बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरु के “पर कतरे जाने” की हकीकत क्या है

कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल समेत कुछ और नेता मनीष शर्मा को यूथ कांग्रेस का प्रभारी बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे. बहरहाल वेणुगोपाल ने कृष्णा की पसंद पर मुहर तो लगाई लेकिन चिट्ठी जारी करने में "खेल" कर दिया. 

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कृष्णा अल्लावरु को हटाए जाने की क्या है कहानी
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  • मल्लिकार्जुन खरगे ने मनीष शर्मा को यूथ कांग्रेस का नया प्रभारी नियुक्त किया है
  • कृष्णा अल्लावरु को फरवरी में बिहार प्रदेश कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया था
  • बिहार में टिकट बंटवारे को लेकर कृष्णा अल्लावरु को कांग्रेस के कई नेताओं का विरोध झेलना पड़ा है
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नई दिल्ली:

बिहार के चुनावी माहौल के बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बिहार प्रदेश और यूथ कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लारू से यूथ कांग्रेस का अतिरिक्त प्रभार ले कर मनीष शर्मा को पार्टी की युवा इकाई का प्रभारी नियुक्त कर दिया. चूंकि टिकट बंटवारे को लेकर बिहार कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता कृष्णा अल्लावरु से नाराज हैं ऐसे में यह चर्चा चल पड़ी कि पार्टी आलाकमान ने उन्हें दंडित किया है. हालांकि सच्चाई इसके उलट है. कृष्णा अल्लावरु को इसी साल फ़रवरी में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी का प्रभारी बना कर बिहार प्रदेश कांग्रेस की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. तब से ही वो बिहार में पार्टी को मजबूत करने में जुटे हुए हैं. इससे पहले क़रीब आठ सालों से कृष्णा यूथ कांग्रेस के प्रभारी थे. कृष्णा को बिहार की जिम्मेदारी मिलने के बाद से ही अंदरखाने तय हो गया था कि यूथ कांग्रेस को नया प्रभारी मिलेगा.

बहरहाल, यह फ़ैसला ऐसे समय में लिया गया है जब कृष्णा अल्लावरु विवादों में घिरे हैं. जाहिर सी बात है इसकी टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. लेकिन एनडीटीवी को कांग्रेस के सूत्रों ने बताया कि यूथ कांग्रेस के नए प्रभारी मनीष शर्मा ख़ुद कृष्णा अल्वारू की पसंद हैं. यह फ़ैसला क़रीब एक हफ़्ते पहले हो चुका था. कृष्णा ख़ुद चाहते थे कि बिहार चुनाव के पहले इसका एलान हो जाए. 

माना जा रहा है कि बिहार में संभावित ख़राब नतीजों के बाद कृष्णा अपनी पसंद के व्यक्ति को अपनी जगह यूथ कांग्रेस का प्रभारी आसानी से नहीं बनवा पाते. दरअसल, कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल समेत कुछ और नेता मनीष शर्मा को यूथ कांग्रेस का प्रभारी बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे. बहरहाल वेणुगोपाल ने कृष्णा की पसंद पर मुहर तो लगाई लेकिन चिट्ठी जारी करने में "खेल" कर दिया. 

सवाल है कि क्या कृष्णा को यूथ कांग्रेस की जिम्मेदारी से मुक्त कर कांग्रेस नेतृत्व ने बिहार के नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं का दिल बहलाने की कोशिश की है? नाराज कांग्रेस नेताओं ने बीते दिनों में एयरपोर्ट से पार्टी दफ्तर तक कृष्णा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए. लेकिन अब पार्टी के इस फैसले को बिहार का नाराज तबका अपनी जीत के रूप में पेश कर भी रहा है. जाहिर है कि अगर ऐसे में कुछ लोग घर बैठने की बजाय पार्टी की मदद के लिए आगे आते हैं तो फायदा कांग्रेस का ही होगा. 

बिहार में आख़िरी दो हफ्तों में चुनाव प्रचार प्रबंधन और समन्वय के लिए कांग्रेस ने महासचिव और यूपी प्रभारी अविनाश पांडे को पटना में तैनात किया है. इसे भी कुछ लोग कृष्णा अल्लवरु के पर कतरने के रूप में पेश कर रहे हैं. जबकि कांग्रेस की चुनावी गतिविधियों में शामिल एक नेता ने बताया कि चुनाव से जुड़े सारे रणनीतिक फैसले कृष्णा ही कर रहे हैं. अविनाश पांडे कंट्रोल रूम की जिम्मेदारी संभालेंगे. 

टिकट बंटवारे से कृष्णा अपनों के निशाने पर आए तो सीट शेयरिंग को लेकर उनके रिश्ते आरजेडी नेतृत्व से भी असहज हो गए. कांग्रेस ने बिहार में साठ सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए लेकिन दस पर उसे सहयोगी दलों के साथ फ्रेंडली फाइट का सामना करना पड़ रहा है जिसमें से पांच सीटों पर आरजेडी उम्मीदवार उसके सामने है. डैमेज कंट्रोल के लिए ही कांग्रेस नेतृत्व ने तेजस्वी यादव को सीएम चेहरे के तौर पर पेश करने के लिए अशोक गहलोत को पटना भेजा था. अब राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की संयुक्त सभाओं को लेकर समन्वय का काम अविनाश पांडे देखेंगे. 

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कांग्रेस नेतृत्व की कोशिश बचे हुए समय में पार्टी के नाराज नेताओं को मना कर और सहयोगी दलों के साथ समन्वय के साथ पूरी ताक़त झोंकने की है. छठ के फौरन बाद कांग्रेस के बड़े नेताओं का प्रचार अभियान शुरू होगा. कृष्णा अल्वारू को भी पता है कि बिहार में ज़्यादा सीटों से ही पार्टी में उनका क़द बढ़ेगा. इसीलिए उन्होंने भी सार्वजनिक तौर पर विवादों से बचने की कोशिश ही की है. 

क़रीब पचास साल की उम्र के कृष्णा अल्लावारु आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं. साल 2010 के करीब राहुल गांधी उन्हें पार्टी में ले कर आए थे. उससे पहले वो कॉर्पोरेट जगत में काम कर रहे थे. राहुल गांधी उन्हें समझौता ना करने वाला ईमानदार नेता मानते हैं. जब तक उनकी यह छवि कायम है तब तक उन्हें किसी बात से फर्क नहीं पड़ता. अभी से चर्चा चल रही है कि बिहार के बाद उन्हें तमिलनाडु की ज़िम्मेदारी मिल सकती है जहाँ अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने वाले हैं. 

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