NEET का जानलेवा स्ट्रेस: MBBS की एक सीट के लिए काट दिया पंजा, जानिए पूरा मामला

जौनपुर में नीट की तैयारी कर रहे एक छात्र ने एमबीबीएस सीट पाने के लिए ग्राइंडर से अपना पंजा काट लिया. जानिए कैसे आरक्षण की चाहत ने उसे इस खौफनाक कदम तक पहुंचाया.

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यह घटना केवल एक खबर नहीं है, बल्कि उस मानसिक दबाव की कहानी है जिससे आज के छात्र गुजर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के जौनपुर से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने सबको झकझोर कर रख दिया है. दरअसल, नीट (NEET) की तैयारी कर रहे एक छात्र ने आरक्षण का लाभ उठाने के लिए खुद ही अपना पैर काट डाला. यह घटना जौनपुर के लाइन बाजार इलाके की है. जहां मेडिकल की तैयारी कर रहे छात्र सूरज भास्कर का गोल था साल 2026 में किसी भी हाल में MBBS में दाखिला लेना. इसके लिए सूरज ने एक ऐसी खौफनाक साजिश रची कि पुलिस भी चकरा गई. आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला...

क्या है पूरा मामला?

गुरुवार रात सूरज ने पुलिस को बताया कि कुछ अज्ञात लोगों ने उसके साथ मारपीट की और जब उसकी आंख खुली तो उसके बाएं पैर का पंजा गायब था. पुलिस ने तुरंत मामले की गंभीरता को देखते हुए दो अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली और जांच शुरू कर दी.

पुलिस को सूरज की बातों पर तब शक हुआ जब वह बार-बार अपने बयान बदलने लगा. मामला संदिग्ध लगने पर पुलिस ने  सूरज की कॉल डिटेल्स निकलवाईं. जांच में पता चला कि सूरज की एक प्रेमिका है जिससे वह शादी करना चाहता है. जब पुलिस ने प्रेमिका से पूछताछ की, तो यह चौकाने वाला खुलासा हुआ.

प्रेमिका ने बताया कि सूरज हर हाल में 2026 में डॉक्टर बनना चाहता था. इसी चक्कर में वह अक्टूबर में वाराणसी के BHU अस्पताल भी गया था ताकि अपना 'दिव्यांग सर्टिफिकेट' (PH कोटा) बनवा सके. लेकिन शरीर से पूरी तरह स्वस्थ होने के कारण सर्टिफिकेट नहीं बन पाया.

खुद ही बन गया अपना 'जल्लाद'

आरक्षण पाने की सनक सूरज पर इस कदर सवार हुई कि उसने खुद को दिव्यांग बनाने का फैसला कर लिया. सीओ सिटी गोल्डी गुप्ता के मुताबिक, सूरज ने पहले दर्द कम करने के लिए खुद को इंजेक्शन लगाया और फिर ग्राइंडर मशीन से अपने ही पैर का पंजा काट दिया. उसने सोचा था कि पैर कटने के बाद उसे आसानी से सर्टिफिकेट मिल जाएगा और कोटे के जरिए मेडिकल कॉलेज में एडमिशन पक्का हो जाएगा.

युवाओं पर बढ़ता दबाव

यह घटना केवल एक खबर नहीं है, बल्कि उस मेंटल प्रेशर की कहानी है, जिससे आज के छात्र गुजर रहे हैं. एक सीट की होड़ में छात्र किस हद तक जा सकते हैं, यह मामला उसका जीता-जागता उदाहरण है.

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