"सत्य निकेतन को ऊपर ड्रोन से देखिए, यूक्रेन और गाजा से बदहाल दिखेगा, अब पीजी में नींद नहीं आती"
देश के कोने-कोने से पढ़ने आए इस स्टूडेंट्स ने अपनी आंखों के सामने दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन में पांच मंजिला हॉस्टल को भरभराकर गिरते देखा. अब इनके जेहन में डर है तो जुबान पर सवाल. यहां पढ़िए NDTV की ग्राउंड रिपोर्ट.
“अभी आए तो हमें एक ही महीना हुआ है… दिल्ली आना हमारे लिए सपना था, लेकिन एक महीने में जो ट्रेजडी यहां देख ली है, उसने डरा दिया है…”
यह कहना है दिल्ली यूनिवर्सिटी की फर्स्ट ईयर स्टूडेंट जाह्नवी राणा का. जाह्नवी को उत्तराखंड से दिल्ली आए अभी सिर्फ एक महीना हुआ था… आंखों में नए कॉलेज, नई जिंदगी और बड़े सपने थे. लेकिन रविवार, 6 सितंबर को इन फर्स्ट ईयर स्टूडेंट्स ने अपनी आंखों के सामने दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत को भरभराकर गिरते देखा. इसी में हॉस्टल चलता था. इस हादसे में कई स्टूडेंट्स समेत 7 लोगों की मौत हो चुकी है. कई गंभीर रूप से घायल हैं. जिस PG को उन्होंने अपना घर समझकर हजारों रुपये की सिक्योरिटी और एडवांस रेंट दिया था, आज उसी PG की दीवारें उन्हें डरा रही हैं. किसी के घरवाले रातभर फोन करते रहे, किसी की पूरी रात नींद नहीं आई… और किसी के मन में सवाल है कि अगर PG छोड़ भी दें, तो जाएं कहां? कॉलेज के हॉस्टल में सीटें इतनी कम कि मौका मिलना लगभग नामुमकिन. तो आखिर दिल्ली में पढ़ने आए इन बच्चों के पास सुरक्षित रहने का विकल्प क्या है?
NDTV ने ग्राउंड पर पहुंचकर इन्हीं फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट्स से बात की.
"जो पास के हैं, वे तो घर जा सकते हैं"
सोमवार को एक तरफ NDRF की जेसीबी जमीन पर बिखरे हॉस्टल का मलबा हटा रही थी तो दूसरे ओर कई ऐसी फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट थी जो अपना बैग उठाए सत्य निकेतन छोड़ रही थीं. नाम और तस्वीर न लेने की शर्त पर उन्होंने बताया कि घर वाले डर गए हैं और वे कुछ दिनों के लिए घर वापस बुला रहे हैं नहीं तो दिल्ली में ही किसी रिश्तेदार के यहां जाने को कह रहे हैं. लेकिन सबके पास ऐसा विकल्प नहीं है.
जाह्नवी राणा की सबसे बड़ी उलझन यह है कि वह अभी क्या करे. दिल्ली आए एक महीना गुजर चुका था, सेकेंड ईयर में पढ़ने वाली इशिका दोस्त बन गई थी. पढ़ाई के साथ सबकुछ सही चल रहा था लेकिन फिर रविवार का वह दिन आया जब उम्मीदों की जगह डर ने ले ली. जाह्नवी ने NDTV से बात करते हुए कहा कि, "हमारे अंदर दिल तक डर बैठ चुका है. हम इतनी दूर से दिल्ली पढ़ने आए हैं. जब से खबर आई है, घर से पैरेंट्स बार-बार कॉल कर रहे हैं. अभी यहां का माहौल इतना बेकार हो रखा है. हमें रात भर अपनी PG के बेड पर नींद नहीं आई. यह रात गुजरना हमारे लिए सबसे मुश्किल था."

अपनी रूममेट इशिका के साथ जाह्नवी राणा (फोटो- NDTV)
उन्होंने कहा, "जिनका घर पास में है, वे तो घर जा सकते हैं लेकिन हम जो दूर से आए हैं, वे कहां जाएं. अभी आए तो हमें एक ही महीना हुआ है, दिल्ली आना हमारे लिए सपना था लेकिन एक महीने में जो ट्रेजडी यहां देख ली है, उसने डरा दिया है. घर से कॉल आया था, पैरेंट्स आ रहे हैं. शायद PG बदलेंगे. देखते हैं. मुझे तो पता भी नहीं कि सत्य निकेतन को छोड़ेंगे तो कहां जाएंगे, लेकिन अभी यहां की स्थिति एकदम ठीक नहीं."
नए बच्चों के डर के सामने थर्ड ईयर के बच्चों का अनुभव और उनका अंदेशा सामने आ रहा है. BA पॉलिटिकल साइंस के थर्ड ईयर के स्टूडेंट यशवर्धन ने NDTV से बात करते हुए कहा कि रविवार को सत्य निकेतन में जो हादसा हुआ, वह यहां हो रहीं चीजों का रिजल्ट भर था. उन्होंने कहा, "मैंने जिस दिन यहां ढाई साल पहले कदम रखा था, तब भी बारिश के पानी में पांव डूबा हुआ था, नाकों में धुआं जा रहा था और सत्य निकेतन की इतनी बुरी हालत थी कि मैं तब सोच रहा था कि यहां बच्चे रहते कैसे हैं. इससे अच्छी स्थिति तो जंग में डूबे यूक्रेन और गाजा जैसे जगहों की है. आप यहां ड्रोन उड़ा लीजिए और आपको देखकर लगेगा कि आप गाजा की एरियल फुटेज देख रहे हैं."

थर्ड ईयर के साथी स्टूडेंट्स के साथ यशवर्धन (ग्रीन टीशर्ट), फोटो- NDTV
"दिल्ली को तो हमारा ध्यान रखना चाहिए था न"
लेडी श्रीराम कॉलेज में BSc मैथ्स की पढ़ाई करने वाली रिचा अरोड़ा भी पंजाब से आई हैं. वह भी फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट हैं और एक महीने पहले ही दिल्ली आई हैं. उन्होंने कहा, "हमारे अंदर सिर्फ डर नहीं है. हम मानसिक रूप से परेशान हो रहे. अगर हमारे पैरेंट्स इतनी मुश्किलों के बाद हमें इतनी दूर भेज रहे हैं तो आपको, इस दिल्ली को तो हमारा ध्यान रखना चाहिए था न. अगर यहां के पीजी ऑनर्स या फ्लैट मालिक बच्चों को अपने यहां रखने के लिए ब्लैक में करप्शन के जरिए मंजूरी ले ले रहे हैं तो यह तो गलत है न."

सत्या निकेतन की इमारतों का हाल बता रहा है कि कोई भी हादसा, कभी भी हो सकता है (फोटो- NDTV)
मैत्रेयी कॉलेज में फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट साक्षी बिहार से आई हैं. उन्होंने NDTV कहा, "कल से यह खबर आने के बाद घर वाले पूरी तरह परेशान है. एक महीने पहले ही तो मम्मी पापा हमें छोड़कर यहां से गए थे. हम अगर पीजी बदले भी तो कहां जाएं. पूरे सत्य निकेतन में ही हर पीजी की यही हालत है. अगर हम दूर कहीं पीजी या फ्लैट लेते हैं तो हर दिन उतनी दूर से ट्रैवल करके कॉलेज आना मुश्किल होगा.
यानी दिल्ली में पढ़ाई का सपना लेकर आए इन फर्स्ट ईयर स्टूडेंट्स के लिए महज एक महीने में तस्वीर बदल गई है. नए कॉलेज, नए दोस्त और नई जिंदगी की शुरुआत अभी ठीक से हुई भी नहीं थी कि सत्य निकेतन का हादसा उनके लिए डर की ऐसी याद छोड़ गया, जिसे भुलाना आसान नहीं होगा. अब सवाल सिर्फ उस एक PG का नहीं है. सवाल उन तमाम स्टूडेंट्स का है, जो हॉस्टल में सीट न मिलने पर प्राइवेट PG में रहने को मजबूर हैं. घर से दूर आए इन बच्चों को अब सुरक्षित घर की तलाश है.
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