तो क्या भारत को कोहिनूर लौटाएगा ब्रिटेन? लूटी विरासत पर क्यों अड़ा है लंदन, और क्या कहता है अंग्रेजों का कानून
जोहरान ममदानी के बयान के बाद भारत में कोहिनूर फिर चर्चा में है, लेकिन ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट 1963 और सीमित कानूनी छूट के चलते ब्रिटेन इसे लौटाने को तैयार नहीं है. भारत के लिए यह हीरा औपनिवेशिक लूट और ऐतिहासिक अन्याय का प्रतीक बना हुआ है.
दुनिया के सबसे चर्चित और विवादित हीरों में शामिल कोहिनूर एक बार फिर सुर्खियों में है. न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी ने अमेरिका दौरे पर आए ब्रिटेन के राजा किंग चार्ल्स तृतीय से कोहिनूर को भारत लौटाने की अपील की है. इसके साथ ही एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या ब्रिटेन कभी कोहिनूर भारत को लौटाएगा?
क्यों नहीं लौटाता ब्रिटेन कोहिनूर? कानून सबसे बड़ी ढाल
DW (डॉयचे वेले) की रिपोर्ट बताती है कि कोहिनूर की वापसी में सबसे बड़ी अड़चन British Museum Act, 1963 है. इस कानून के तहत ब्रिटेन के राष्ट्रीय संग्रहालय, खासकर ब्रिटिश म्यूजियम, अपनी कलेक्शन में शामिल किसी भी वस्तु को स्थायी रूप से लौटा नहीं सकते.
इसी कानून के कारण ब्रिटिश सरकार बार-बार यह तर्क देती रही है कि कोहिनूर या अन्य औपनिवेशिक दौर में लाई गई धरोहरों को लौटाना कानूनी रूप से संभव नहीं है. ऐसे मामलों में अंतिम फैसला Foreign and Commonwealth Office (अब FCDO) के पास होता है.
नया Charities Act 2022: उम्मीद या दिखावा?
हालांकि, DW की रिपोर्ट के अनुसार, नए Charities Act, 2022 के तहत संग्रहालयों को कुछ बेहद सीमित मामलों में नैतिक आधार पर (ex‑gratia) कलाकृतियां लौटाने की अनुमति दी गई है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह छूट इतनी सीमित है कि ब्रिटिश म्यूजियम जैसे संस्थानों पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ता. यानी कोहिनूर की वापसी इस रास्ते से भी लगभग असंभव ही दिखती है.

दूसरों की धरोहर संभालने पर क्यों अड़ा है ब्रिटेन?
DW और The Guardian के विश्लेषण के मुताबिक, ब्रिटेन के बड़े संग्रहालय जैसे ब्रिटिश म्यूजियम और V&A देश की अर्थव्यवस्था के बड़े स्तंभ हैं.
हर साल करोड़ों पर्यटक इन म्यूजियम में आते हैं. इससे ब्रिटेन की कई अरब पाउंड की कमाई होती है और इसी के दम पर ब्रिटेन वैश्विक सांस्कृतिक दबदबा बनाए हुए है.
V&A म्यूजियम के निदेशक ट्रिस्ट्राम हंट ने The Guardian में लिखे एक लेख में तर्क दिया कि 'औपनिवेशिक कलाकृतियों को उनके मूल संदर्भ से अलग करके वैश्विक विरासत के तौर पर देखना चाहिए.' इसी सोच के तहत ब्रिटेन अपने संग्रहालयों को यूनिवर्सल म्यूजियम बताता है.
कोहिनूर: भारत से लेकर ब्रिटिश ताज तक का सफर
BBC और Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, कोहिनूर का मूल भारत की गोलकुंडा खदानों (वर्तमान तेलंगाना–आंध्र क्षेत्र) में माना जाता है. कुछ मान्यताओं में इसे भागवत पुराण की स्यमंतक मणि से भी जोड़ा जाता है. BBC के मुताबिक, 1840 के दशक में ब्रिटिश अधिकारी थियो मेटकाफ ने रिपोर्ट में लिखा था कि यह हीरा भगवान कृष्ण के काल का है. हालांकि इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल और अनिता आनंद अपनी किताब Kohinoor: The Story of the World's Most Infamous Diamond में कहते हैं कि यह हीरा किसी खदान से नहीं, बल्कि संभवतः सूखे नदी तल से मिला था.

मुगल, अफगान और सिख शासकों के दौर से गुजरा कोहिनूर
Indian Express के अनुसार, कोहिनूर मुगल बादशाह शाहजहां के मयूर सिंहासन का हिस्सा था. Smithsonian Magazine की रिपोर्ट बताती है कि 1739 में ईरानी शासक नादिर शाह दिल्ली लूट ले गया और कोहिनूर को अपने साथ ईरान ले गया. इसके बाद यह हीरा अफगान शासकों के पास रहा और करीब 70 साल बाद 1813 में महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंचा. इसी दौर में कोहिनूर सिख साम्राज्य की संप्रभुता और गौरव का प्रतीक बना.
अंग्रेजों के हाथ कैसे लगा कोहिनूर
BBC और Smithsonian Magazine के मुताबिक, रणजीत सिंह की मौत के बाद सिख साम्राज्य कमजोर पड़ा. 1849 में अंग्रेजों ने नाबालिग महाराजा दलीप सिंह से संशोधित लाहौर संधि पर हस्ताक्षर करवाए, जिसमें कोहिनूर अंग्रेजों को सौंपने की शर्त थी. इसके बाद यह हीरा क्वीन विक्टोरिया को सौंपा गया और 1851 की ग्रेट एग्ज़ीबिशन में प्रदर्शित किया गया. आज यह ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स का हिस्सा है.
भारत ने की कोहिनूर वापस लाने की कोशिश
भारत 1950 के दशक से समय‑समय पर कोहिनूर की वापसी का मुद्दा उठाता रहा है. DW की रिपोर्ट बताती है कि 2016 में भारत सरकार के 'तोहफे' वाले बयान पर भारी विवाद हुआ, जिसके बाद सरकार ने फिर से कूटनीतिक रास्तों से हल निकालने की बात कही. इसी बीच India Pride Project जैसे नागरिक समूहों ने जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से कई भारतीय मूर्तियां वापस लाने में सफलता पाई है.
क्यों कोहिनूर बना प्रतीक?
इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने Indian Express से कहा कि कोहिनूर पर ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान भी दावा कर सकते हैं. फिर भी भारत में यह हीरा इसलिए भावनात्मक मुद्दा है क्योंकि यह औपनिवेशिक लूट की सामूहिक स्मृति का प्रतीक बन चुका है.
मौजूदा ब्रिटिश कानूनों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को देखते हुए कोहिनूर की तत्काल वापसी की संभावना बेहद कम है. लेकिन जैसे‑जैसे औपनिवेशिक दौर की विरासत पर वैश्विक बहस तेज हो रही है, कोहिनूर एक बार फिर इस सवाल को जिंदा रखे हुए है कि क्या लूटी गई विरासत पर नैतिक हक कभी कानून से ऊपर होगा?
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