पीढ़ियों के बीच संवाद: छात्रों ने बताया जंतर-मंतर पर क्यों उठाए भगत सिंह, चे ग्वेरा और आंबेडकर के पोस्टर?

GROUND REPORT: जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन ने एक बार फिर दिखाया कि चाहे पीढ़ियां बदल जाती हैं, आंदोलन बदल जाते हैं, मांगें बदल जाती हैं, लेकिन विरोध के पोस्टरों पर इतिहास बार-बार लौट आता है.

पीढ़ियों के बीच संवाद: छात्रों ने बताया जंतर-मंतर पर क्यों उठाए भगत सिंह, चे ग्वेरा और आंबेडकर के पोस्टर?
Jantar Mantar Protest, Ground Report: जंतर-मंतर से स्टूडेंट्स इतिहास लेकर आए थे (फोटो- NDTV)

"बाबा साहेब हमारे लिए लड़े थे और उन्होंने दिखाया था कि लड़ने से हक मिलता है. आज भी वह गूंज हमारे अंदर है."

यह कहना था 28 साल की करुणा का, जो बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का पोस्टर लेकर जंतर-मंतर पहुंची थीं. आंदोलन खत्म होने से पहले यहां जुटे हजारों छात्र सिर्फ क्रिएटिव नारे नहीं लगा रहे थे, वे अपने साथ इतिहास भी लेकर आए थे. किसी के हाथ में बाबा साहेब की तस्वीर थी, तो किसी के पोस्टर पर भगत सिंह, चे ग्वेरा और दूसरे क्रांतिकारियों के विचार जिंदा थे. हर पोस्टर एक कहानी कह रहा था, हर नारे के पीछे एक सोच थी. नीट पेपर लीक के खिलाफ हुआ यह प्रदर्शन सफल हो चुका है. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है. आंदोलन के आखिरी दिन NDTV ने जंतर-मंतर जाकर इन छात्रों से समझने की कोशिश की कि इतिहास के ये नायक पीढ़ियों के बीतने के बाद भी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा कैसे दे रहे हैं.

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जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में बाबा साहेब का पोस्टर लेकर पहुंचीं करुणा (फोटो- एनडीटीवी)

जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में बाबा साहेब का पोस्टर लेकर पहुंचीं करुणा (फोटो- एनडीटीवी)

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जब जंतर-मंतर पर जश्न मन रहा था, तब प्रदर्शनकारियों ने CJP फाउंडर अभिजीत दीपके को कंधे पर उठा लिया था. उस समय उनसे भी ऊपर एक तस्वीर उठी थी—वह तस्वीर थी बाबा साहेब आंबेडकर की. वैसे गाजियाबाद से प्रोटेस्ट में शामिल होने आए श्यामलाल यादव के लिए भगत सिंह इतिहास के ऐसे चेहरे हैं, जो उन्हें आज भी सीख देते हैं. उन्होंने NDTV से बात करते हुए कहा, "हम जो आज आंदोलन कर रहे हैं, उसी तरह भगत सिंह ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी. हम आज उनकी ओर देख रहे हैं और उनसे सीख रहे हैं. हम भी उनकी तरह ही लड़ना सीखना चाहते हैं. जब मैंने देखा कि यहां (जंतर-मंतर पर) छोटे बच्चों, बहनों पर लाठियां चल रही थीं, तब मैं यहां आया."

श्यामलाल जाटव (दाएं) मजदूर हैं और वह भगत सिंह का पोस्टर लेकर जंतर-मंतर आए थे (फोटो- एनडीटवी)

श्यामलाल जाटव (दाएं) मजदूर हैं और वह भगत सिंह का पोस्टर लेकर जंतर-मंतर आए थे (फोटो- एनडीटवी)

पेशे से मजदूरी करने वाले श्यामलाल के लिए किसी भी आंदोलन को सफल बनाने के लिए समाज के सभी तबकों के साथ की जरूरत होती है और ऊपर से बाबा साहेब और भगत सिंह जैसे नायकों से मिली सीख की भी.

"केवल पोस्टर लेने से कुछ नहीं होगा, इनसे सीखना भी होगा"

आयुष और सचिन स्टूडेंट हैं और दोस्त भी. दोनों यहां एक साथ पहुंचे थे और उनके हाथों में भगत सिंह और चे ग्वेरा के पोस्टर थे. चे ग्वेरा अर्जेंटीना के मार्क्सवादी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने क्यूबा की क्रांति में मुख्य भूमिका निभाई. उन्हें आज तक क्रांति के सबसे बड़े नायकों में से एक माना जाता है. जब रिपोर्टर ने दोनों से सवाल किया कि वे यह पोस्टर लेकर क्यों आए हैं, तो 19 साल के आयुष ने कहा, "ये दोनों चेहरे यंग जेनेरेशन को इंस्पायर (प्रेरणा) करते हैं. भले चे ग्वेरा की मौत को 60 साल हो गए हैं, लेकिन आज भी जब-जब अन्याय के खिलाफ दुनिया में कहीं भी आंदोलन होता है, तो आपको इनका पोस्टर देखने को मिलेगा."

आयुष और सचिन डीयू में पढ़ाई करते हैं और यूनिवर्सिटी के मना करने पर भी जंतर-मंतर पहुंचे थे (फोटो- एनडीटीवी)

आयुष और सचिन डीयू में पढ़ाई करते हैं और यूनिवर्सिटी के मना करने पर भी जंतर-मंतर पहुंचे थे (फोटो- एनडीटीवी)

आयुष के साथ ही दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने वाले सचिन का कहना है कि हम भगत सिंह के साथ राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद का भी पोस्टर उठाते हैं, लेकिन सिर्फ पोस्टर उठाने से कुछ नहीं होगा. उन्होंने कहा, "हमें पोस्टर उठाने से पहले उनकी कही बातों को अपने अंदर उतारना होगा. यहां बहुत कम बच्चों ने आंदोलन के दौरान इनसे मिली सीखों पर अमल किया. हमें इनसे सीखना होगा. अभी तो यह बस आंदोलन का एक चरण है. हमें आगे और बहुत से काम करने हैं."

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करुणा ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर ली है और आगे भी उनकी पढ़ाई जारी है. उनके हाथ में बाबा साहेब की हाथ से बनी तस्वीर थी, जिसमें उन्होंने भारत का संविधान पकड़ रखा था. करुणा के अनुसार, "बाबा साहेब ने हमारे लिए लड़ाई लड़ी है और हमारा जीवन इससे बदला है. इन्होंने दिखाया था कि लड़ने से हक मिलता है. हमने इनसे सीखा है कि कैसे शांतिपूर्ण विरोध के जरिए अपना हक लेते हैं."
इन छात्रों के लिए इतिहास के यह नायक आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं (फोटो- एनडीटीवी)

इन छात्रों के लिए इतिहास के यह नायक आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं (फोटो- एनडीटीवी)

दिल्ली के बदरपुर से जंतर-मंतर आईं करुणा के लिए भविष्य में भी जब-जब आंदोलन होंगे, बाबा साहेब और भगत सिंह जैसे नायकों के पोस्टर लगेंगे, उनके नारे लगेंगे. उनका कहना था कि जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के इस आंदोलन को भी आने वाले दौर में याद रखा जाएगा. एक शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के तौर पर इसका नाम लिया जाएगा.

जंतर-मंतर पर चे ग्वेरा के बहुत सारे पोस्टर देखने को मिले  (फोटो- एनडीटीवी)

जंतर-मंतर पर चे ग्वेरा के बहुत सारे पोस्टर देखने को मिले (फोटो- एनडीटीवी)

जंतर-मंतर का यह धरना अब खत्म हो चुका है. पोस्टर समेट लिए गए हैं, नारे थम गए हैं और छात्र अपने-अपने घर लौट चुके हैं. लेकिन उनके हाथों में दिखे बाबा साहेब, भगत सिंह और चे ग्वेरा जैसे चेहरे शायद सिर्फ उन 37 दिनों के प्रदर्शन का हिस्सा नहीं थे. इन छात्रों के लिए वे याद दिलाते हैं कि हर दौर में अन्याय के खिलाफ लड़ाई नई होती है, लेकिन उससे प्रेरणा लेने वाले चेहरे अक्सर वही रहते हैं. शायद यही वजह है कि पीढ़ियां बदल जाती हैं, आंदोलन बदल जाते हैं, मांगें बदल जाती हैं, लेकिन विरोध के पोस्टरों पर इतिहास बार-बार लौट आता है.

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