Holi 2026: कर्नाटक के इस मंदिर में रंग नहीं, राख से खेली जाती है होली, पूरे 5 दिन चलता है त्‍योहार, कामदेव और शिव से जुड़ा है इतिहास

Holi Kab Manegi: देशभर में 4 मार्च को होली का त्योहार मनाया जाएगा. जहां उत्तर भारत में होली को प्रह्लाद और होलिका की पौराणिक कथा के साथ जोड़कर मनाया जाता है, वहीं दक्षिण भारत में होली भगवान शिव और कामदेव से जुड़ी है.

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Unique Five-Day Holi Festival in Ramalingeshwara Kamanna Temple, Karnataka: भारत त्योहारों का देश है और यहां हर पर्व को मनाने के पीछे कोई न कोई गहरी पौराणिक कथा छिपी होती है. उत्तर भारत में जहां होली (Holi 2026) का सीधा संबंध भक्त प्रह्लाद और होलिका की अग्नि परीक्षा से जोडा जाता है, वहीं दक्षिण भारत में इस त्योहार का स्वरूप और इसके पीछे की मान्यताएं बिल्कुल अलग हैं. दक्षिण भारत की होली विशेष रूप से भगवान शिव और कामदेव की कथा पर आधारित है. यह पर्व केवल रंगों का उत्सव (Rangon ka Tyohar) नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार के नष्ट होने का प्रतीक माना जाता है. 4 मार्च को देशभर में होली का पर्व मनाया जाएगा (Holi Kab Hai), लेकिन कर्नाटक के एक विशेष मंदिर, रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर, में इसकी छटा निराली होगी.

दक्षिण भारत की होली और अहंकार का नाश

उत्तर भारत और दक्षिण भारत की होली में सबसे बडा अंतर इसके उद्देश्य को लेकर है. दक्षिण भारत में होली को केवल रंगों के खेल के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे कामदेव के भस्म होने और शिव के वैराग्य से जुडे एक महत्वपूर्ण मोड के रूप में पूजा जाता है. यहां की मान्यता है कि यह दिन व्यक्ति के भीतर के काम, क्रोध और अहंकार को जलाकर भस्म करने का संदेश देता है. कर्नाटक के रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में इस दिन भक्तों का हुजूम उमडता है, क्योंकि यहां की परंपराएं देशभर में अनोखी हैं.

Photo Credit: insta@marvelous_belgaum

रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर: यात्रियों के लिए एक अनूठा आकर्षण

कर्नाटक के इस प्रसिद्ध मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसका गर्भगृह है. यह भारत का संभवतः इकलौता ऐसा मंदिर है जहां आप भगवान शिव के साथ कामदेव की प्रतिमा को एक साथ देख सकते हैं. एक ट्रैवलर के नजरिए से यह वास्तुकला और धार्मिक इतिहास का एक अद्भुत नमूना है. 

कर्नाटक का रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर अपनी अनूठी बनावट और इतिहास के लिए पूरे विश्व में विख्यात है. आम तौर पर मंदिरों में भगवान शिव की अकेले या माता पार्वती के साथ प्रतिमा देखी जाती है, लेकिन यह दक्षिण भारत का संभवतः पहला ऐसा मंदिर है जहां गर्भगृह में महादेव और कामदेव एक साथ विराजमान हैं. इस मंदिर की महिमा इतनी है कि होली के पावन अवसर पर यहां भक्तों का सैलाब उमड पडता है.

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मंदिर की नक्काशी और वहां का वातावरण आपको एक अलग ही युग में ले जाता है. होली के दौरान यहां का नजारा बिल्कुल बदल जाता है. भक्तों की भीड़, मंत्रों का उच्चारण और हवा में मौजूद आध्यात्मिक ऊर्जा किसी भी पर्यटक को मंत्रमुग्ध कर सकती है.

लोक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति होली के दिन इस मंदिर में आकर भगवान शिव और कामदेव के एक साथ दर्शन करता है, उसके जीवन के सभी पाप धुल जाते हैं. मंदिर के मुख्य हिस्से में कामदेव की मूर्ति ध्यान मुद्रा में है, जो शिवलिंग के साथ स्थापित की गई है.

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पौराणिक कथा: जब शिव ने खोला तीसरा नेत्र

यात्रा का असली मजा तब आता है जब आप किसी जगह की कहानी को जानते हैं. उत्तर भारत की होली जहां प्रह्लाद और होलिका की अग्नि परीक्षा की याद दिलाती है, वहीं दक्षिण भारत का यह हिस्सा आपको भगवान शिव और कामदेव की एक प्राचीन गाथा में ले जाता है.

कर्नाटक का यह क्षेत्र ट्रैवलर्स के लिए इसलिए भी खास है क्योंकि यहां होली को 'अहंकार के अंत' के उत्सव के रूप में मनाया जाता है. यदि आप अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से ब्रेक लेकर किसी ऐसी जगह जाना चाहते हैं जहां शांति और भक्ति का मेल हो, तो यह मंदिर एक परफेक्ट डेस्टिनेशन है.

इस मंदिर की स्थापना और होली की परंपरा के पीछे एक बहुत ही रोचक कथा प्रचलित है. प्राचीन काल में जब देवी सती ने यज्ञ की अग्नि में अपना देह त्याग दिया था, तब भगवान शिव अत्यंत शोक में डूब गए और कठोर तपस्या में लीन हो गए. महादेव के वैराग्य धारण करने से पूरी सृष्टि का संतुलन बिगडने लगा.

देवताओं को चिंता सताने लगी कि अगर शिव अपनी तपस्या से नहीं जागे तो संसार का कल्याण कैसे होगा. तब सभी देवताओं ने मिलकर कामदेव से सहायता मांगी. कामदेव को अपनी शक्तियों और आकर्षण पर बहुत गर्व था.

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उन्होंने महादेव की समाधि भंग करने के लिए उन पर अपना कामबाण चला दिया. कामबाण के लगते ही भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई और क्रोध में आकर उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया.

महादेव के तीसरे नेत्र की प्रचंड ज्वाला ने कामदेव को क्षण भर में भस्म कर दिया.

होली पर विशेष अनुष्ठान और 5 दिनों का उत्सव

अगर आप यहां की यात्रा प्लान कर रहे हैं, तो ध्यान रखें कि यहां होली का उत्सव केवल एक दिन का नहीं होता. रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में पूरे पांच दिनों तक विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. इन पांच दिनों में मंदिर को बेहद खूबसूरती से सजाया जाता है. यहां आने वाले पर्यटकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण 'चांदी का पालना' चढ़ाने की रस्म है.

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ऐसा माना जाता है कि जो दंपति संतान सुख की कामना करते हैं, वे यहां चांदी का झूला अर्पित करते हैं. एक यात्री के रूप में इन रस्मों को अपनी आंखों से देखना एक सांस्कृतिक समृद्धि का अनुभव है.धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कामदेव को अपनी शक्तियों पर जो अभिमान था, उसे तोडने के लिए ही शिव ने यह कदम उठाया था.

यही कारण है कि आज भी कर्नाटक के रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर सहित कई अन्य स्थानों पर होली के दिन राख को माथे पर लगाने का रिवाज है.

संतान प्राप्ति के लिए विशेष अनुष्ठान

रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर में होली का उत्सव केवल एक दिन नहीं बल्कि पूरे पांच दिनों तक चलता है. इन पांच दिनों में विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं. मंदिर की एक खास परंपरा यह भी है कि यहां भक्त चांदी की वस्तुएं दान करते हैं. विशेष रूप से कामदेव और शिवजी को चांदी का पालना या झूला अर्पित किया जाता है.

ऐसी मान्यता है कि जिन विवाहित जोडों को संतान सुख की प्राप्ति नहीं हो रही है, यदि वे होली के इन पांच दिनों के दौरान मंदिर में चांदी का झूला चढाते हैं, तो उनकी मनोकामना शीघ्र पूरी होती है. भक्तों का विश्वास है कि कामदेव और शिव के मिलन का यह स्थान नई सृष्टि और सुखद भविष्य का आशीर्वाद देता है.

धार्मिक महत्व से भरी होगी ये यात्रा

होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, यह स्वयं को पहचानने और बुराइयों को जलाने का पर्व है. कर्नाटक के रामलिंगेश्वर कामन्ना मंदिर की यात्रा आपको इसी दर्शन से रूबरू कराती है. तो इस होली, अपने बैग पैक करें और निकल पडें दक्षिण भारत के इस अनछुए पहलू को तलाशने. यह सफर आपको न केवल सुंदर तस्वीरें देगा, बल्कि जीवन को देखने का एक नया नजरिया भी प्रदान करेगा.

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