'50 हजार लिए, अब फोन बंद', सत्य निकेतन हादसे के बाद 'हॉस्टल डेज' के दूसरे PG की लड़कियों को दीवारें डरा रहीं
दिल्ली में पढ़ने का सपना लेकर आईं फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट्स डरी हुई हैं. NDTV ने उसी हॉस्टल डेज के दूसरे PG की लड़कियों से बात की, जिसकी 5 मंजिला इमारत सत्य निकेतन में भरभराकर गिर गई.
“हमने करीब 50 हजार रुपये दिए हैं… दो महीने की सिक्योरिटी, सितंबर का रेंट… लेकिन अब हॉस्टल डेज PG चलाने वाला हमारा फोन तक नहीं उठा रहा. उसका फोन स्विच ऑफ है. हम तो बस अपना पैसा वापस चाहते हैं”
ये दर्द है श्वेता सिंह का, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी के मैत्रेयी कॉलेज में फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट हैं. श्वेता अकेली नहीं हैं. जिस हॉस्टल डेज के एक हॉस्टल वाली 5 मंजिला बिल्डिंग रविवार को दिल्ली के सत्य निकेतन में भरभराकर गिर गई, उसी की दूसरी बिल्डिंग में रहने वाली कई फर्स्ट ईयर स्टूडेंट्स अब डर के साए में हैं. दिल्ली आए अभी एक महीना ही हुआ है. हादसा आंखों के सामने देखा, अब अपने PG की दीवारें भी डराती हैं. लेकिन सवाल सिर्फ डर का नहीं है- PG छोड़ें तो जाएं कहां और हजारों रुपये की सिक्योरिटी का क्या होगा?
NDTV ने ग्राउंड पर पहुंचकर इन्हीं फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट्स से बात की.

सत्या निकेतन की इमारतों का हाल बता रहा है कि कोई भी हादसा, कभी भी हो सकता है (फोटो- NDTV)
"हमारी कोई सिक्योरिटी नहीं है, बस PG वालों की ही सिक्योरिटी फिक्स"
रिचा अरोड़ा एक महीना पहले पंजाब से दिल्ली आईं और लेडी श्रीराम कॉलेज में BSc मैथ्स ऑनर्स के कोर्स में एडमिशन लिया. आज वह डर के साए में जी रही हैं. वह भी श्वेता की तरह हॉस्टल डेज के ही गर्ल्स पीजी में रहती हैं. NDTV से बात करते हुए उन्होंने कहा, "हमारे अंदर सिर्फ डर नहीं है. हम मानसिक रूप से परेशान हो रहे हैं. अगर हमारे पैरेंट्स इतनी मुश्किलों के बाद हमें इतनी दूर भेज रहे हैं तो आपको, इस दिल्ली को तो हमारा ध्यान रखना चाहिए था न. अगर यहां के PG ऑनर्स या फ्लैट मालिक बच्चों को अपने यहां रखने के लिए ब्लैक में करप्शन के जरिए मंजूरी ले रहे हैं तो यह तो गलत है न."
मैत्रेयी कॉलेज में फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट श्वेता सिंह बताती हैं कि वह जिस PG में रहती हैं, वह हॉस्टल डेज का ही PG है. सोशियोलॉजी ऑनर्स कर रहीं श्वेता ने कहा, "उनकी कई सारी बिल्डिंग हैं. अगर ये सारी भी सील होती हैं तो हमारा क्या होगा. इन्होंने हमसे दो महीने की सिक्योरिटी ले रखी है और सितंबर का रेंट भी ले लिया है. हम हर महीने 15 हजार देते हैं. साथ में बिजली का बिल और मेंटेनेंस. यानी उनके पास हमारे 50 हजार रुपए रखे हैं. अगर PG सील होने पर हमें बाहर निकाला जाता है या आज अपनी जान बचाने के लिए हम खुद PG छोड़ते हैं तो वह रुपया तो हमारा नहीं मिलेगा न. जो PG चलाते थे, जिसका यह PG था, वो यहां से जा चुका है और हमारा फोन भी नहीं उठा रहा है. उन्होंने अपना फोन ही स्विच्ड ऑफ कर दिया है. हम जो अपना पैसा ही वापस चाहते हैं."

अपनी रूममेट इशिका के साथ जाह्नवी राणा (फोटो- NDTV)
"हमें अपनी PG की दीवारों को देखकर डर लग रहा"
बिहार से एक महीने पहले दिल्ली आकर साक्षी ने भी मैत्रेयी कॉलेज में एडमिशन लिया. उन्होंने उसी PG में बेड लिया, जिसमें श्वेता और रिचा रहती हैं. अब हादसे की खबर के बाद उनके घर वाले परेशान हैं. उन्होंने NDTV से बात करते हुए कहा, "कल से यह खबर आने के बाद घर वाले पूरी तरह परेशान हैं. एक महीने पहले ही तो मम्मी-पापा हमें छोड़कर यहां से गए थे. हम अगर PG बदलें भी तो कहां जाएं. पूरे सत्य निकेतन में ही हर PG की यही हालत है. अगर हम दूर कहीं PG या फ्लैट लेते हैं तो हर दिन उतनी दूर से ट्रैवल करके कॉलेज आना मुश्किल होगा."
श्वेता भी इसी बात को दोहराती हैं. उनका कहना है, "हमें आए मुश्किल से एक महीना हुआ है और आते ही इस हादसे ने हमें बहुत बड़े ट्रॉमा में डाल दिया है. हम इतनी दूर से आए हैं और यहां आते ही एकदम डर चुके हैं. हमें अपनी PG की दीवारों को देखकर डर लग रहा है. ऊपर से हम उसी हॉस्टल डेज की बिल्डिंग में रह रहे हैं जिसका दूसरा PG गिर चुका है."
"दिल्ली आना सपना था लेकिन एक महीने में ट्रेजडी देख ली"
ऐसा नहीं है कि बच्चे सिर्फ हॉस्टल डेज से जुड़े PG के ही डरे हुए हैं. सत्य निकेतन में ही उसी गली के दूसरे PG में जाह्नवी राणा रहती हैं, जो उत्तराखंड से आई हैं. वह भी फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट हैं. उन्होंने NDTV से बात करते हुए कहा कि, "हमारे अंदर दिल तक डर बैठ चुका है. हम इतनी दूर से दिल्ली पढ़ने आए हैं. जब से खबर आई है, घर से पैरेंट्स बार-बार कॉल कर रहे हैं. अभी यहां का माहौल इतना बेकार हो रखा है. हमें रात भर अपनी PG के बेड पर नींद नहीं आई. यह रात गुजरना हमारे लिए सबसे मुश्किल था."
यानी इन स्टूडेंट्स के लिए ये सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि दिल्ली में उनकी नई जिंदगी पर लगा एक बड़ा सवाल है. एक तरफ आंखों के सामने इमारत गिरने का डर है, दूसरी तरफ सुरक्षित जगह मिलने का भरोसा नहीं. कॉलेज के अपने हॉस्टल या तो हैं नहीं और हैं तो भी हर कोर्स में लगभग 2 सीटें. प्राइवेट PG में हजारों रुपये पहले ही जमा करने पड़ते हैं और अब हादसे के बाद PG छोड़ने पर अपना पैसा वापस मिलेगा या नहीं, इसकी भी गारंटी नहीं. दिल्ली में पढ़ने का सपना लेकर आए इन फर्स्ट ईयर स्टूडेंट्स के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है- पढ़ाई और सपनों के लिए घर से दूर आए इन बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
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