बॉलीवुड गानों के बिना शादियां और फंक्शन अधूरे ही रहते हैं. आज के समय में डीजे और बॉलीवुड पर नए गानों की धूम रहती है, लेकिन आज भी गांव और कस्बों की शादियों में महिलाएं गीत गाती हैं और ऐसे ही कुछ गीत हैं जो सालों बाद भी शादियो में अपनी जगह बनाए हुए है. हिंदी सिनेमा में हर ऑकेजन के लिए गाना मिल जाता है. शादी हो, विदाई हो या संगीत, हल्दी और मेंहदी. लेकिन आज हम बात करेंगे एक ऐसे गाने की जो सात फेरों के समय आज भी महिलाएं गाती हैं. ये प्यारा सा गीता है साल 1982 में आई एक ऐसी ब्लॉकबस्टर फिल्म जिसने 44 साल बाद भी लोगों को अपना दीवाना बना रखा है. सिर्फ फिल्म ही नहीं इसके गाने भी दर्शकों को खूब पसंद आए.
फिल्म 'नदिया के पार' का गाना
साल 1982 में आई फिल्म 'नदिया के पार' का गाना 'जब तक पूरे ना हों फेरे सात', जिसको आज भी शादी में सात फेरों के समय दुल्हन की सहेलियां और मां गाती हैं. इस गीत के बोल रवींद्र जैन ने लिखे थे और इसका संगीत भी रवींद्र जैन ने ही तैयार किया था. इस गीत के बोल शादी, उसका महत्व और इ जिसे हेमलता ने अपनी सुरीली आवाज दी. रवींद्र जैन ने इसके बोल लिखने के साथ संगीत भी तैयार किया. गीत में शादी की रस्म, सात फेरों का महत्व और बेटी के विदा होने का भाव साफ नजर आ रहा है. यही वजह है कि 44 साल बाद भी यह विवाह गीत शादियों में सुनाई देता है.
सात फेरों और सात जन्मों के रिश्ते को बयां करता है गीत
इस गाने के हर बोल को ऐसा लिखा गया है जिसमें नई दुल्हन और उसके पति का आने वाली जिंदगी को बयां करता है. शादी होने की खुशी के साथ, दूर जाने का दुख भी गाने के बोल में साफ झलकता है. 'जब तक पूरे ना हों फेरे सात' सिर्फ शादी में बजने वाला गीत नहीं, बल्कि ये इंडियन शादी की पूरी भावना को अपने बोलों में समेटे हुए है. गीत में दूल्हे को कहा जाता है कि सात फेरे पूरे करने और सात वचन निभाने की बात कही जाती है. वहीं दुल्हन को ध्रुव तारा देखकर अमर सुहाग की कामना करने को कहा जाता है. गाने के बोल, भाषा और देसीपन की वजह से ये आज भी शादियों में बजता है. हेमलता की आवाज और कोरस का इस्तेमाल इसे पारंपरिक विवाह गीत जैसा एहसास देता है.