बिहार में विपक्ष कमजोर, सत्ता पक्ष के विधायक ही मंत्रियों के छुड़ा रहे पसीने, सवालों के बौछार की वजह भी समझिए

जानकारों का मानना है कि यह स्थिति सरकार के लिए दोहरी चुनौती बन गई है. एक ओर विपक्ष कमजोर है, जिससे सरकार पर बाहरी दबाव कम होना चाहिए था, लेकिन दूसरी ओर सत्ता पक्ष के भीतर से उठते सवाल सरकार की असहजता बढ़ा रहे हैं. मंत्रियों को अब जवाब देने में ज्यादा सतर्कता बरतनी पड़ रही हैं.

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खुद की सरकार पर सवाल उठाने वाले विधायक, नीतीश मिश्रा, मंजीत सिंह, जीवेश मिश्रा.
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  • बिहार विधानसभा में सत्ता पक्ष के कई विधायक सरकार और मंत्रियों से तीखे और असहज करने वाले सवाल पूछ रहे हैं.
  • भाजपा के नितीश मिश्रा ने औद्योगिक निवेश और योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर 13 सवाल सदन में प्रस्तुत किए.
  • मिथिलेश तिवारी ने ग्रामीण बुनियादी ढांचे की स्थिति पर 5 सवाल पूछकर योजना कार्यान्वयन में देरी पर चिंता जताई.
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पटना:

बिहार विधानसभा में भले ही विपक्ष संख्याबल के लिहाज से कमजोर हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार को सदन के भीतर राहत मिल रही है. मौजूदा सत्र में मंत्रियों की मुश्किलें लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं और इसकी वजह विपक्ष नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के अपने विधायक ही बनते दिख रहे हैं. NDA के कई विधायक सरकार और मंत्रियों से सीधे और असहज करने वाले सवाल पूछ रहे हैं. सदन में सरकार को घेरने वाले सत्ता पक्ष के जिन नेताओं की चर्चा सबसे ज्यादा है, उनमें भाजपा के संजीव चौरसिया, नीतीश मिश्रा, मिथिलेश तिवारी और जीवेश मिश्रा के नाम प्रमुख हैं. वहीं JDU से मंजीत सिंह जैसे विधायक भी अपनी ही सरकार से सवाल पूछते नजर आए हैं. 

मैथिली और कोमल के सवाल का वीडियो हुआ था वायरल

बीते दिनों सरकार से तीखे सवाल पूछने को लेकर जिन विधायकों की सबसे ज्यादा चर्चा हुईं, उसमें पहली बार की विधायक मैथिली ठाकुर और कोमल सिंह का नाम भी हैं. मैथिली के सवालों पर स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे तो कोमल सिंह के सवालों पर खेल मंत्री श्रेयषी सिंह असहज हुईं. रील के इस दौर में इन दोनों का वीडियो भी वायरल हुआ. लेकिन सदन की कार्यवाही में सत्ता पक्ष के अन्य प्रमुख विधायकों ने जब सवाल उठाए तो हाउस में असहजता का आलम दिखा. 

नीतीश मिश्रा ने 13 अलग-अलग सवाल पूछे

इन विधायकों ने अलग-अलग विभागों और नीतियों को लेकर सरकार से जवाब मांगा है. बीजेपी विधायक नितीश मिश्रा ने अपने 13 अलग-अलग सवालों में राज्य में औद्योगिक निवेश, रोजगार सृजन और घोषित योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन को लेकर सरकार की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की. उन्होंने पूछा कि जिन योजनाओं की घोषणा हुई, उनका लाभ जिलों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है.

मिथिलेश तिवारी ने 5 अलग-अलग मुद्दों पर उठाए सवाल

बीजेपी के मिथिलेश तिवारी ने 5 अलग-अलग मुद्दों पर सरकार को घेरा, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, पुल और बुनियादी ढांचे की स्थिति को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने अपने सवालों में यह जानना चाहा कि समय पर स्वीकृत योजनाएं अब तक पूरी क्यों नहीं हो पाईं और इसके लिए किसकी जिम्मेदारी तय की गई हैं.

जीवेश मिश्रा ने सरकार पर उठाए 10 सवाल

जीवेश मिश्रा ने अपने ही सरकार के ख़िलाफ़ 10 सवाल उठाए, जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े मुद्दे शामिल है. उन्होंने शिक्षकों की कमी, स्कूलों में संसाधनों की स्थिति और सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं को लेकर सरकार से जवाब मांगा. उनके सवालों से यह संकेत मिला कि जमीनी हकीकत और सरकारी दावों के बीच बड़ा अंतर है.

जदयू के मंजीत सिंह भी लगातार उठा रहे सवाल

JDU विधायक मंजीत सिंह भी लगातार अपने सरकार को घेर रहे हैं. उन्होंने अपने क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं को लेकर सरकार से 10 सवाल पूछे. उन्होंने स्थानीय स्तर पर योजनाओं के लाभ न मिलने, अफसरशाही की उदासीनता और शिकायतों के समाधान में हो रही देरी पर सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया. उनके सवालों को सत्ता पक्ष के भीतर बढ़ती बेचैनी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.

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संजीव चौरसिया ने भी किए तीखे सवाल

इनके अलावा संजीव चौरसिया जैसे विधायक पहले भी सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखे सवाल उठा चुके हैं. उन्होंने नियुक्तियों, विभागीय कार्यशैली और योजनाओं की निगरानी को लेकर मंत्रियों को असहज स्थिति में डाला है.

सत्ता पक्ष के विधायकों के तीखे सवालों का क्या है कारण?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि सवाल उठाने वाले इन विधायकों में से अधिकांश को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाई. माना जा रहा है कि मंत्री पद से वंचित रहने की नाराजगी अब सदन के भीतर मुखर रूप में सामने आ रही है. हालांकि विधायक इसे क्षेत्र की जनता के प्रति अपनी जवाबदेही बता रहे हैं.

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जानकारों का मानना है कि यह स्थिति सरकार के लिए दोहरी चुनौती बन गई है. एक ओर विपक्ष कमजोर है, जिससे सरकार पर बाहरी दबाव कम होना चाहिए था, लेकिन दूसरी ओर सत्ता पक्ष के भीतर से उठते सवाल सरकार की असहजता बढ़ा रहे हैं.मंत्रियों को अब जवाब देने में ज्यादा सतर्कता बरतनी पड़ रही है.

यह भी देखा जा रहा है कि कई विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में बढ़ते जनदबाव को सरकार तक पहुंचाने के लिए सदन का इस्तेमाल कर रहे हैं. वे यह संदेश देना चाहते हैं कि केवल सत्ता पक्ष में होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीनी सवाल उठाना भी उनकी जिम्मेदारी है.

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अगले सत्र में क्या होगी रणनीति, देखना दिलचस्प

कुल मिलाकर, बिहार विधानसभा में सरकार के लिए स्थिति पूरी तरह सहज नहीं है. मंत्रियों को अब न सिर्फ विपक्ष, बल्कि अपने ही गठबंधन के विधायकों के सवालों का सामना करना पड़ रहा है. आने वाले सत्रों में यह आंतरिक दबाव सरकार की रणनीति और संतुलन को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर राजनीतिक हलकों की नजर बनी हुई है.

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