Exclusive : 'सर ने वादा किया और हमने कर दिखाया' अलीगढ़ के नन्हे वैज्ञानिकों ने कूड़े से बना दिया लड़ाकू विमान

Government School Innovation : अलीगढ़ के सरकारी स्कूल के बच्चों ने कबाड़ से बनाया उड़ने वाला फाइटर जेट. पढ़ें रंजना, आशी और कार्तिक की जुबानी, कैसे तैयार हुआ यह कमाल का प्रोजेक्ट.

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इन नन्हे वैज्ञानिकों की सफलता की गूंज अब शासन तक पहुंच गई है.

Aligarh Robotic Pathshala : अलीगढ़ में सरकारी स्कूल के बच्चों ने ऐसा कमाल कर दिखाया है जिसने सभी को हैरान कर दिया है. ग्रामीण क्षेत्र के छात्र-छात्राओं ने मिलकर फाइटर जेट का मॉडल तैयार किया है. खास बात यह है कि यह मॉडल असली फाइटर जेट की तर्ज पर बनाया गया है और यह उड़ान भी भरता है.  आपको बता दें कि यह जेट अलीगढ़ के विकासखंड अकराबाद के मॉडल कंपोजिट स्कूल भिलावली के 4 से 8 तक के पांच छात्र-छात्राओं (प्रांशी कुमारी, आशी, हृदेश कुमार, रंजना कुमारी और कार्तिक शर्मा ) ने मिलकर बनाया है.  बच्चों ने रोबोटिक्स की पाठशाला में शिक्षक आशीष कुमार के नेतृत्व में इस प्रोजेक्ट को तैयार किया है. जिसकी हर तरफ सराहना हो रही है. इस प्रोजेक्ट के बारे में एनडीटीवी ने इस प्रोजेक्ट में शामिल छात्र-छात्रों और प्रोजेक्ट को लीड कर रहे टीचर आशीष कुमार से बात की. आइए जानते हैं इस फाइटर जेट प्रोजेक्ट की रूपरेखा कैसे तैयार हुई.

टीचर ने वादा किया हमने कर दिखाया

क्लास 7 की छात्रा रंजना ने इस प्रोजेक्ट की शुरूआत की कहानी बताते हुए कहा कि नवंबर महीने में स्कूल में 10 दिन की रोबोटिक पाठशाला आयोजित की गई थी, जिसमें उन्होंने कई प्रोजेक्ट तैयार किए. सबसे पहले उन्होंने रोबोट-1 बनाया, उसके बाद 'डस्टबिन स्मार्ट होम मॉडल' और फिर 'आरसी फाइटर जेट प्लेन' तैयार किया.

रंजना ने बताया कि उनके शिक्षक ने वादा किया था कि जब वे प्रोजेक्ट पूरा कर लेंगे तो एक असली उड़ने वाला फाइटर जेट या एयरप्लेन मॉडल बनाएंगे. इसी प्रेरणा से उन्होंने यह मॉडल तैयार किया.

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रंजना का कहना है कि उन्हें फाइटर जेट इसलिए पसंद है क्योंकि इसकी स्पीड बहुत तेज होती है. उन्होंने बताया कि दुनिया में चल रहे युद्धों में भी इसी तरह की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है, इसलिए उन्हें इस तरह की चीजें बनाना अच्छा लगता है.

सिर्फ 2 दिन में तैयार हुआ फाइटर जैट

वहीं, इस प्रोजेक्ट में शामिल आशी ने बताया कि यह प्लेन बनाने में करीब दो दिन का समय लगा. इसमें मोटर, पंखा और लिथियम बैटरी का इस्तेमाल किया गया है, जिसकी मदद से यह उड़ सकता है. आशी ने आगे बताया कि अगर उन्हें आगे और मौका मिला तो वे ऐसे और भी प्लेन बनाना चाहेंगी, ताकि देश के लिए नई तकनीक विकसित की जा सके और भारत को आगे बढ़ाया जा सके. उनका कहना है कि यह मॉडल करीब आधे घंटे तक उड़ सकता है.

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कबाड़ से कमाल : थर्माकोल और बोतल का जादू

इसके अलावा छात्रा कार्ति ने बताया कि यह फाइटर जेट मॉडल पूरी तरह वेस्ट मटेरियल से तैयार किया गया है. इसे बनाने में थर्माकोल, प्लास्टिक की बोतल और अन्य बेकार सामग्री का इस्तेमाल किया गया है. इसकी लागत भी बहुत कम आई है और इसे बनाकर उन्हें काफी अच्छा लगा. यह मॉडल देखने में भी काफी अट्रैक्टिव है.

भारत के बच्चे चीन-जापान से कम नहीं

वहीं, रोबोटिक्स पाठशाला का नेतृत्व कर रहे शिक्षक आशीष कुमार ने बताया कि हमारे देश के बच्चे बेहद प्रतिभाशाली हैं. अक्सर लोग भारत की शिक्षा व्यवस्था की तुलना चीन और जापान से करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि भारत का एजुकेशन सिस्टम भी काफी बेहतर है, बस बच्चों को सही दिशा देने की जरूरत होती है. उन्होंने कहा कि बच्चों ने यह साबित कर दिया है कि आरसी प्लेन या फाइटर जेट बनाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. इसे बनाया भी जा सकता है, उड़ाया भी जा सकता है और अगर क्रैश हो जाए तो इंजीनियरिंग की मदद से इसे फिर से ठीक भी किया जा सकता है. 

आशीष कुमार ने बताया कि इस प्रोजेक्ट की शुरुआत नवंबर में रोबोटिक पाठशाला के दौरान हुई थी. पांच बच्चों की टीम ने मिलकर इस मॉडल को तैयार किया. उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट की प्रेरणा उन्हें ईरान के शाहिद ड्रोन से मिली थी. उन्होंने कहा कि इसमें इस्तेमाल होने वाला अधिकतर सामान घर में मिलने वाले वेस्ट मटेरियल जैसे थर्माकोल, टेप और बोतलों से लिया गया है. वहीं इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स जैसे मोटर, बैटरी, प्रोपेलर और रिमोट कंट्रोल लोकल मार्केट से खरीदे गए हैं. उन्होंने बताया कि वेस्ट मटेरियल से मॉडल बनाना बहुत सस्ता पड़ता है, लेकिन रिमोट कंट्रोल सिस्टम की कीमत लगभग एक हजार से तीन हजार रुपये तक हो सकती है.

सोशल मीडिया पर छाई बच्चों की उपलब्धि

इन नन्हे वैज्ञानिकों की सफलता की गूंज अब शासन तक पहुंच गई है. उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री संदीप सिंह ने बच्चों का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए उनकी जमकर तारीफ की है. लोग इस बात से हैरान हैं कि कैसे ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे बिना किसी बड़ी लैब के इतना सटीक मॉडल बना रहे हैं.

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