10वीं बोर्ड परीक्षा साल में दो बार: क्या छात्र हो रहे हैं लापरवाह? जानिए Experts की राय

2026 से 10वीं बोर्ड परीक्षा साल में दो बार होने जा रही है. शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जहां इससे तनाव कम होगा, वहीं छात्रों में लापरवाही भी बढ़ सकती है. एक्सपर्ट्स ने चेताया है कि 'दूसरा मौका' होने की वजह से बच्चे पहली परीक्षा की तैयारी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं.

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क्या साल में दो बार बोर्ड एग्जाम होने से छात्र पढ़ाई को लेकर लापरवाह हो रहे हैं? जानिए डॉ. निनी शर्मा, प्रणीत मुंगली और कपिल कुमार बंसल जैसे एक्सपर्ट्स की राय.

Board Exam 2026 : साल 2026 से 10वीं के छात्रों के लिए बोर्ड परीक्षाएं अब साल में दो बार होंगी. सरकार और शिक्षा विभाग का मानना है कि इससे बच्चों का तनाव कम होगा, लेकिन क्या वाकई ऐसा हो रहा है? इस पर शिक्षा जगत के दिग्गजों (Experts) की क्या राय है आइए जानते हैं आगे आर्टिकल में...

क्या 'दूसरा मौका' बना रहा है बच्चों को आलसी?

इंदिरापुरम पब्लिक स्कूल की एजुकेटर और ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट डॉ. निनी शर्मा का कहना है कि दो बार परीक्षा का आइडिया शानदार है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है जो चिंताजनक है. एक शिक्षक और ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के रूप में मेरा अनुभव बताता है कि कुछ छात्र इसे ‘दूसरा मौका' समझकर पहली परीक्षा की तैयारी को उतनी गंभीरता से नहीं लेते. इससे निरंतर अभ्यास, अनुशासन और सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. परीक्षा केवल नंबर बनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह टाइम मैनेजमेंट, पेशेंस और सेल्फ डिसिप्लीन डेवलप करने का महत्वपूर्ण अवसर भी है. इसलिए अवसरों के साथ जिम्मेदारी और निरंतर मेहनत की भावना भी समान रूप से जरूरी है.

दूसरा मौका एक 'बैकअप' है, लापरवाही की छूट नहीं

वहीं, पुणे के संस्कृति ग्रुप ऑफ स्कूल्स के ट्रस्टी प्रणीत मुंगली भी इसी बात से इत्तेफाक रखते हैं. उनका कहना है कि साल में दो बार बोर्ड परीक्षा का फैसला बच्चों को तनाव-मुक्त मौका देने की एक अच्छी पहल है. लेकिन इसका असली असर इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे इसे किस नजरिए से देखते हैं.

अगर छात्र इसे पढ़ाई टालने का बहाना मान लें, तो उनके फोकस और मेहनत पर बुरा असर पड़ सकता है. शिक्षा सिर्फ एग्जाम पास करना नहीं, बल्कि अनुशासन सीखना है. ऐसे में स्कूलों और पैरेंट्स की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. बच्चों को समझाना होगा कि यह दूसरा मौका एक 'बैकअप' है, लापरवाही की छूट नहीं. दूसरा अवसर सुरक्षा जरूर दे सकता है, लेकिन पहली कोशिश की ईमानदारी ही आपका चरित्र बनाती है.

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नियम जो आपको जानना जरूरी है

एमिटी इंटरनेशनल स्कूल (वसुंधरा) के गणित शिक्षक कपिल कुमार बंसल ने इस नई व्यवस्था की कुछ बारीकियों और चुनौतियों पर रोशनी डाली है:

सोच में बदलाव

दूसरा मौका होने के कारण, कुछ छात्र पढ़ाई को हल्के में ले रहे हैं, जिससे उनकी निरंतर मेहनत कम हो सकती है.

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मानसिक दबाव

दो बार परीक्षा होने से छात्रों पर दोनों परीक्षाओं में बेहतर करने का दबाव भी बढ़ सकता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है.

नियम

 यह व्यवस्था मुख्य रूप से 10वीं के लिए है, 12वीं के लिए नहीं (सिर्फ एक विषय में सुधार के अलावा).

कठोर नियम

यदि कोई छात्र पहली परीक्षा में 3 या अधिक विषयों में फेल होता है, तो वह दूसरी परीक्षा नहीं दे पाएगा. यह प्रणाली उन छात्रों के लिए बेहतर है जो किसी कारणवश पहली बार में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते, लेकिन इसे 'फेल होने की छूट' के रूप में देखना पढ़ाई के प्रति गंभीरता को कम कर सकता है.

पेरेंट्स और स्कूल की जिम्मेदारी

एक्सपर्ट्स की राय साफ है, यह दूसरा मौका एक 'सुरक्षा कवच' की तरह है, न कि पढ़ाई से बचने का बहाना. स्कूलों और माता-पिता को बच्चों को यह समझाना होगा कि पहली कोशिश की ईमानदारी ही उनके करियर की नींव रखेगी. अगर छात्र इसे पढ़ाई टालने का जरिया बनाएंगे, तो भविष्य में इसके परिणाम काफी भारी पड़ सकते हैं.
 

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