'ऑपरेशन जनता दल यूनाइटेड ' में भाजपा को कैसे मिल रहा है सीएम नीतीश और आरसीपी का साथ ? 

जनता दल यूनाइटेड के अंदर एक बार फिर जैसे नीतीश बनाम रामचंद्र प्रसाद सिंह के बीच वाक्युद्ध शुरू हुआ है.

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पटना:

ये बात किसी से छिपी नहीं कि भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगियों को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक करने में कोई कसर नहीं छोड़ती. बिहार में भी उसने ऐसा किया है. चाहे बात लोक जनशक्ति की हो या वीआईपी की या फिर सांसद के बग़ावत की हो या तो विधायकों को मिलाने के प्रसंग की उसने हर जगह इसे अंजाम दिया है. हालांकि नीतीश कुमार के समर्थक मानते हैं कि उनके सुप्रीमो के पास भी इस बात के पुख़्ता सबूत हैं कि पिछले विधान सभा चुनाव में वो भाजपा की इसी रणनीति को ना समझ पाने के कारण तीसरे नम्बर की पार्टी बनके रह गए थे. ये बात अलग है कि अब बीजेपी की ही कृपा से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं. 

लेकिन जनता दल यूनाइटेड के अंदर एक बार फिर जैसे नीतीश बनाम रामचंद्र प्रसाद सिंह के बीच वाक्युद्ध शुरू हुआ है. इससे भाजपा के नेताओं में काफ़ी प्रसन्नता देखी जा रही है.  हालांकि नीतीश ने अब तक कुछ नहीं बोला हैं लेकिन उनके नज़दीकी जैसे मंत्री अशोक चौधरी ने आरसीपी पर उनके गुरुवार के बयान पर प्रतिक्रिया दी कि जनता दल यूनाइटेड में केवल एक नेता है और यहां जो भी होता है वो नीतीश कि कृपा से होता है.  नीतीश कुमार को खुश करने के लिए हो सकता हैं अशोक चौधरी ने कुछ अधिक बोल दिया हो लेकिन उन्होंने आरसीपी सिंह के उस बयान पर कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में नरेंद्र मोदी के कृपा से मंत्री बने ये कह दिया कि इससे साफ़ है कि नीतीश कुमार की सहमति उनको मंत्री बनाने में नहीं थी.  

लेकिन वो चाहे आरसीपी सिंह का बयान हो या अशोक चौधरी का शुक्रवार को जवाब साफ़ है कि नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड में अब दो गुट हैं और आने वाले दिनों में उनके बीच बयानबाज़ी और अधिक तेज होगी.  निश्चित रूप से भाजपा ने फ़िलहाल नीतीश को खुश रखने के लिए आरसीपी से मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा लेके किनारा कर लिया हैं, लेकिन दिल्ली से पटना तक उसके नेता इस बात को लेके खुश हैं कि नीतीश को जितना उनके एक जमाने में नज़दीकी लोगों से चुनौती मिलेगी उसका लाभ आख़िरकार उनकी पार्टी को ही होगा. इन नेताओं का कहना हैं कि पहले भाजपा नीतीश के ख़िलाफ़ विद्रोह करने वाले नेता को उनके समर्थन में जवाब भी दे देती थी लेकिन अब परिस्थिति बदल गयी हैं और नीतीश की पकड़ प्रशासन पर पहले जैसी नहीं रही और पार्टी में उनको जितना चुनौती मिलेगी आख़िरकार उनके वोटर में एक भ्रम की स्थिति रहेगी जिसका फ़ायदा आख़िरकार उन्हें मिलेगा . 

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खुद नीतीश के समर्थक मानते हैं कि भाजपा अब तक सहयोगियों में पहले पिछले विधान सभा चुनाव में नीतीश को हाशिये पर लाने के लिए पहले चिराग़ पासवान के कंधे का इस्तेमाल किया. हालांकि उसमें उनको आंशिक सफलता मिली और नीतीश को राष्ट्रीय जनता दल और भाजपा के बाद तीसरे नम्बर की पार्टी से संतोष करना पड़ा. लेकिन नीतीश अपनी सीमित राजनीतिक शक्ति के कारण इस अपमानजनक स्थिति के लिए जब चिराग़ से बदला लेने की ठानी तो उन्हें भाजपा का सहयोग भरपूर मिला. औऱ यही वजह रही कि स्वर्गीय रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को दो भाग करने का मिशन सफल हुआ. लेकिन चिराग़ ने अपनी मेहनत से अपने वोटर को एकजुट रखने में अब तक कामयाब रहे हैं. उसके बाद इस साल उतर प्रदेश चुनाव के बाद मुकेश मल्लाह के वीआईपी पार्टी के सभी तीन विधायकों को भाजपा ने शामिल करा लिया यहाँ नीतीश की मौन सहमति रही और उसका प्रमाण था नीतीश की अनुशंसा से मल्लाह की मंत्रिमंडल से बर्ख़ास्तगी. हालाँकि मुकेश मल्लाह ने तुरंत बोचहा विधान सभा के उप चुनाव में अपना उम्मीदवार उतार कर भाजपा की हार में कारगर भूमिका अदा की . और मल्लाह वोट अब भाजपा के नेता मानते हैं कि अधिकांश मुकेश मल्लाह के वीआईपी पार्टी के साथ हैं. 

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इसलिए नीतीश जो जनता दल यूनाइटेड के पर्याय हैं उनको अगर बिना जनाधार वाले अब से कुछ महीने पूर्व तक करीबी आरसीपी सिंह चुनौती दे रहे हैं तो ये उनके वर्तमान में विरोधी राष्ट्रीय जनता दल से अधिक भाजपा को भा रहा हैं. आरसीपी का पार्टी में समर्थन सीमित हैं लेकिन उन्हें जैसे नीतीश ने राज्य सभा की सदस्यता से वंचित किया और बाद में पटना के घर से निकाला उसके बाद उनके प्रति सहानुभूति बढ़ी हैं. और अब नीतीश के समर्थक भी मानते हैं कि इन दोनो नेताओं के आपसी खींचतान में पार्टी का अहित तो होगा लेकिन साथ साथ भाजपा की सहयोगियों को निबटाने के लक्ष्य को मदद मिलेगी.  

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