कभी पैसे को तरसा, अब USA में PhD के लिए मिले 2.6 करोड़, बिहार के नीरज की सफलता की कहानी

बिहार के सारण जिले में पान विक्रेता के बेटे नीरज कुमार सिंह ने अमेरिका में 2.6 करोड़ रुपये की पूर्ण वित्तपोषित पीएचडी छात्रवृत्ति हासिल की है. नेहरू युवा केंद्र से शुरू हुए सफर से लेकर 'यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स' तक, जानिए उनकी संघर्ष और सफलता की पूरी कहानी.

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नीरज कुमार सिंह की सफलता की कहानी: बिहार के पान बेचने वाले के बेटे को USA में स्कॉलरशिप मिली
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  • बिहार के नीरज कुमार सिंह ने अमेरिका में पूरी वित्तपोषित पीएचडी छात्रवृत्ति प्राप्त की है
  • नीरज वर्तमान में यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स लोवेल में एजुकेशनल लीडरशिप विषय में पीएचडी कर रहे हैं
  • युवा विकास और स्वास्थ्य से जुड़े राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया है

कुछ वर्ष पूर्व तक नीरज कुमार सिंह के लिए पढ़ाई जारी रखना एक बड़ी चुनौती थी. उनके घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. पिता प्रमोद सिंह पान की दुकान चलाते थे, जबकि मां गीता देवी अक्सर बीमार रहती थीं. मां के इलाज की चिंता के साथ-साथ परिवार की जिम्मेदारियां भी थीं. तीन भाइयों वाले इस परिवार में कई बार पढ़ाई की फीस जुटाना बेहद कठिन हो जाता था.

नीरज ने NDTV को अमेरिका से कॉल पर बताया कि दसवीं के बाद उनकी पढ़ाई में आसपास के लोगों और शुभचिंतकों ने मदद की, जिसके बल पर वे अपनी पढ़ाई जारी रख सके. मां की दवाइयों और परिवार की जरूरतों के लिए पान की दुकान से होने वाली पिता की आय कम पड़ जाती थी. हालांकि, आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं.  

नीरज बिहार के सारण जिले के पानापुर प्रखंड स्थित सतजोरा गांव के पकड़ी नरोट्टम टोला के निवासी हैं.

नीरज वर्तमान में अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स लोवेल में एजुकेशनल लीडरशिप विषय में पीएचडी कर रहे हैं. उन्हें पूरी तरह से वित्तपोषित छात्रवृत्ति मिली है, जिसकी पूरी अवधि की अनुमानित राशि लगभग 2.6 करोड़ रुपये है. वर्ष 2026-27 के इस पीएचडी शोधार्थी वर्ग में 60 शोधकर्ता शामिल हैं और नीरज के अनुसार, भारत से चयनित होने वाले वे एकमात्र शोधार्थी हैं.

वर्ष 2017 बना करियर का टर्निंग पॉइंट

नीरज बिहार के सारण जिले के पानापुर प्रखंड स्थित सतजोरा गांव के पकड़ी नरोट्टम टोला के निवासी हैं. वर्ष 2008 में दसवीं, 2010 में जगदम कॉलेज से इंटरमीडिएट और 2013 में जय प्रकाश विश्वविद्यालय से बीएससी की पढ़ाई पूरी की. वर्ष 2017 में उनका जुड़ाव नेहरू युवा केंद्र संगठन, सारण से हुआ. ग्रामीण युवाओं और समुदाय के बीच कार्य करते हुए उन्हें सामाजिक विकास तथा युवा नेतृत्व को निकटता से समझने का अवसर मिला. 

नेहरू युवा केंद्र से जुड़े कार्यों के दौरान उन्हें चेन्नई जाने का अवसर प्राप्त हुआ. वहां राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान से वर्ष 2019 में उन्होंने मास्टर ऑफ सोशल वर्क की उपाधि प्राप्त की. चेन्नई में समाज कार्य की पढ़ाई ने उनके जीवन को नई दिशा दी, जिसके बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके कार्य का अनुभव बढ़ता गया. नीरज बताते हैं कि यही वह समय था, जब सामाजिक कार्य केवल अनुभव तक सीमित न रहकर उनके लिए करियर और शोध का मुख्य विषय बनने लगा. 

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पीएचडी के साथ-साथ नीरज को विश्वविद्यालय में टीचिंग असिस्टेंट भी नियुक्त किया गया है.

सामाजिक कार्य से शोध तक की यात्रा

नीरज ने शिक्षा, युवा विकास, स्वास्थ्य, आजीविका और सामुदायिक विकास से जुड़ी कई परियोजनाओं पर कार्य किया. कोविड-19 महामारी के दौरान उन्होंने झारखंड और ओडिशा में यूएसएआईडी से संबद्ध परियोजना के तहत टीकाकरण कार्यक्रमों में योगदान दिया. वहीं, तेलंगाना में महामारी के समय ऑक्सीजन आपूर्ति और टीकाकरण से जुड़े कार्यों में भी सहयोग दिया.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान धनबाद के साथ शोध और भारतीय विदेश व्यापार संस्थान के साथ वस्त्र क्षेत्र से जुड़े अध्ययनों का अनुभव मिला. इस अवधि में उन्हें बांग्लादेश, श्रीलंका, थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया, म्यांमार, कंबोडिया और लाओस जैसे देशों में युवा विकास तथा सामुदायिक कार्यक्रमों से जुड़ने का अवसर भी मिला.

वर्ष 2023 में उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई से डिप्लोमा इन यूथ लीडरशिप एंड सोशल चेंज किया. इसके साथ ही विभिन्न विश्वविद्यालयों में 2,500 से अधिक विद्यार्थियों के प्रशिक्षण और मार्गदर्शन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही.

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अमेरिका की ओर बढ़ा कदम

शैक्षणिक और सामाजिक क्षेत्र के इसी गहन अनुभव ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय शिक्षा की दिशा में आगे बढ़ाया. उन्हें अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया में भी अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ. अब यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स लोवेल में उनका शोध शिक्षा में नेतृत्व से जुड़े विषयों पर केंद्रित है. विशेष रूप से बहुभाषी शिक्षा, शिक्षा में समानता और समावेशी शिक्षा उनकी अकादमिक रुचि के प्रमुख क्षेत्र हैं. उनका शोध इस प्रश्न से जुड़ा है कि भाषा, सामाजिक पृष्ठभूमि या आर्थिक परिस्थितियों के कारण किसी भी विद्यार्थी के शिक्षा के अवसर सीमित न हों. 

बिहार के सारण जिले में पान विक्रेता के बेटे नीरज कुमार सिंह ने अमेरिका में 2.6 करोड़ रुपये की पूर्ण वित्तपोषित पीएचडी छात्रवृत्ति हासिल की है. 

अध्ययन के साथ शिक्षण सहायक की जिम्मेदारी

पीएचडी के साथ-साथ नीरज को विश्वविद्यालय में टीचिंग असिस्टेंट भी नियुक्त किया गया है. वे विद्यार्थियों की शैक्षणिक गतिविधियों में सहयोग प्रदान करेंगे. इसके लिए शिक्षा संकाय ने उन्हें शोध हेतु कार्यस्थान भी उपलब्ध कराया है. विश्वविद्यालय द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता में ट्यूशन फीस, स्वास्थ्य बीमा और नियमित मासिक स्टाइपेंड शामिल है. लगभग 2.6 करोड़ रुपये का यह आंकड़ा पीएचडी की पूरी अवधि के दौरान मिलने वाली कुल वित्तीय सहायता का है. 

शैक्षणिक क्षेत्र में मुकाम हासिल करना ही लक्ष्य

नीरज भविष्य में शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में ही कार्य करना चाहते हैं. उनका अंतिम लक्ष्य प्राध्यापक बनना है. जिस शिक्षा की फीस जुटाना कभी उनके परिवार के लिए गंभीर चिंता का विषय था, आज उसी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें अमेरिका से करोड़ों रुपये की छात्रवृत्ति मिली है. अब प्राध्यापक बनकर शैक्षणिक जगत में अपनी पहचान बनाना ही उनका मुख्य लक्ष्य है. 

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