उत्तर प्रदेश में इंसानों-जानवरों के बीच क्यों बढ़ रहा टकराव? मुरादाबाद-बिजनौर में बार-बार दिखे तेंदुए
उत्तर प्रदेश के बिजनौर और मुरादाबाद में तेंदुओं के हमलों से किसान दहशत में हैं. गन्ने के खेत तेंदुओं के ठिकाने बन गए हैं. पिछले दिनों CM योगी ने माना कि सूबे में ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट में 4000 से ज्यादा मौतें हुई हैं.
"तेंदुओं की वजह से खेतों की तरफ़ जाना मुश्किल हो जाता है. हम खेतों को ढंग से साफ़ नहीं कर पाते. जब भी खेत में जाते हैं, दो-चार लोग साथ जाते हैं." यह कहना है बिजनौर के किरतपुर ब्लॉक के गन्ना किसान उत्कर्ष चौहान का. वहीं, मुरादाबाद जिले की ठाकुरद्वारा तहसील के लालपुर गोसाईं गांव के गन्ना किसान सज्जाद हुसैन से जब हमने कॉल पर बात की तो वे गन्ने के खेत में ही मौजूद थे. उनकी आवाज़ में दहशत महसूस की जा सकती थी. उन्होंने बताया, "हम खेत में होते हैं, तो डर बना रहता है कि कहीं अचानक तेंदुआ न आ जाए. इसलिए हम जब खेत की तरफ आते हैं, तो बर्छी, डंडे और दरांत अपने साथ लाते हैं."
नॉर्थ-वेस्ट उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दिनों में ह्यूमन-वाइल्डलाइफ़ कॉन्फ्लिक्ट यानी इंसानों और जानवरों के बीच टकराव की कई ख़बरें आईं. बिजनौर और मुरादाबाद जैसे ज़िलों के सैकड़ों गांवों में तेंदुओं के हमलों की वजह से दहशत का माहौल बन गया. कई मौतें रिपोर्ट की गईं, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं. इसके बाद, वन विभाग एक्टिव हुआ. तेंदुओं से इंसानों के टकराव की ज्यादातर घटनाएं गांवों और खेतिहर इलाक़ों में दर्ज की जाती हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि रिहायशी इलाक़ों में इतना ज़्यादा तेंदुओं का आगमन हो क्यों रहा है?

बिजनौर और मुरादाबाद यूपी के उन ज़िलों में शामिल हैं, जहां पर ठीक-ठाक तादाद में गन्ने की खेती भी होती है. ग़ौर करने वाली बात है कि तेंदुओं के छिपने की सबसे पसंदीदा जगह गन्ने के खेत होते हैं.
रिहायशी इलाकों में बार-बार क्यों नजर आ रहे तेंदुए?
रिटायर्ड आईएफएस ऑफ़िसर मोहम्मद एहसान NDTV.in के साथ बातचीत में कहते हैं, "तेंदुए बहुत ही बहुमुखी जानवर होते हैं. ये जंगल के किनारों की झाड़ियों में रहते हैं. जंगलों के सिकुड़ने से तेंदुओं के शिकार धीरे-धीरे ख़त्म होते जा रहे हैं. ऐसे में ‘प्रे एंड प्रीडेटर रिलेशनशिप' कमज़ोर हो गई है. यानी शिकार और शिकारी के बीच के रिश्ते में कमजोरी आ गई. इसके अलावा, तेदुओं के क़ुदरती शिकार कम हो गए हैं.” उन्होंने कहा कि सिर्फ़ यही नहीं, और भी कई वजहें हैं.

मोहम्मद एहसान,
‘पूरे देश में बढ़ रहे मामले…'
महाराष्ट्र के पुणे में स्थित 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (IISER)' में जीव विज्ञान के प्रोफेसर मिलिंद वाटवे कहते हैं, "सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में इंसानों और जानवरों के बीच टकराव बढ़ रहा है. हमेशा से खेती भी होती थी और जानवर भी थे, लेकिन अभी बदलाव यह हुआ है कि जानवरों में मनुष्यों का डर बिल्कुल ख़त्म होता जा रहा है, क्योंकि कई साल पहले शिकार करना बंद कर दिया गया."

प्रोफेसर मिलिंद वाटवे,
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पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 'स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (SOFR)' के मुताबिक़, पिछले 23 साल में उत्तर प्रदेश में प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट यानी संरक्षित वनों के क्षेत्र में भारी कमी दर्ज की गई है. SOFR 2001 और SOFR 2023 की रिपोर्ट की तुलना करने पर पता चलता है कि संरक्षित वन क्षेत्र में 2,095 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है. 23 साल में यूपी का संरक्षित वन क्षेत्र 2,425 वर्ग किलोमीटर से घटकर 330 वर्ग किलोमीटर रह गया है.

प्रोफेसर मिलिंद वाटवे के मुताबिक़, इस बदलाव का संबंध ह्यूमन-वाइल्डलाइफ़ कॉन्फ्लिक्ट से कतई नहीं है. वे कहते हैं, "मैं यह नहीं कहता कि प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट का होना ज़रूरी नहीं है. हैबिटेट लॉस को रोकना चाहिए, रेस्टोरेशन की कोशिश होनी चाहिए लेकिन यह कॉन्फ्लिक्ट की वजह नहीं है."
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गन्ने के खेत क्यों बनते हैं तेंदुओं के ठिकाने?
तेदुओं के गन्ने के खेतों में रहने की आदत के पीछे दो वजहें हैं. पहली वजह- गन्ने के ऊंचे पौधे उन्हें छिपने के लिए बेहतरीन जगह देते हैं, क्योंकि लंबी घास छिपने या रहने के लिए मुफ़ीद होती है. गन्ने के खेत इंसानी बस्तियों के पास होते हैं या किसान जंगल की सीमा तक गन्ना उगाते हैं, इसलिए तेदुओं को आसानी से शिकार (जैसे पालतू जानवर) मिल जाते हैं.
वहीं, दूसरी वजह तेंदुओं के रहने की जगह का विस्तार है. आस-पास के रिजर्व इलाक़ों में बाघों की बढ़ती आबादी तेदुओं को बाहर धकेल देती है और गन्ने के खेत उनके रहने के लिए सुविधाजनक नए इलाक़े बन जाते हैं. गौरतलब है कि बाघ तेंदुओं से ज्यादा ताक़तवर और आक्रामक होते हैं.
तेंदुओं की तादाद में बढ़ोतरी…
भारत में तेंदुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है. चार साल में इनकी तादाद में आठ फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की रिपोर्ट 'भारत में तेंदुओं की स्थिति 2022' में बताया गया है कि इनकी तादाद 2018 में 12,852 से बढ़कर 2022 में 13,874 हो गई है. 2022 की इसी रिपोर्ट में यूपी के अंदर तेंदुओं की संख्या 371 बताई गई, जो 2018 में 316 थी. यानी यूपी में भी बढ़ोतरी हुई है.
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मोहम्मद एहसान कहते हैं कि तेंदुओं की तादाद में बढ़ोतरी की एक वजह मेथड ऑफ काउंटिंग भी हो सकती है, क्योंकि अब हमारे पास ज़्यादा साइंटिफिक इक्विपमेंट हो गए हैं.
टकराव से निपटने के लिए यूपी सरकार ने क्या क़दम उठाए?
जुलाई 2026 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ में 'उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण' के नए मुख्यालय भवन के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए कहते हैं, "इंसानों और जानवरों के बीच टकराव में 4,000 से ज़्यादा लोगों की जान गई है." उन्होंने इस दौरान यह भी कहा कि हमने लोगों में जागरूकता बढ़ाने और जान-माल के नुक़सान को कम करने के लिए टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया है.
दिल्ली में संसदीय समिति की बैठक
- 5 अगस्त 2026 को दिल्ली में 'पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय' की संसदीय सलाहकार समिति की बैठक हुई, जिसका 'ह्यूमन वाल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट' रोकना था.
- इस बैठक में उत्तर प्रदेश ने अपने प्रजेंटेशन के जरिए क्षेत्र के मुताबिक प्लानिंग, रैपिड रिस्पॉन्स सिस्टम, प्राकृतिक आवास सुधार, जानवरों के गलियारों की सुरक्षा, अर्ली वार्निंग सिस्टम और राज्यों के बीच तालमेल बढ़ाने जैसे सुझाव दिए.
- यूपी ने बताया कि टकराव को रोकने के लिए राज्य में रैपिड रिस्पॉन्स टीमें, 4 रेस्क्यू सेंटर, सोलर फेंसिंग, अर्ली वार्निंग सिस्टम, कम्युनिटी वॉलंटियर प्रोग्राम और वैज्ञानिक निगरानी जैसे कदम उठाए गए हैं.

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ह्यूमन-वाइल्डलाइफ़ कॉन्फ्लिक्ट एक आपदा!
अक्टूबर, 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इंसान और जानवरों के बीच होने वाले टकराव को 'राज्य-घोषित आपदा' का दर्जा दिया है. जिन जानवरों को इस लिस्ट में शामिल किया गया, उनमें कई अन्य जीवों के साथ तेंदुआ भी शामिल है. इससे ऐसी घटनाओं को 'राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष' (SDRF) के दायरे में लाया गया. इस फ़ैसले के तहत, इंसानों और जानवरों के टकराव से जुड़ी मौतों के मामलों में मृतक के परिवार को 5 लाख रुपये की राहत राशि और घायल होने पर SDRF के नियमों के मुताबिक़ मुआवजा दिया जाना तय हुआ. इसके तहत, वन विभाग हर मौत के मामले में राजस्व विभाग को अपने बजट से 1 लाख रुपये की राशि वापस करेगा.
ग़ौरतलब है कि नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि वे इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव को 'प्राकृतिक आपदा' का दर्जा देने पर गंभीरता से सोचें और ऐसी घटनाओं में होने वाली हर इंसानी मौत के लिए 10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि का भुगतान सुनिश्चित करें.
प्रोफेसर मिलिंद वाटवे का मानना है कि सह-अस्तित्व और संतुलन बनाए रखने के लिए सीमित हद तक सावधानी से जानवरों का शिकार किया जाना ज़रूरी है. उन्होंने कहा, “हम यह नहीं कह रहे कि पूरी संख्या ही ख़त्म कर दी जाए लेकिन ह्यूम-वाइल्डलाइफ़ कॉन्फ्लिक्ट कम करने के लिए कुछ हद तक हंटिंग वापस लाई जानी चाहिए."
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