लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड ने 15 बेगुनाह लोगों की जान ले ली है, जिनमें 27 साल के निलेश भी शामिल हैं. निलेश पिछले 4 साल से इस सेंटर में सॉफ्टवेयर और डिजाइनिंग सिखाने का काम कर रहे थे. इस वीडियो में देखिए निलेश की मां और बहन का वो दर्द, जिसे सुनकर किसी का भी दिल दहल जाएगा. बदहवास मां की जुबान पर सिर्फ एक ही बात है- "मुझे किसी कार्रवाई पर यकीन नहीं, बस मेरा बच्चा मुझे लाकर दे दो."
निलेश की बहन ने हमारी रिपोर्टर से बातचीत में प्रशासन की नाकामी और समाज की संवेदनहीनता की पोल खोल दी है. अपनी जान बचाने के लिए निलेश ने खुद को बाथरूम में बंद कर लिया था, लेकिन फायर ब्रिगेड के 45 मिनट देरी से पहुंचने के कारण धुएं से उसका दम घुट गया. बहन का सबसे बड़ा सवाल उन तमाशबीनों से है, जो नीचे खड़े होकर सिर्फ वीडियो बना रहे थे. अगर उन्होंने कोई तिरपाल या गद्दा पकड़कर मदद की होती, तो शायद खिड़की से कूदने वाले और अंदर फंसे कई बच्चों की जान बच जाती.
कैसे एक गैस चेंबर बन गई थी बिल्डिंग?
हादसे के वक्त सबसे बड़ी चूक यह रही कि बिल्डिंग का मुख्य दरवाजा 'इलेक्ट्रॉनिक लॉकिंग सिस्टम' से लैस था. जैसे ही आग लगी और बिजली कटी, दरवाजा पूरी तरह से जाम हो गया और अंदर मौजूद छात्र एक कंक्रीट के चैंबर में फंस गए. लकड़ी और साउंड प्रूफिंग मटेरियल होने के कारण आग और धुआं इतनी तेजी से फैला कि किसी को भागने का मौका तक नहीं मिला.
सरकार का एक्शन और मुआवजा:
इस भीषण हादसे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ ने गहरा दुख जताया है. पीएम मोदी ने मृतकों के परिजनों को ₹2 लाख और घायलों को ₹50 हजार, वहीं यूपी सरकार ने मृतकों के परिवारों को ₹5 लाख मुआवजे का ऐलान किया है. सीएम योगी के निर्देश पर SIT का गठन किया गया है.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 15 मासूमों की मौत के बाद ही हमारी आंखें खुलेंगी? बिना फायर NOC के रिहायशी इलाकों में चल रहे इन 'मौत के कुंओं' का असली जिम्मेदार कौन है? देखिए NDTV की यह रुला देने वाली ग्राउंड रिपोर्ट.