आज यानी 22 अक्टूबर को पापांकुशा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है. हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है. यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है. एक साल में कुल 24 एकादशी आती हैं. धार्मिक मान्यता है कि पापांकुशा एकादशी का व्रत रखने से और इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति को अपने पापों से मुक्ति मिलती है. इस व्रत के प्रभाव से परिवार की कई पीढ़ियों का उद्धार होता है. साथ ही, भगवान विष्णु की कृपा से सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है. ऐसे में भक्त एकादशी के दिन सच्ची श्रद्धा से उपवास रखते हैं और श्री हरि की पूजा करते हैं. वहीं, एकादशी की पूजा में व्रत कथा सुनने का भी खास महत्व है. माना जाता है कि कथा पढ़ने या सुनने के बिना व्रत अधूरा रहता है. ऐसे में अगर आप भी आज एकादशी का व्रत रख रहे हैं, तो पूजा के दौरान यहां से पापांकुशा एकादशी की पूरी व्रत कथा पढ़ सकते हैं-
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या महत्व है और इस दिन व्रत रखने से क्या फल मिलता है. तब भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इस एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है. इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति के पाप दूर होते हैं. साथ ही, पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसके बाद श्रीकृष्ण ने इस व्रत से जुड़ी एक कथा सुनाई.
प्राचीन समय में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था. वह बहुत क्रूर और पापी था. उसने अपने पूरे जीवन में कई जीवों को मारा और दूसरों को कष्ट पहुंचाया. क्रोधन को जीवों की हत्या करने में जरा भी संकोच नहीं होता था. समय के साथ धीरे-धीरे उसकी उम्र बढ़ने लगी और एक दिन उसके सामने यमराज के दूत आ गए. उन्होंने क्रोधन को बताया कि जल्द ही उसकी मृत्यु हो जाएगी और उसे यमलोक ले जाया जाएगा.
यह सुनकर क्रोधन बहुत डर गया. उसे एहसास हुआ कि उसने अपने जीवन में कोई अच्छा काम नहीं किया है, गलत कर्मों का एहसास होने पर क्रोधन पश्चाताप की भावना में डूब गया. साथ ही उसे चिंता होने लगी कि जीवनभर किए गए पापों के कारण उसे नरक में दुख भोगने पड़ेंगे. वह किसी भी तरह अपने पापों से मुक्ति पाना चाहता था. इसी का उपाय खोजते हुए क्रोधन अंगिरा ऋषि के आश्रम जा पहुंचा. वहां उसने ऋषि को प्रणाम किया और फिर उन्हें अपने जीवन में किए सारे पापों का काला चिट्ठा सुना दिया. क्रोधन ने ऋषि से विनती की कि उसे अपनी गलतियों का एहसास है और अब वह इन्हें सुधारना चाहता है. ऐसे में वे उसे कोई ऐसा रास्ता बताएं, जिससे वह पापों से मुक्त होकर मोक्ष पा सके.
क्रोधन की बात सुनकर अंगिरा ऋषि ने उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी. उन्होंने बताया कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर विधि-विधान से व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से पापों से मुक्ति मिल सकती है.
ऋषि की बात सुनकर क्रोधन को उम्मीद मिली. उसने एकादशी के दिन व्रत रखा, भगवान विष्णु की पूजा की और रात में जागरण किया. अगले दिन व्रत का पारण करके उसने अपना व्रत पूरा किया. भगवान विष्णु की कृपा से क्रोधन के पाप मिट गए और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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