सिनेमाघरों में शुरू होने से पहले इस फिल्म ही होती थी पूजा, चप्पल उतारकर देखते थे दर्शक, ना ये आदिपुरुष ना ही रामायण

1975 में सिनेमा हॉल के बाहर एक अनोखा नजारा देखने को मिलता था. आसपास के गांवों और कस्बों से महिलाएं, जिनमें से कई बुजुर्ग थीं. बसों, टांगों और बैलगाड़ियों में यह फिल्म देखने आती थीं.

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सिनेमाघरों में शुरू होने से पहले इस फिल्म ही होती थी पूजा
नई दिल्ली:

1975 में सिनेमा हॉल के बाहर एक अनोखा नजारा देखने को मिलता था. आसपास के गांवों और कस्बों से महिलाएं, जिनमें से कई बुजुर्ग थीं. बसों, टांगों और बैलगाड़ियों में यह फिल्म देखने आती थीं. हॉल के अंदर, कई महिलाएं अपनी चप्पलें उतार देती थीं. कुछ तो नंगे पांव ही थीं. वे स्क्रीन पर चल रही कहानी को श्रद्धा और आश्चर्य के साथ देखती थीं, जैसे वे किसी सत्संग में शामिल हों. ‘जय संतोषी मां' उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक फिल्म नहीं थी, बल्कि जीवन को प्रभावित करने वाली थी.

यह सब देश के सैकड़ों छोटे शहरों और गांवों में महीनों तक दोहराया गया. पहली बार निर्देशक बने विजय शर्मा की यह फिल्म 30 मई 1975 को रिलीज हुई थी, जब देश में आपातकाल लागू होने में चार हफ्ते बाकी थे. 15 अगस्त को ‘शोले' रिलीज हुई, लेकिन कम बजट वाली ‘जय संतोषी मां' की लोकप्रियता को कोई रोक नहीं सका. दर्शक स्क्रीन पर सिक्के, फूल और चावल चढ़ाते थे.

1975 के ट्रेड गाइड की सालाना रिपोर्ट में ‘जय संतोषी मां' और ‘शोले' को ‘दीवार' से ऊपर ब्लॉकबस्टर का दर्जा दिया गया. कई शहरों में इस फिल्म ने गोल्डन और सिल्वर जुबली मनाई. फिल्म इन्फॉर्मेशन पत्रिका के अनुसार, बंबई के मलाड में महिलाओं के लिए सुबह 9 बजे का अलग शो शुरू किया गया. 

इस फिल्म का असर सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं था. मूक फिल्मों के दौर से 1960 तक, बंबई के सिनेमा बाजार में धार्मिक फिल्में लगातार बनती थीं. पढ़े-लिखे शहरी लोग इनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन आम लोगों में इनका बड़ा प्रशंसक वर्ग था. फिल्म के शुरुआती क्रेडिट हिंदी में लिखे गए थे, न कि अंग्रेजी में, जो उस समय आम था. 1970 के दशक में धार्मिक फिल्मों का निर्माण कम हो गया था. 1973 में ‘संपूर्ण रामायण' को छोड़कर ज्यादातर फिल्में असफल रहीं. सतराम रोहरा द्वारा निर्मित ‘जय संतोषी मां' ने इस कमजोर पड़ते बाजार में नई जान फूंकी. 
 

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