरीज की मौत के बाद उसे शव वाहन नहीं उपलब्ध कराया गया था. शव को स्ट्रेचर पर खींचकर परिजन अस्पताल से घर ले गए थे, लेकिन स्ट्रेचर के बदले में मृतक महिला के पोते और बहू को गिरवी रहना पड़ा था.

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