सत्य निकेतन त्रासदी के पीछे है डीयू का हॉस्टल संकट, हर 34 छात्र में से सिर्फ 1 के लिए कैंपस में जगह
DU में हॉस्टल की कमी ने हजारों स्टूडेंट्स को प्राइवेट PG के भरोसे छोड़ दिया है. भारी किराया, सुरक्षा की चिंता और जवाबदेही का अभाव—सत्य निकेतन हादसे के बाद स्टूडेंट्स पूछ रहे हैं, आखिर सुरक्षित रहने का विकल्प उन्हें कौन देगा?
“अगर दिल्ली यूनिवर्सिटी के हमारे कॉलेजों में हॉस्टल होते तो हमें यहां आने की जरूरत ही नहीं होती… सत्य निकेतन के इन हालात में रहना हमारी मजबूरी है, वरना यहां कोई नहीं रहना चाहता.”
दिल्ली के सत्य निकेतन में हॉस्टल की पांच मंजिला इमारत गिरने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के स्टूडेंट्स का यही दर्द सामने आ रहा है. 7 लोगों की जान लेने वाले इस हादसे ने सिर्फ एक हॉस्टल या PG की सुरक्षा पर सवाल नहीं खड़े किए, बल्कि DU में हॉस्टल की भारी कमी की तस्वीर भी सामने ला दी है. DU के कुल 7 लाख स्टूडेंट्स के लिए हॉस्टल की सुविधा बेहद मामूली है. कई कॉलेजों में एक कोर्स में हॉस्टल की दो सीटें तो कई कॉलेजों में तो हॉस्टल है ही नहीं. बाहर से आने वाले स्टूडेंट्स के पास कॉलेज के पास रहने के लिए प्राइवेट PG, हॉस्टल या कमरा लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता. यही मजबूरी अब उनकी जेब पर भी भारी पड़ रही है और सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर रही है.
“अगर कॉलेज का अपना हॉस्टल रहता तो घर की पूरी कमाई मेरे रहने में नहीं लग जाती”
यूपी के मुरादाबाद से आने वाले हर्ष यादव हादसे के बाद से अपने PG में नहीं गए हैं. उन्होंने उस हादसे में अपने एक दोस्त को खो दिया है. आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज यानी ARSD में B.Sc केमिस्ट्री ऑनर्स के सेकेंड ईयर के स्टूडेंट हर्ष न सिर्फ डर में हैं बल्कि उनके अंदर गुस्सा भी है. उन्होंने NDTV से बात करते हुए कहा, “बाहर लोग PG के नाम पर धंधा चला रहे हैं. एक-एक रूम से 40 हजार कमा रहे हैं. उनका लालच बढ़ता जाता है और वह उसके ऊपर मंजिल खड़ी करते जाते हैं. हम सरकारी कॉलेज में आते हैं ताकि हमें ज्यादा पैसे न देने पड़ें. कम पैसों में ही अच्छी पढ़ाई हो जाए. अगर कॉलेज का अपना हॉस्टल रहता और वहां हम रहते तो मुश्किल से महीने के 5-6 हजार लगते.”
उन्होंने आगे कहा, “आज मैं बाहर हर महीने 15 हजार देकर भी ऐसे PG में रहता हूं जिसमें डर लगता है. मैं तो खुद सोचता हूं कि मेरे मां-बाप मुझे कैसे पढ़ा पा रहे हैं. हर महीने लगभग 20 हजार भेजते हैं. आप बस यही समझो कि घर की जितनी कमाई है, वह लगभग पूरी यहां आ जाती है.”

हर्ष यादव (बाएं से दूसरे) के साथ बैठे उनके तीन दोस्त
हर्ष के साथ ही बैठे उनके तीन अन्य दोस्तों ने पहले ही हॉस्टल छोड़कर अपना कमरा किराए पर ले लिया था. उनमें से एक हर्षवर्धन हैं जो वैसे तो मूल रूप से जयपुर के हैं लेकिन उनका परिवार देहरादून में रहता है. उनका साफ कहना है कि सभी स्टूडेंट कॉलेज में हॉस्टल नहीं होने की वजह से ही मजबूरी में PG में रहते हैं. उन्होंने अपने कॉलेज ARSD की तुलना श्री वेंकटेश्वर कॉलेज से की.

हर्षवर्धन
दिल्ली यूनिवर्सिटी में हॉस्टल मिलना इतना मुश्किल क्यों है?
इस सवाल का जवाब आंकड़ों में है. DU में रेगुलर, प्रोफेशनल और ओपन-लर्निंग प्रोग्राम्स में मिलाकर लगभग 7 लाख बच्चे हैं. 2024-25 एकेडमिक ईयर में 2.5 लाख स्टूडेंट रजिस्टर्ड हैं. वैसे तो यूनिवर्सिटी अपने कॉलेजों में मौजूद हॉस्टल सीटों की कोई एक आधिकारिक और कुल संख्या जारी नहीं करती है.
लेकिन दिल्ली यूनिवर्सिटी की ओर से दिए गए अलग अलग डॉक्यूमेंट को एक साथ देखकर यह पता चलता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के तमाम college को मिलाकर हॉस्टल क्षमता 7324 बेड की है. यानी DU में हर 96 स्टूडेंट्स में से केवल 1 को हॉस्टल का कमरा मिलता है (7 लाख स्टूडेंट्स के आधार पर). वहीं रजिस्टर्ड स्टूडेंट्स के बीच भी, यह रेशियो 34 स्टूडेंट्स में से सिर्फ 1 को हॉस्टल मिलने का है.
2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 30 हजार से ज्यादा अंडरग्रेजुएट स्टूडेंट्स ने हॉस्टल के लिए आवेदन किया था लेकिन 10% से भी कम को सीट मिली. मजबूरी में अधिकतर स्टूडेंट्स को बाहर PG, हॉस्टल या किराए के रूम में रहना होता है.
“PG वाले हमारी मजबूरी को जानते हैं और उसका फायदा उठाते हैं”
जीसस एंड मैरी कॉलेज में सेकेंड ईयर की स्टूडेंट इशिका सोनिपत, हरियाणा से आती हैं. उन्हें अपनी PG में एक महीने पहले ही नई पार्टनर जाह्नवी राणा मिली हैं जिन्होंने अगस्त में दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट एंड कॉमर्स में एडमिशन लिया है. इन दोनों ही कॉलेजों में कोई हॉस्टल नहीं है. ऐसे में मजबूरन दोनों उसी हॉस्टल डेज की PG में रहती हैं, जिसका दूसरा हॉस्टल गिर चुका है. इशिका ने NDTV से कहा, “अगर हमारे कॉलेज में हॉस्टल होते तो यकीनन हमें यहां आने की जरूरत ही नहीं होती. हमें (सत्य निकेतन में) इन परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है क्योंकि यह हमारी मजबूरी है. वरना यहां कोई नहीं रहना चाहता. हमारे लिए भी तो अपनी सुरक्षा जरूरी है.”

अपनी रूममेट जाह्नवी राणा (दाएं) के साथ इशिका (फोटो- NDTV)
यही सवाल जम्मू से पढ़ाई करने आए पुरवंश सिंह स्लैथिया उठाते हैं. पुरवंश BA पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स के थर्ड ईयर के स्टूडेंट हैं.

छात्र
“छात्र नेताओं ने हॉस्टल को केवल चुनावी मुद्दा बना रखा है”
दिल्ली यूनिवर्सिटी में पिछले 72 सालों से स्टूडेंट यूनियन का चुनाव हो रहा है और कॉलेजों में हॉस्टल बनाना सबसे बड़ा चुनावी वादा होता है. वक्त बीतता गया, नए नेता चुनकर आए, देश के वित्त मंत्री और राज्यों के CM तक बने लेकिन, अभी भी यह मुद्दा हर चुनाव में उठाया जाता है. अब DU के ये स्टूडेंट तंग आ चुके हैं.

पुरवंश की क्लासमेट अमानी नीखरा कहती हैं, “हर साल जब DU स्टूडेंट यूनियन का चुनाव आता है तो छात्र नेता आते हैं. उनमें से हर कोई अपने एजेंडा में बोलता है कि हम हॉस्टल बनवाएंगे. यहां तक कि कॉलेज के अंदर होने वाले चुनाव के उम्मीदवार छात्र नेता भी यही वादा करते हैं. लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद उन वादों को अमल में नहीं लाया जाता है. हादसे का इंतजार किया जाता है और फिर से उन वादों को अमल में लाने की बात की जाती है.”
उसी ग्रुप के यशवर्धन कहते हैं, “कॉलेज में हॉस्टल बनाना केवल स्टूडेंट पॉलिटिक्स का मुद्दा बनकर रह गया है. हर स्टूडेंट यूनियन आकर यही बोलता है कि हॉस्टल बनेगा. सत्य निकेतन तो कुछ नहीं, आप एक बार जाकर वसंत गांव की हालत देखिए. वह तो और बदतर है. लेकिन जिनके पास पैसे नहीं हैं, वह मजबूर हैं वहां रहने को.”

यशवर्धन (ग्रीन टीशर्ट) के साथ पुरवंश और अमानी (फोटो- NDTV)
भले सत्य निकेतन में हुआ हादसा शायद एक इमारत के गिरने की कहानी हो, लेकिन DU के इन स्टूडेंट्स के लिए यह उनकी पूरी व्यवस्था पर सवाल है. जब कॉलेजों में हॉस्टल की सीटें इतनी कम हों और कई कॉलेजों में हॉस्टल हो ही नहीं, तो घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर आए स्टूडेंट्स के पास प्राइवेट PG में रहने के अलावा रास्ता क्या है? सवाल यह है कि हादसे के बाद भी अगर वही मजबूरी जारी रही, तो अगला हादसा होने से पहले जिम्मेदारी कौन लेगा?
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