क्या आपने देखी NCERT की नई तैयारी? कक्षा 9 की सोशल साइंस में अब सिर्फ इतिहास नहीं, 'हिंदुस्तानी हुनर' की होगी पढ़ाई

NCERT मार्च में कक्षा 9 की सोशल साइंस की नई किताबें जारी करेगा. इसमें 'इंडियन नॉलेज सिस्टम' और भारत के ऐतिहासिक योगदानों पर विशेष जोर दिया गया है.

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नए सिलेबस के ड्राफ्ट के मुताबिक, छात्र अब कई ऐसी चीजें पढ़ेंगे जो पहले किताबों से गायब थीं-

NCERT New Book Launch 2026 : NCERT यानी राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद इसी मार्च में सोशल साइंस की नई किताबें रिलीज करने जा रहा है. इन किताबों की सबसे खास बात यह है कि अब छात्र सिर्फ विदेशी इतिहास या डेट्स नहीं रटेंगे, बल्कि इसमें भारत के अपने ज्ञान, संस्कृति और उपलब्धियों पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाएगा. नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत तैयार इन किताबों में 'इंडियन नॉलेज सिस्टम' (IKS) को शामिल किया गया है. इसका मतलब है कि अब छात्र पढ़ेंगे कि गणित, विज्ञान, आयुर्वेद, योग और खेती-बाड़ी जैसे क्षेत्रों में भारत का कितना बड़ा योगदान रहा है.

किताबों को इस तरह बनाया गया है कि बच्चे उसे अपनी असल जिंदगी से जोड़ सकें. बोर्ड का मकसद अब बच्चों से सवाल पूछवाना है, न कि उन्हें जवाब रटवाना.

नए सोशल साइंस बुक में क्या-क्या नया पढ़ेंगे स्टूडेंट्स

विज्ञान और तकनीक

भारत ने प्राचीन समय में आर्किटेक्चर और टेक्नोलॉजी में क्या कमाल किए.

संगीत और कला

भारतीय शास्त्रीय संगीत की '22 श्रुतियों' और साहित्य का इतिहास.

आयुर्वेद और योग

जड़ी-बूटियों का पारंपरिक इस्तेमाल और योग का महत्व.

लोकतंत्र का इतिहास

किताबों में बताया जाएगा कि लोकतंत्र भारत के लिए नया नहीं है, बल्कि प्राचीन भारत के कई हिस्सों में लोकतांत्रिक परंपराएं पहले से मौजूद थीं.

भेदभाव और इंसाफ पर भी होगी बात

नई किताबों में केवल जीत का गुणगान नहीं है, बल्कि समाज की चुनौतियों पर भी खुलकर बात की गई है. इसमें गुलामी के दौर और समाज में मौजूद असमानता, अन्याय और भेदभाव जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है. मकसद यह है कि छात्र समझ सकें कि कैसे हमारे देश ने एकजुट होकर इन बुराइयों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और समावेशी समाज की ओर कदम बढ़ाए.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

शिक्षाविदों का मानना है कि पिछले साल तक सिलेबस ज्यादातर घटनाओं और तारीखों पर आधारित था, जो बच्चों के लिए उबाऊ हो जाता था. मॉडर्न पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल डॉ. अलका कपूर का कहना है कि यह नया बदलाव बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ेगा. वहीं, दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मिथुराज धुसिया का कहना है कि सिलेबस में समाज के हर वर्ग, जाति और धर्म के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना एक अच्छा कदम है.

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