विनोद खन्ना ने अपने स्टारडम के चरम परएक ऐसा फैसला लिया, जिसने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को चौंका दिया. उन्होंने अपने शानदार करियर, अपने परिवार और बॉलीवुड की चकाचौंध को छोड़कर आध्यात्मिक गुरु ओशो को फॉलो किया और संन्यासी बन गए. राजेश खन्ना के जीवन का यह अध्याय सभी जानते हैं, लेकिन जिस बात पर कम चर्चा होती है, वह है फिल्म निर्माता महेश भट्ट की भूमिका. महेश ने ही उन्हें ओशो से मिलवाया था. जिसके बाद विनोद के जीवन में अहम मोड़ आया.
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अरबाज खान के चैट शो में एक पुराने इंटरव्यू में महेश भट्ट ने अपने करियर के एक मुश्किल दौर में अपनी आध्यात्मिक खोज के बारे में बात की. महेश भट्ट ने कहा, "मैं एक आम आदमी था. मैंने विश्वासघात और मंजिलें जैसी कई फिल्में बनाईं, जो फ्लॉप हो गईं. इसलिए, मैं आध्यात्म के शरण में चला गया. मैं ओशो रजनीश के पास गया, जो पुणे के एक करिश्माई गुरु थे. मैं उनके पास गया और खुद को उन्हें समर्पित कर दिया... भगवा कपड़े और दिन में पांच बार ध्यान किया."
महेश भट्ट ने माना कि वही थे जो विनोद खन्ना को ओशो से मिलवाने ले गए थे. उन्होंने कहा, "मैं विनोद खन्ना को ओशो रजनीश के पास ले गया. हालांकि मेरा कनेक्शन खत्म हो गया, लेकिन उनका जारी रहा. उन्होंने कहा, "मैंने माला तोड़ दी और उसे कमोड में फेंक दिया. मैंने सोचा कि मुझे अभी भी जलन होती है, मुझे पाखंडी जैसा महसूस होता है. मैं दुनिया और खुद से झूठ नहीं बोल सकता." महेश भट्ट के अनुसार, ओशो ने उनके जाने को हल्के में नहीं लिया. उन्होंने याद किया कि उन्हें विनोद खन्ना के जरिए गुरु से एक संदेश मिला था.
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उन्होंने कहा, "विनोद ने मुझे फिल्मिस्तान से फोन किया और कहा कि भगवान बहुत गुस्से में हैं. तुमने माला तोड़ दी और उसे कमोड में फेंक दिया. मैंने कहा 'हां, मैंने ऐसा किया है. यह बेकार है, मैं एक बहुत बड़ा मूर्ख हूं.' उन्होंने कहा कि भगवान ने कहा है कि महेश से कहो कि वापस आए और माला खुद सौंप दे. विनोद ने अपनी आवाज धीमी कर ली, और कहा, अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो वह तुम्हें बर्बाद कर देंगे'."
और किसी भी औरत को चूहे में दिलचस्पी नहीं होती, बिल्कुल भी नहीं. एक बार जब वह आदमी को चूहा बना देती है, तो वह खत्म हो जाती है, और जैसा कि मैं देख सकता हूं, वही हुआ है."
आगे महेश ने कहा, "जब मैं मुड़ा, तो वह वहीं रहा - और फिर ओरेगन चला गया. मैं उसे वापस लाने की कोशिश करने के लिए एक बार अमेरिका भी गया था. लेकिन वह बहुत दूर जा चुका था. जब रजनीश का सपना टूटा, तो वह टूटा हुआ लौटा. मैं उससे जसलोक अस्पताल के सामने एक छोटे से फ्लैट में फिर से मिला."
उन्होंने आगे कहा, "हमने उस शाम इतनी शराब पी कि हम नशे में चूर हो गए. लेकिन उसने बहुत कम बात की। पुरानी आग चली गई थी. उसने फिल्म जगत में फिर से अपनी जगह बनाने की कोशिश की, लेकिन जिन ऊंचाइयों पर वह कभी पहुंचा था, वे पहुंच से बाहर रहीं. वह राजनीति में चला गया. मैं अपनी कहानियों के साथ रहा."
वापसी के बाद विनोद खन्ना ने इन फिल्मों में किया काम
वह इंसाफ और सत्यमेव जयते (1987) जैसी कमर्शियली सफल फिल्मों में नजर आए. बाद में वह चांदनी, दयावान और, सालों बाद, दबंग जैसी फिल्मों में कैरेक्टर रोल में नजर आए. इन फिल्मों में आने के बावजूद, वह 1970 के दशक और 1980 के दशक की शुरुआत में मिले सुपरस्टार का दर्जा पूरी तरह से हासिल नहीं कर पाए.