- दरभंगा राज की अंतिम महारानी महारानी कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की आयु में स्थानीय कल्याणी निवास में निधन हो गया
- महारानी कामसुंदरी देवी महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं और उन्होंने 64 वर्ष तक वैधव्य जीवन व्यतीत किया
- दरभंगा राजवंश की स्थापना सोलहवीं सदी में महेश ठाकुर द्वारा हुई और यह मिथिला क्षेत्र का एक शक्तिशाली रजवाड़ा था
दरभंगा: मिथिला के गौरवशाली इतिहास की साक्षी रहीं दरभंगा राज की अंतिम महारानी महारानी कामसुंदरी देवी का सोमवार तड़के स्थानीय कल्याणी निवास में निधन हो गया. वह 94 वर्ष की थीं और पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रही थीं. उनके निधन के साथ ही दरभंगा राज की जीवंत स्मृतियों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया.
महारानी कामसुंदरी देवी, दरभंगा राज के अंतिम महाराजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं. उनका जन्म 22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी जिले के मंगरौनी गांव में हुआ था. महज आठ वर्ष की आयु में उनका विवाह महाराजा कामेश्वर सिंह से हुआ. अक्टूबर 1962 में महाराजा के निधन के बाद महारानी ने 64 वर्षों तक वैधव्य जीवन व्यतीत किया.
सादगीपूर्ण जीवनशैली के लिए जानी जाने वाली महारानी राजसी वैभव और चकाचौंध से दूर रहकर दया, करुणा, प्रेम और सद्भावना की प्रतिमूर्ति बनी रहीं. निसंतान होने के बावजूद उन्होंने समाज को ही अपना परिवार माना और शिक्षा, धर्म तथा सामाजिक सरोकारों को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया. दरभंगा राज परिवार से जुड़ी मराठी मूल की शिक्षिका गंगाबाई से उन्होंने अंग्रेजी सहित विभिन्न विषयों की शिक्षा प्राप्त की.
महारानी कामसुंदरी देवी जीवन भर राजपरंपरा की मर्यादाओं का निर्वाह करते हुए लोकजीवन से जुड़ी रहीं. वैभव और ऐश्वर्य के बीच रहते हुए भी उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल, संयमी और संवेदनशील रहा. उनका जीवन मौन साधना, त्याग, अनुशासन और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा को समर्पित रहा. मिथिला, मैथिली और दरभंगा राज परिवार के इतिहास पर पकड़ रखने वाले इतिहासकार डॉ० शंकर देव झा ने बताया कि दरभंगा राज, बिहार के मिथिला क्षेत्र का एक शक्तिशाली और समृद्ध रजवाड़ा रहा था, जिसकी स्थापना 16वीं सदी में हुई. यह शिक्षा, कला और सामाजिक कार्यों में अपने योगदान के लिए जाना जाता है.
इसकी शुरुआत मुगल सम्राट अकबर द्वारा 1577 में महेश ठाकुर को तिरहुत का कार्यवाहक (गवर्नर) नियुक्त करने से हुई, जिससे खंडवला ब्राह्मण परिवार की शक्ति बढ़ी और पश्चात 18वीं शताब्दी में माधव सिंह ने दरभंगा को अपनी राजधानी बनायी. ब्रिटिश काल में, यह भारत के सबसे बड़े जमींदारों में से एक था, जो लगभग 24,000 वर्ग मील में फैला था और इसमें कई 110 से अधिक परगने शामिल थे. इस परिवार की संपत्तियाँ देश-विदेशों में भी थीं, और इसके पास निजी हवाई जहाज और ट्रेन जैसी सुविधाएं थीं, जो इसकी भव्यता दर्शाती है. खंडवला शासन का कार्यकाल महाराज महेश ठाकुर से शुरू माना जाता है और 1962 में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के निधन के साथ समाप्त होना माना जाता है. 16वीं शताब्दी में खंडवला राजवंश का अभ्युदय हुआ जिसके अधिष्ठाता महेश ठाकुर माने जाते हैं. 18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के समय दरभंगा राज को जमींदार की श्रेणी में ला दिया गया तथापि दरभंगा राज में राज्य की अविभाज्यता की परंपरा को बरकरार रखा गया और इसी वंश के अंतिम राजा महाराजा कामेश्वर सिंह थे जिनकी तीसरी पत्नी महारानी कामसुंदरी का आज अहले सुबह स्थानीय कल्याणी निवास में निधन ह
खंडवला राजवंश का कार्यकाल
महेश ठाकुर का कार्यकाल 1556 से 1569, गोपाल ठाकुर का कार्यकाल 1569 से 1581, शुभंकर ठाकुर का कार्यकाल 1581 से 1617 और पुरुषोत्तम ठाकुर का कार्यकाल 1617 से 1641, सुंदर ठाकुर का कार्यकाल 1641 से 1668 महिनाथ ठाकुर का कार्यकाल 1668 से 1690, नरपति ठाकुर का कार्यकाल 1690 से 1700, राघव सिंह का कार्यकाल 1700 से 1739, विष्णु सिंह का कार्यकाल 1739 से 1743, नरेंद्र सिंह का कार्यकाल 1743 से 1760, प्रताप सिंह का कार्यकाल 1760 से 1775 ई० तक रहा है. खंडवला वंश के माधव सिंह का कार्यकाल 1775 से 1808 ई तक था वही क्षत्र सिंह का कार्यकाल 1808 से 1839, रूद्र सिंह का कार्यकाल 1839 से 1850, महेश्वर सिंह का कार्यकाल 1850 से 1860, लक्ष्मीश्वर सिंह का कार्यकाल 1879 से 1898, रमेश्वर सिंह का कार्यकाल 1898 से 1929 और कामेश्वर सिंह का कार्यकाल 1929 से 1962 में उनके निधन तक चला. इसी के साथ दरभंगा राज की राजशाही परंपरा समाप्त हो गई.
महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह जो भारतीय संविधान सभा के सदस्य रह चुके थे वर्षों तक राज्यसभा सांसद रहे और शिक्षा के क्षेत्र के साथ-साथ मिथिला के विकास के क्षेत्र में इनके विकास कार्यों को आज भी स्वर्ण अक्षर में अंकित किया जाता है. महाराजा कामेश्वर सिंह अंतिम शासकों में से एक हैं जो अपनी भव्यता, दानशीलता और भारत के प्रति प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे. उन्होंने अपने आवासीय राजमहल आनंद बाग को कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय को दान दे दिया, दरभंगा में मिथिला संस्कृत शोध संस्थान की स्थापना के साथ-साथ कामेश्वरी प्रिया पुअरहोम की स्थापना की, वही उन्हीं के राजकीय परिसर में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय अवस्थित है. विद्या के लिए इन्होंने अपना सर्वस्व अर्पित करने में कोई कसर बाँकी नहीं रखी. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय को भी इस परिवार द्वारा प्रचुर अनुदान दिया जाता रहा है. दरभंगा स्थित प्रसिद्ध दरभंगा मेडिकल कॉलेज भी इसी परिवार की देन है.
औद्योगिक विकास के क्षेत्र में भी राज परिवार का महत्तम योगदान रहा है सकरी, लोहट, रैयाम और हसनपुर चीनी मिलें, पंडौल में सूत मिल, हायाघाट में अशोक पेपर मिल वहीं समस्तीपुर में रमेश्वर जूट मिल की स्थापना में भी इस परिवार के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. भारत में विमान सेवा की शुरुआत भी दरभंगा राज से ही मानी जाती है 1962 में चीन के युद्ध के दौरान इस परिवार ने भारत सरकार को 600 किलो ग्राम बड़ी सोना दान में दिया था और अपना हवाई अड्डा भी भारत सरकार को दे दिया. लंदन से लेकर भारत में कोई ऐसा बड़ा शहर नहीं रहा होगा जहां दरभंगा राज परिवार का दरभंगा हाउस के नाम से अपना आवास न रहा हो. बनारस का दरभंगा घाट आज भी इस राजवंश की प्रभूता का गवाह बना हुआ है. पत्रकारिता के क्षेत्र में भी इस परिवार का योगदान स्वर्ण अक्षरों में अंकित करने योग्य है 1909 ईस्वी में दरभंगा राज द्वारा दरभंगा से मिथिला मिहिर नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया गया इसके बाद पटना में इंडियन नेशन प्रेस की स्थापना कर अंग्रेजी में इंडियन नेशन और हिंदी में आर्यावर्त अखबार का प्रकाशन राज परिवार द्वारा किया गया जो बिहार का माउथपीस माना जाता रहा.
1874 ईस्वी में भीषण अकाल के दौरान पटना के बाढ़ से अनाजों की खेप दरभंगा लाने के लिए दरभंगा राज द्वारा 33 लाख रुपये से वाजिदपुर से दरभंगा तक रेल लाइन बिछायी गई. मिथिलामें रेल को लाने और चतुर्दिक विस्तार देने में इस वंश का अवदान इतिहास के पन्नों में दर्ज है. जो तिरहुत स्टेट रेलवे के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी दरभंगा राज द्वारा ध्रुपद गायकी के लिए विश्व प्रसिद्ध अमता घराना को दरभंगा में प्रतिष्ठापित किया गया है. पंडित रामचतुर मल्लिक और विदुर मल्लिक इसी अमृता घराना के विभूती रहे हैं. ध्रुपद धमार के कलाकारों को संरक्षण दिया जाना उल्लेखनीय है.
आज भी दरभंगा राज की भव्य इमारतें, जैसे राम बाग पैलेस, आनन्द बाग पैलेस, नरगौना पैलेस, बेला पैलेस, राज किला, राजनगर स्थित महल और मंदिर, झंझारपुर, भौर, भौडागरही, आदि जगहों पर दरभंगा राज द्वारा निर्मित इमारतें इस राजवंश की निर्माण प्रियता की कहानियाँ कह रहे हैं. राज परिसर में स्थित उनके निजी शमशान घाट में विभिन्न चिताओं के ऊपर बने विराट मंदिर मिथिला की समृद्ध संस्कृति का प्रतीक हैं. हालांकि ट्रस्टियों द्वारा संपत्ति के कुप्रबंधन की कहानियाँ भी सामने आई है.














