8 साल तक नहीं मिला काम, फिर 'तारक मेहता' के एक किरदार ने बदल दी किस्मत, इस एक्टर को आज असली नाम से कम पहचानते हैं लोग

'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' में अब्दुल का किरदार निभाने वाले शरद सांकला ने बताया कि एक समय ऐसा भी था, जब कई साल तक उनके पास काम नहीं था. फिर एक रोल ने उनकी किस्मत बदल दी और आज लोग उन्हें उनके असली नाम से ज्यादा अब्दुल के नाम से जानते हैं.

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'अब्दुल' बनकर मिली ऐसी पहचान कि लोग भूल गए असली नाम!
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किसी भी कलाकार के लिए सबसे मुश्किल दौर वह होता है, जब काम मिलने की उम्मीद धीरे-धीरे खत्म होने लगती है. कई बार सालों की मेहनत के बाद भी पहचान नहीं मिलती और अच्छे कलाकार भी गुमनामी में चले जाते हैं. लेकिन कभी-कभी एक सही मौका पूरी जिंदगी बदल देता है. ऐसा ही हुआ 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' में अब्दुल का किरदार निभाने वाले शरद संकला के साथ. आज लोग उन्हें उनके असली नाम से कम और अब्दुल के नाम से ज्यादा जानते हैं, लेकिन इस पहचान के पीछे करीब आठ साल का लंबा संघर्ष छिपा है.

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काम था नहीं, फिर आया जिंदगी बदलने वाला मौका

शरद संकला ने एक पॉडकास्ट में बताया कि 2001 से 2007 तक उन्होंने बहुत कम काम किया. इसके बाद भी उनके पास कोई खास काम नहीं था. उन्होंने बताया कि उस दौर में वह बेरोजगार थे और अच्छे मौके का इंतजार कर रहे थे. इसी बीच उनके एक दोस्त ने उनका नाम शो के निर्माता असित कुमार मोदी तक पहुंचाया और कहा कि शरद एक अच्छे अभिनेता हैं, उन्हें मौका मिलना चाहिए.

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ऑडिशन नहीं, सीधे मिला 'अब्दुल' का किरदार

शरद ने बताया कि उस समय ऑडिशन जैसी कोई प्रक्रिया नहीं हुई. असित कुमार मोदी ने उन्हें बुलाकर शो का कॉन्सेप्ट समझाया. उन्होंने बताया कि शो में अलग-अलग समुदायों के किरदार होंगे, लेकिन मुस्लिम किरदार नहीं है. ऐसे में उन्हें गोकुलधाम की सोडा शॉप चलाने वाले सीधे-सादे अब्दुल का रोल ऑफर किया गया. शरद कहते हैं कि उस समय उनके पास ज्यादा काम नहीं था, इसलिए उन्होंने बिना देर किए यह रोल स्वीकार कर लिया और वही फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन गया.

आज भी लोग कहते हैं, 'अब्दुल मियां कैसे हो?'

शरद संकला कहते हैं कि उन्हें इस बात की खुशी होती है कि लोग उन्हें अब्दुल के नाम से पहचानते हैं. परिवार और करीबी लोग भले ही उन्हें शरद कहकर बुलाते हों, लेकिन बाहर निकलते ही लोग अक्सर कहते हैं, "अब्दुल मियां, कैसे हो?" उनके मुताबिक, जब कोई किरदार लोगों के दिल में इतना बस जाए कि वे कलाकार का असली नाम ही भूल जाएं, तो उससे बड़ी कामयाबी किसी अभिनेता के लिए शायद ही हो सकती है.

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शरद मानते हैं कि जिंदगी में वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता. कभी काम की कमी होती है, तो कभी लगातार मौके मिलने लगते हैं. उनका कहना है कि मुश्किल दौर में धैर्य रखना सबसे जरूरी होता है. शायद यही वजह है कि सालों तक काम न मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और इसके बाद मिल एक रोल ने उन्हें घर-घर में पहचान दिला दी.

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