MBBS की पढ़ाई के बाद भी NEET PG क्यों होता है जरूरी? जानें कितने होते हैं पासिंग मार्क्स

MBBS के बाद अगर कोई छात्र MD या MS जैसी पोस्टग्रेजुएट मेडिकल पढ़ाई करना चाहता है, तो NEET PG देना जरूरी होता है. ये परीक्षा मेरिट के आधार पर स्पेशलिटी सीटों का सही बंटवारा करती है. इसमें पासिंग मार्क्स कैटेगरी के अनुसार तय होते हैं.

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NEET PG क्यों है जरूरी

MBBS की डिग्री हासिल करना किसी भी मेडिकल स्टूडेंट के लिए बड़ी उपलब्धि होती है. पांच से साढ़े पांच साल की कड़ी पढ़ाई, इंटर्नशिप और परीक्षाओं के बाद डॉक्टर बनना आसान नहीं होता. लेकिन यहीं पर मेडिकल एजुकेशन खत्म नहीं हो जाती. अगर कोई MBBS के बाद MD, MS या डिप्लोमा जैसे पोस्टग्रेजुएट कोर्स करना चाहता है. तो उसे NEET PG परीक्षा देनी होती है. अक्सर छात्रों के मन में सवाल होता है कि जब MBBS कर ही लिया है. तो फिर NEET PG क्यों जरूरी है?

NEET PG क्या है?

NEET PG एक नेशनल लेवल प्रवेश परीक्षा है, जिसे MBBS के बाद पोस्टग्रेजुएट मेडिकल कोर्सेज में एडमिशन के लिए आयोजित किया जाता है. इसके जरिए MD, MS और PG डिप्लोमा सीटों पर दाखिला मिलता है. ये परीक्षा पूरे देश के मेडिकल कॉलेजों के लिए एक समान मेरिट सिस्टम तय करती है.

MBBS के बाद NEET PG क्यों जरूरी है?

MBBS के दौरान छात्र सभी विषयों की बेसिक जानकारी हासिल करता है. लेकिन PG में जाकर उसे किसी एक स्पेशलिटी में गहराई से पढ़ाई करनी होती है जैसे मेडिसिन, सर्जरी, पीडियाट्रिक्स या गायनेकोलॉजी. NEET PG इसलिए जरूरी है ताकि ये तय किया जा सके कि कौन सा छात्र स्पेशलाइज्ड पढ़ाई के लिए सबसे ज्यादा तैयार है. इससे मेरिट के आधार पर सीटों का सही और ट्रांसपेरेंट डिस्ट्रिब्यूशन होता है.

NEET PG में पासिंग मार्क्स कितने होते हैं?

NEET PG में पासिंग मार्क्स कैटेगरी के हिसाब से तय होते हैं.

• जनरल (General) कैटेगरी: 50 पर्सेंटाइल

• SC/ST/OBC: 40 पर्सेंटाइल

• PwD (General): 45 पर्सेंटाइल

ध्यान देने वाली बात ये है कि पर्सेंटाइल का मतलब फिक्स नंबर नहीं होता. बल्कि ये परीक्षा के कुल रिजल्ट और परफॉर्मेंस पर डिपेंड करता है. सीटें खाली होने पर पर्सेंटाइल को कम कर दिया जाता है, जैसा कि इस बार किया गया है. 

अगर NEET PG पास न हो तो क्या करें?

अगर कोई छात्र NEET PG पास नहीं कर पाता, तो वो दोबारा तैयारी करके अगली बार परीक्षा दे सकता है. इसके अलावा MBBS के बाद कुछ समय तक जॉब, रिसर्च या क्लिनिकल प्रैक्टिस करके अनुभव भी लिया जा सकता है.

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