LPG किल्लत की खबर के बीच किसान का बायोगैस यूनिट चर्चाओं में, रसोई गैस और खेती का अपनाया किफायती तरीका

देश में रसोई गैस की किल्लत के बीच बायोगैस संयंत्र बेहतर विकल्प है. गांव में बायोगैस के उपयोग से गांव में स्वच्छता को भी बढ़ावा मिला है. (शेखपुरा से रंजन कुमार की रिपोर्ट)

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किसान ने बनाया बोयोगैस यूनिट
Bihar News:

जहां एक ओर LPG गैस की किल्लत को लेकर बवाल मचा हुआ है. लेकिन दूसरी ओर एक किसान की पहल चर्चाओं में है. कम लागत और बेहतर प्रबंधन से शेखपुरा के किसान ने दैनिक उपयोग में रसोई गैस के लिए आत्मनिर्भर बनाया है. बल्कि गोबर गैस से निकला वेस्टेड सेलरी का भी प्रबंधन कर खेती को आसान और लागत मुक्त बनाया है. किसान के बेहतर प्रबंधन ने जहां घर की रसोई को आत्मनिर्भर बनाया है, वहीं खाद मुक्त खेती से मुनाफा भी आ रहा है.

बायोगैस यूनिट की तस्वीर है शेखपुरा जिले के अरियरी प्रखंड के मौलानगर गांव की है. यहां के किसान के बेहतर प्रबंधन ने उनके परिवार को रसोई गैस की किल्लत और सिलेंडर के लिए लगने वाली लंबी कतारों से अंजानि हैं. किसान निजी खर्च से गोबर गैस के पांच यूनिट लगाया. बायोगैस यूनिट अपनाकर न केवल गैस सिलेंडर की समस्या से राहत पाई है, बल्कि गांव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मॉडल पेश किया.

15 हजार की लागत से एक यूनिट

प्लांटों की खास बात यह है कि इनमें पशुओं के गोबर का उपयोग किया जाता है, जिससे गैस तैयार होती है. प्रत्येक प्लांट पर करीब 15 हजार रुपए की लागत से तैयार किया गया है. किसान कृष्णदेव यादव ने बताया कि 75 हजार रुपया में 5 यूनिट बनवाया. उन्होंने कहा कि डेढ़ वर्ष पहले अपने खर्ज से बनाया गया गोबर गैस प्लांट की लागत से ज्यादा गैस का इस्तेमाल करने की बात कही है. उन्होंने कहा कि युद्ध के कारण गैस की किल्लत की बात सुनते है लेकिन यहां कोई परेशानी नहीं है.

जैविक खाद का भी इस्तेमाल

उन्होंने गोबर गैस में इस्तेमाल गोबर के अवशिष्ट को व्यवस्थित कर पाइप के सहारे तालाब में पहुंचते है और उसी पानी से फसल का पटवन करने से जैविक खेती को बढ़ाने की बात कही है. उन्होंने कहा कि इससे खाद मुक्त खेती मुनाफे दे रहा है. जबकि गैस की कोई किल्लत नहीं है. घर की महिलाओं ने कहा कि यह रसोई गैस से बेहतर जलता है और खाना बनाने में भी आसान होने के साथ खाना स्वादिष्ट बनता है. 

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गौरतलब है कि देश में रसोई गैस की किल्लत के बीच बायोगैस संयंत्र बेहतर विकल्प है. गांव में बायोगैस के उपयोग से गांव में स्वच्छता को भी बढ़ावा मिला है. जहां गोबर और कचरा इधर-उधर पड़ा रहता था, अब उसी का उपयोग ऊर्जा श्रोत बनाने में किया जा रहा है. इससे पर्यावरण भी स्वच्छ हो रहा है और गांव का माहौल बेहतर बन रहा है. मौलानगर की यह पहल अब आसपास के गांवों के लिए प्रेरणा से कम नहीं है. अगर आम लोग बायोगैस को अपनाएं, तो गैस सिलेंडर पर निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है.

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