करोड़ों की नौकरी छोड़ सन्यासी बने IIT टॉपर, श्रीश जाधव की कहानी सुन हैरान रह जाएंगे आप

सन्यासी बनने के बाद भी श्रीश जाधव ने पढ़ाई और रिसर्च को नहीं छोड़ा. उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाया. बाद में वो रामकृष्ण मिशन विवेकानंद यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और रिसर्च से जुड़े काम करने लगे.

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श्रीश जाधव बचपन ने साल 1985 में आईआईटी-जेईई में ऑल इंडिया रैंक 2 हासिल की थी.

आज के दौर में हर कोई चाहता है कि उसे अच्छी नौकरी मिले, मोटी सैलरी हो और जिंदगी सेट हो जाए. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इस सोच से बिल्कुल अलग चलते हैं. श्रीश जाधव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. आईआईटी में टॉप करने वाला ये होनहार छात्र आराम से विदेश में बड़ा करियर बना सकता था, लेकिन उन्होंने सब कुछ छोड़कर सन्यासी बनने का रास्ता चुन लिया. उनका ये फैसला चौंकाने वाला जरूर था, लेकिन इसके पीछे एक गहरी सोच थी, जो आज भी लोगों को इंस्पायर करती है.

कौन हैं श्रीश जाधव

श्रीश जाधव बचपन से ही पढ़ाई में बहुत तेज थे. साल 1985 में उन्होंने आईआईटी-जेईई में ऑल इंडिया रैंक 2 हासिल की और आईआईटी कानपुर में एडमिशन लिया. वहां भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया. बाद में उन्होंने कंप्यूटर साइंस में GATE एग्जाम टॉप किया और 99.92 पर्सेंटाइल हासिल किया.

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क्यों छोड़ा बड़ा करियर

इतनी बड़ी सफलता के बाद उनके पास विदेश में नौकरी और रिसर्च के कई शानदार मौके थे. लेकिन उन्होंने ये रास्ता नहीं चुना. उन्होंने रामकृष्ण मिशन से जुड़कर सन्यासी बनने का फैसला लिया. उनका मानना था कि जिंदगी सिर्फ पैसे कमाने के लिए नहीं होती, बल्कि दूसरों के लिए कुछ करने में ही असली खुशी मिलती है.

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कैसे कर रहे हैं समाज सेवा

सन्यासी बनने के बाद भी उन्होंने पढ़ाई और रिसर्च को नहीं छोड़ा. उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाया. बाद में वो रामकृष्ण मिशन विवेकानंद यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और रिसर्च से जुड़े काम करने लगे. उनका काम कंप्यूटर साइंस और मैथ्स के खास विषयों पर रहा.

आज क्यों खास है उनकी कहानी

श्रीश जाधव की कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है. जहां लोग पैसे और नाम के पीछे भागते हैं, वहीं उन्होंने सादगी और सेवा को चुना. उन्होंने दिखाया कि जिंदगी में सच्ची खुशी दूसरों की मदद करने में है.

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