प्राइम टाइम : भाषा का अकेलापन और मृत्यु का समाज

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  • प्रकाशित: मार्च 17, 2017
सौ की संख्या में आए ये किसान तमिल में नारे लगा रहे हैं. शायद ही इनकी आवाज़ दिल्ली के आसपास के किसानों तक पहुंचे. भारत में किसान, किसान के लिए नहीं बोलता है. शहर, किसान के लिए नहीं बोलते है. नारों की भाषा बदल भी जाती तो भी इन्हें सुनने वाले लोग नहीं बदलते.

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