बनारस घराने की वो गायिका, जिनके राजा-महाराजा भी थे मुरीद, गाए प्रेम, विरह, भक्ति और जीवन से जुड़े गाने, पद्मश्री से सम्मानित

मशहूर गायिका सिद्धेश्वरी देवी की आवाज में दर्द, प्यार और भावनाओं की ऐसी गहराई होती थी कि सुनने वाला खुद को उस संगीत से जुड़ा हुआ महसूस करता था. उन्हें 'ठुमरी की रानी' कहा जाता था.

विज्ञापन
Read Time: 4 mins
बनारस घराने की इस गायिका के राजा- महाराजा भी थे मुरीद
Social Media
नई दिल्ली:

मशहूर गायिका सिद्धेश्वरी देवी की आवाज में दर्द, प्यार और भावनाओं की ऐसी गहराई होती थी कि सुनने वाला खुद को उस संगीत से जुड़ा हुआ महसूस करता था. उन्हें 'ठुमरी की रानी' कहा जाता था. उनकी कला का बड़े-बड़े कलाकारों ने सम्मान किया. उनके जीवन से जुड़ा एक चर्चित किस्सा भी है, जब मशहूर गायक केएल सहगल ने खुद मंच पर आकर लोगों से सिद्धेश्वरी देवी को सुनने की अपील की थी.  सिद्धेश्वरी देवी का जन्म 8 अगस्त 1908 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था. उनका परिवार संगीत से जुड़ा था. उनकी दादी मैना देवी प्रसिद्ध गायिका थीं. बचपन में ही माता-पिता का निधन हो जाने के बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी राजेश्वरी देवी ने किया. वह भी संगीत की अच्छी जानकार थीं.

कहा जाता है कि सिद्धेश्वरी देवी का संगीत की दुनिया में आना भी एक खास घटना से जुड़ा था. शुरुआत में उनकी मौसी की बेटी संगीत सीखती थीं और सिद्धेश्वरी घर के छोटे-मोटे काम करती थीं. एक दिन जब उनकी बहन एक कठिन धुन नहीं गा पाईं तो गुरु पंडित सियाजी महाराज नाराज हो गए. उस समय सिद्धेश्वरी ने वही धुन आसानी से गाकर सबको हैरान कर दिया. उनकी प्रतिभा देखकर पंडित सियाजी महाराज ने उन्हें संगीत की शिक्षा देने का फैसला किया.

यह भी पढ़ें-  14 साल साल पहले आई थी ऐसी फिल्म, कोयला माफिया और आपराध पर आधारित मूवी ने जीते 4 फिल्मफेयर अवॉर्ड, चमक गई थी पूरा कास्ट की किस्मत

उन्होंने सबसे पहले प्रसिद्ध सारंगी वादक पंडित सियाजी महाराज से संगीत सीखा. इसके बाद उन्होंने उस्ताद राजब अली खान और उस्ताद इनायत खान जैसे बड़े कलाकारों से भी प्रशिक्षण लिया. हालांकि, वह पंडित बड़े रामदास को अपना मुख्य गुरु मानती थीं. उनकी गायकी में बनारस घराने की मिठास और भावनाओं की गहराई साफ दिखाई देती थी.

Advertisement

सिद्धेश्वरी देवी की पहचान सबसे ज्यादा ठुमरी गायिका के रूप में बनी. ठुमरी में शब्दों के साथ भावनाओं को बहुत महत्व दिया जाता है. प्रेम, विरह, भक्ति और जीवन की छोटी-बड़ी भावनाओं को वह अपनी आवाज के जरिए लोगों तक पहुंचाती थीं. इसके अलावा, वह ख्याल, दादरा, कजरी, चैती, होरी और भजन भी गाती थीं.

उनके करियर से जुड़ा एक बेहद चर्चित किस्सा साल 1930 का है. जब सिद्धेश्वरी देवी लाहौर में प्रस्तुति देने पहुंची थीं, तब वहां लोग मुख्य रूप से मशहूर गायक केएल सहगल को सुनने आए थे. जब मंच से एक युवा गायिका के रूप में सिद्धेश्वरी देवी का नाम घोषित हुआ तो कुछ लोग उन्हें सुनने को लेकर उत्साहित नहीं थे. बताया जाता है कि उस समय केएल सहगल खुद मंच पर आए और उन्होंने दर्शकों से कहा कि वे सिद्धेश्वरी देवी की गायकी जरूर सुनें. इसके बाद लोगों ने शांत होकर उनका कार्यक्रम सुना और उनकी आवाज से प्रभावित हुए. यह किस्सा कई आर्टिकल में मिलता है.

Advertisement

धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि पूरे देश में फैल गई. उन्होंने राजाओं के दरबारों से लेकर बड़े संगीत समारोहों तक अपनी कला का प्रदर्शन किया. वह ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन से भी जुड़ी रहीं. उनकी गायकी सुनने के लिए लोग देर रात तक बैठकर इंतजार करते थे. दक्षिण भारत की महान गायिका एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने भी उनसे भजन गायकी की बारीकियां सीखीं थीं.

यह भी पढ़ें- 'मैंने पतियों को चीट करते पकड़ा है', श्वेता तिवारी का 'द ट्रेटर्स 2 के ट्रेलर में छलका दर्द

संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1966 में पद्मश्री से सम्मानित किया. इसी साल उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला. इसके अलावा, उन्हें रविंद्र भारती विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट की उपाधि और विश्व भारती विश्वविद्यालय से 'देशिकोत्तम' सम्मान भी दिया गया.

जीवन के अंतिम वर्षों में उनका स्वास्थ्य कमजोर रहने लगा. 1976 में उन्हें लकवा हुआ, जिसके बाद उनकी चलने-फिरने की क्षमता प्रभावित हुई. 18 मार्च 1977 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया.

Advertisement
Featured Video Of The Day
रांची प्रोटेस्ट पर गोलमोल जवाब, JMM MP को एंकर ने पाठ पढ़ा दिया !
Topics mentioned in this article
Songs
Classical Songs
Banaras Gharana