Dental Care: दांत केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्थिति का भी आईना बनते जा रहे हैं. आमतौर पर, खराब दांत अक्सर व्यक्ति की आदतों का नतीजा मान लिए जाते हैं, जबकि असल वजह आर्थिक तंगी और सिस्टम की नाकामी है. आजकल की दिखावटी दुनिया में जहां महंगे इलाज के चलते ब्राइट और सीधे दांत एक सामान्य बात हो गई है, वहीं दूसरी तरफ खराब दांत गरीबी और अमीरी के बीच के अंतर को और गहरा करते जा रहे हैं.
महंगे इलाज ने सीमित की पहुंच
ऑस्ट्रेलिया सहित कई विकसित देशों में डेंटल केयर अब भी पूरी तरह हेल्थकेयर सिस्टम का हिस्सा नहीं है. मेडिकेयर की शुरुआत के समय डेंटल ट्रीटमेंट को इसमें शामिल नहीं किया गया. हालांकि, 2014 के बाद बच्चों के लिए कुछ स्कीम्स जरूर शुरू हुईं, लेकिन एडल्ट्स के लिए हालात अब भी ज्यादा बेहतर नहीं हैं. ग्रैटन इंस्टीट्यूट के अनुसार, दो मिलियन से ज्यादा ऑस्ट्रेलियाई केवल खर्च के डर से दांतों का इलाज टाल देते हैं. जबकि 40% से ज्यादा लोग एक साल से ज्यादा समय तक डेंटिस्ट के पास नहीं जाते.
सिस्टम पर दबाव
सरकारी डेंटल सर्विसेज की जिम्मेदारी राज्यों के कंधों पर होती है. लेकिन कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे रिसोर्सेज की कमी से जूझ रहें हैं. कई मामलों में तो लोगों को इलाज के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है. इसका नतीजा यह होता है कि छोटी समस्या गंभीर बन जाती है और कई बार अस्पताल में भर्ती होने तक की नौबत आ जाती है.
शर्म और अवसरों की कमी
मौजूदा दौर में खराब दांत न केवल शारीरिक दर्द, बल्कि सामाजिक शर्म और अवसरों की कमी के लिए भी जिम्मेदार ठहराए जा रहे हैं. नौकरी के इंटरव्यू से लेकर सामाजिक जीवन तक, दांत व्यक्ति की छवि को प्रभावित करते हैं. यही वजह है कि “गरीब दांत” गरीबी को और गहरा कर देते हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि डेंटल केयर को हेल्थकेयर सिस्टम का अनिवार्य हिस्सा बनाए बिना असमानता कम नहीं की जा सकती. जब तक इलाज सस्ता और सुलभ नहीं होगा, दांत अमीरी-गरीबी की खाई को उजागर करते रहेंगे.
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