यूजीसी का असली बॉस कौन होता है? जानें कैसे लिए जाते हैं बड़े फैसले

UGC देशभर की यूनिवर्सिटी के लिए नियम और स्टैंडर्ड तय करता है. इसके फैसले विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों, आयोग की मंजूरी और कानूनी अधिसूचना के जरिए लागू होते हैं. अध्यक्ष के नेतृत्व में UGC शिक्षा की क्वालिटी और इक्वेलिटी सुनिश्चित करता है.

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UGC में फैसले कैसे लिए जाते हैं

हमारे देश की हायर एजुकेशन को बेहतर, कंट्रोल्ड और रिस्पॉन्सिबल बनाने की जिम्मेदारी निभाता है यूजीसी. फिलहाल यूजीसी किसी दूसरी वजह से चर्चा में है और उसका लगातार विरोध हो रहा है.  विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के जातिगत भेदभाव को लेकर बनाए गए नियमों को लेकर ये बवाल चल रहा है. तमाम कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई का लेवल, परीक्षाओं का पैटर्न, रिजर्वेशन से जुड़े नियम या नई एजुकेशन पॉलिसी से जुड़े फैसलों में यूजीसी की अहम भूमिका होती है. ताजा विवाद के बीच आज हम आपको बतातें हैं कि यूजीसी का असली बॉस कौन होता है और इसमें कैसे फैसले लिए जाते हैं. 

यूजीसी का बॉस कौन?

यूजीसी का नेतृत्व एक चेयरपर्सन करता है. जो इस संस्था का प्रमुख भी होता है. चेयरपर्सन की नियुक्ति सेंट्रल गॉर्वनमेंट करती है. उनकी मेन रिस्पॉन्सिबिलिटी हमारे देश में हायर एजुकेशन की क्वालिटी बनाए रखने की है. जिसके लिए वो सभी एजुकेशन स्टेंडर्ड्स को तैयार करते हैं और उन्हें फॉलो भी करवाते हैं.

अध्यक्ष आयोग की बैठकों की अध्यक्षता करता है. पॉलिसी के तहत लिए फैसलों को सही दिशा देता है और ये सुनिश्चित करता है कि यूनिवर्सिटी यूजीसी के नियमों का पालन करें. प्रशासनिक स्तर पर यूजीसी का सेक्रेटरी अध्यक्ष को असिस्ट करता है. और, रोजमर्रा के कामकाज, फाइलों और पॉलिसी के एग्जिक्यूशन को संभालता है.

एक्सपर्ट्स की भूमिका

यूजीसी में किसी भी फैसले की शुरुआत किसी जरूरत या प्रॉब्लम की पहचान से होती है. ये जरूरत शिक्षा की क्वालिटी सुधारने, नई शिक्षा नीति लागू करने या किसी गंभीर मुद्दे जैसे भेदभाव, एग्जामिनेशन सिस्टम या एकेडमिक स्टेंडर्ड्स से जुड़ी हो सकती है. इसके बाद यूजीसी विषय विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और प्रोफेशनल संस्थानों के प्रतिनिधियों को शामिल कर समितियां बनाता है. ये समितियां हर पहलू का अध्ययन कर अपनी सिफारिशें तैयार करती हैं. बड़े और असर डालने वाले फैसलों को लेने से पहले उससे प्रभावित होने वाले स्टूडेंट्स, टीचर्स और पेरेंट्स से सुझाव भी मांगे जाते हैं. उन्हें अगर कोई आपत्ति या सवाल होते हैं तो उन्हें भी दूर किया जाता है. 

फैसले लेने का प्रोसेस

इसके बाद सारे सुझाव और सिफारिशें यूजीसी की मीटिंग में रखे जाते हैं. ये आयोग यूजीसी की वो हाईएस्ट अथॉरिटी होता है जो सारे फैसले लेता है. यहां प्रस्तावों पर डिटेल में चर्चा होती है और आमतौर पर सहमति से फैसले लिए जाते हैं. समय की जरूरत को देखते हुए कई फैसले ई सर्कुलेशन या वर्चुअल मीडियम के थ्रू भी लिए जाते हैं.

नियम बनना, अधिसूचना और अमल

जब कोई फैसला अंतिम रूप ले लेता है. तो यूजीसी उसे नियम या विनियम के रूप में तैयार करता है. इसके बाद इसे भारत के गेजेट में अधिसूचित किया जाता है. राजपत्र में पब्लिश होने के बाद ये नियम सभी यूनिवर्सिटी और उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए मानना जरूरी हो जाते हैं. एग्जिक्यूशन की निगरानी के लिए यूजीसी और नेशनल लेवल की समितियां काम करती हैं. नियमों को न मानने पर अनुदान रोकने या मान्यता रद्द करने जैसी सख्त कार्रवाई भी की जा सकती है.

सरकार की भूमिका क्या होती है

यूजीसी भले ही एक स्वतंत्र संस्था हो, लेकिन केंद्र सरकार की इसमें अहम भूमिका रहती है. सरकार ही यूजीसी के चेयरपर्सन और मेंबर्स की नियुक्ति करती है और बजट को मंजूरी देती है. शिक्षा मंत्रालय के जरिए सरकार ये तय करती है कि हायर एजुकेशन किस दिशा में आगे बढ़े. हालांकि, पढ़ाई, परीक्षा और नियमों से जुड़े रोजमर्रा के फैसले यूजीसी खुद लेता है. इससे सिस्टम का बैलेंस बना रहता है.

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