Travel Tips: लद्दाख का नाम आते ही लोगों के दिमाग में बर्फीले पहाड़, मठ और नीली झीलों की तस्वीर उभर आती है. लेकिन लद्दाख के लेह जिले में एक ऐसा गांव भी है, जो अपनी खूबसूरत वादियों के साथ-साथ भारत–पाकिस्तान सीमा से जुड़ी अनोखी कहानी के कारण जाना जाता है. इस गांव का नाम है तुरतुक गांव. यह गांव लेह से लगभग 205 किलोमीटर दूर नुब्रा घाटी में स्थित है और इसे भारत का आखिरी गांव भी कहा जाता है.
तुरतुक लंबे समय तक आम लोगों के लिए बंद रहा था. साल 2010 के बाद ही इसे टूरिज्म के लिए खोला गया. यही वजह है कि आज भी यहां की संस्कृति, भाषा और लाइफस्टाइल बिल्कुल अलग और शुद्ध रूप में देखने को मिलती है. यह गांव 1971 के भारत-पाक युद्ध से पहले पाकिस्तान का हिस्सा था, लेकिन बाद में भारत में शामिल हुआ. यही इतिहास इसे बाकी गांवों से अलग बनाता है.
तुरतुक गांव के बारे में क्या जानना चाहिए?
तुरतुक गांव श्योक नदी के किनारे बसा हुआ है और बाल्टी समुदाय का निवास स्थान है. यहां के लोग बाल्टी भाषा बोलते हैं और उनकी संस्कृति लद्दाख के बाकी हिस्सों से काफी अलग है. गांव में हरियाली, खुबानी के बाग, लकड़ी-मिट्टी के पारंपरिक घर और पहाड़ों से आती ठंडी हवा इस जगह को बेहद सुकूनभरा बनाती है. यहां का जीवन आज भी बहुत सरल और प्रकृति के करीब है.
तुरतुक में कहां ठहर सकते हैं?
तुरतुक में बड़े होटल नहीं हैं, लेकिन यहां कई अच्छे होमस्टे मौजूद हैं. इन होमस्टे में रुककर आप स्थानीय लोगों के साथ रह सकते हैं और उनकी संस्कृति को करीब से समझ सकते हैं. अगर आप ज्यादा सुविधाजनक ठहराव चाहते हैं, तो नुब्रा घाटी के हंडर और डिस्किट में होटल और गेस्ट हाउस मिल जाते हैं. हालांकि, तुरतुक में रात बिताने का अनुभव सबसे खास माना जाता है.
तुरतुक गांव में देखने लायक क्या है?
तुरतुक में देखने के लिए बहुत कुछ है. यहां का मुख्य आकर्षण गांव की प्राकृतिक सुंदरता, श्योक नदी, बाल्टी विरासत संग्रहालय और पुराने लकड़ी के पुल हैं. इसके अलावा गांव की आखिरी सड़क, जहां से आगे पाकिस्तान की सीमा ज्यादा दूर नहीं है, पर्यटकों को खासा आकर्षित करती है. यहां से दिखने वाले पहाड़ और सूर्योदय-सूर्यास्त के दृश्य यादगार होते हैं.
तुरतुक कैसे पहुंचें?
तुरतुक पहुंचने के लिए पहले लेह जाना होता है. लेह देश के प्रमुख शहरों से हवाई मार्ग से जुड़ा हुआ है. लेह से नुब्रा घाटी जाने के लिए खारदुंग ला दर्रे को पार करना पड़ता है. लेह से तुरतुक की दूरी लगभग 205 किलोमीटर है. टैक्सी या बाइक से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है. चूंकि यह सीमावर्ती इलाका है, इसलिए इनर लाइन परमिट लेना जरूरी होता है.
अगर आप लद्दाख में भीड़ से दूर, इतिहास, संस्कृति और सीमा से जुड़ा एक अलग अनुभव चाहते हैं, तो लेह का आखिरी गांव तुरतुक आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर होना चाहिए.