पढ़ें ‘द राजा साहब’ का रिव्यू, जानें कैसी है प्रभास की फिल्म- क्या है कमियां और खूबियां?

फिल्म की कहानी राजू (प्रभास) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी दादी (जरीना वहाब) के साथ रहता है. दादी भूलने की बीमारी से जूझ रही हैं और उन्हें अपने पति (संजय दत्त) के अचानक गायब होने का गहरा गम है.

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The Raja Saab Review : पढ़ें ‘द राजा साहब’ का रिव्यू
नई दिल्ली:

कलाकार: प्रभास, जरीना वहाब, निधि कुमार, निधि अग्रवाल, मालविका मोहनन, संजय दत्त और बोमन ईरानी

कहानी
फिल्म की कहानी राजू (प्रभास) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी दादी (जरीना वहाब) के साथ रहता है. दादी भूलने की बीमारी से जूझ रही हैं और उन्हें अपने पति (संजय दत्त) के अचानक गायब होने का गहरा गम है. दादी अपने पोते राजू से अपने दादा को ढूंढ लाने की जिद करती हैं. यहीं से राजू की यात्रा शुरू होती है, जो उसे एक रहस्यमयी और भूतिया हवेली तक ले जाती है. इस हवेली में राजू को अपने दादा से जुड़े कई चौंकाने वाले राज पता चलते हैं. धीरे-धीरे यह सामने आता है कि दादा की मौत हो चुकी है और वह अब भूत बन चुके हैं. अब राजू को अपने दोस्तों के साथ मिलकर इस भूत का सामना करना है और हवेली से बाहर निकलने का रास्ता खोजना है. दिमागी खेल में बुनी गई इस कहानी में दादा के क्या राज हैं, राजू इन हालातों से कैसे निपटेगा और क्या वह सुरक्षित बाहर निकल पाएगा, यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी. फिल्म देखनी है या नहीं, इसका फैसला आप यह रिव्यू पढ़ने के बाद कर सकते हैं.

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फिल्म की कमियां
    1.    फिल्म की लिखावट बेहद कमजोर है. कई जगह यह साफ़ नहीं हो पाता कि कोई किरदार कहां से आया और उसका बाकी किरदारों से क्या संबंध है. निधि कुमार का किरदार इसका बड़ा उदाहरण है.
    2.    स्क्रिप्ट में इतने झटके हैं कि एक सीन से दूसरे सीन तक कहानी के धागे जुड़ते ही नहीं. कई बार दर्शक सोचता रह जाता है कि यह सब अचानक कैसे हो गया, जैसे मालविका का किरदार अचानक प्रभास तक पहुंच जाना.
    3.    स्क्रीनप्ले साफ़ तौर पर प्रभास के दक्षिण भारतीय फैंस को ध्यान में रखकर लिखा गया लगता है. हीरोइज्म से भरे सीन लगातार आते रहते हैं, लेकिन न तो उनका कोई असर पड़ता है और न ही वे कुछ नया महसूस कराते हैं.
    4.    फिल्म को हॉरर-कॉमेडी कहा गया है, लेकिन न इसमें डर महसूस होता है और न ही हंसी आती है.
    5.    कई किरदार सिर्फ एक-दो सीन के लिए आते हैं, जिनका न कहानी से कोई लेना-देना है और न ही वे कॉमेडी पैदा करते हैं.
    6.    बैकग्राउंड स्कोर जरूरत से ज्यादा भारी और शोरगुल वाला है.
    7.    निर्देशक मारुति का निर्देशन कमजोर लगता है. ऐसा महसूस होता है कि फिल्म जरूरत से ज्यादा शूट हो गई और फिर उसे काट-छांट कर जोड़ा गया, जिसकी वजह से एडिटिंग बेहद बिखरी हुई लगती है.
    8.    फिल्म में तीन-तीन अभिनेत्रियां हैं, लेकिन किसी का भी किरदार न तो जमता है और न ही कोई खास छाप छोड़ पाता है.

फिल्म की खूबियां
    1.    बड़े सितारों की फिल्म होने के कारण प्रोडक्शन वैल्यू अच्छी है.
    2.    जरीना वहाब फिल्म में प्रभावशाली हैं. उन्हें देखकर लगता है कि हिंदी सिनेमा उन्हें अब तक सही ढंग से इस्तेमाल क्यों नहीं कर पाया. चाहे रानी गंगा मां का रूप हो या एक आम दादी का किरदार, वह हर सीन में जंचती हैं.
    3.    संजय दत्त अपने किरदार में फिट बैठते हैं. उनकी आवाज, देह-भाषा और अभिनय उनकी मौजूदगी दर्ज कराते हैं.
    4.    प्रभास ठीक-ठाक रहे हैं, लेकिन अगर उनकी डबिंग बेहतर होती तो उनका किरदार और निखर सकता था.

नोट:
फिल्म में कई ऐसे मसाले हैं, जिनसे साफ़ लगता है कि इसे एक तयशुदा फॉर्मूले और पैटर्न पर बनाया गया है. दक्षिण के निर्देशकों को अब यह समझना होगा कि दर्शक वही चीजें बार-बार नहीं देखना चाहते, जो कभी फिल्मों की सफलता का कारण बनी थीं. दर्शकों को कहानियों और उनके ट्रीटमेंट में नया और ताजा अनुभव चाहिए.

स्टार 1.5

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