एक केस, कई राज और जबरदस्त ट्विस्ट, कोर्टरूम ड्रामा पर बनीं हैं ये 5 फिल्में, आखिरी तक नहीं हटेगी स्क्रीन से नजर

Five Bollywood Movies on Courtroom Drama: बॉलीवुड में कई कोर्टरूम डामा पर फिल्में बन चुकी हैं. कुछ फिल्में अपनी कहानी और सस्पेंस को लेकर हमेशा सुर्खियों में रहती हैं. आज हम आपको बॉलीवुड की ऐसी ही पांच फिल्मों के बारे में बताने जा रहे हैं.

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एक केस, कई राज और जबरदस्त ट्विस्ट, कोर्टरूम ड्रामा पर बनीं हैं ये 5 फिल्में

Five Bollywood Movies on Courtroom Drama: भले ही दर्शकों के रूप में हमने अलग-अलग जॉनर का सिनेमा देखा हो, लेकिन कोर्टरूम ड्रामा का मज़ा हमेशा से सबसे अलग रहा है. ये फिल्में और सीरीज हमें अपनी सीटों से बांधे रखती हैं और कहानी में पूरी तरह से इन्वॉल्व कर देती हैं. दमदार डायलॉग्स, तीखी अदालती बहसें और लगातार आने वाले ट्विस्ट्स इन कहानियों को ट्रेडिशनल स्टोरीटेलिंग से बिल्कुल जुदा बनाते हैं. वैसे तो सालों से कई बेहतरीन कोर्टरूम ड्रामा बने हैं, जैसे हाल ही में आई सीरीज 'सिस्टम', जिसे दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है लेकिन आइए डालते हैं एक नज़र उन चुनिंदा कोर्टरूम ड्रामाज़ पर जिन्होंने सिनेमा की दुनिया में सबसे गहरा असर छोड़ा है.

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दामिनी

​साल 1993 में रिलीज़ हुई 'दामिनी' वाकई भारतीय सिनेमा के इतिहास में अब तक के सबसे प्रभावशाली कोर्टरूम ड्रामाज़ में से एक है. फिल्म की कहानी दामिनी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने देवर और उसके दोस्तों द्वारा अपनी हाउसकीपर के साथ किए गए उत्पीड़न की चश्मदीद गवाह बनती है. समाज और परिवार के भारी विरोध और कई बड़ी चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, वह अपने पति और एक वकील गोविंद के सहयोग से न्याय पाने के लिए डटकर संघर्ष करती है. मीनाक्षी शेषाद्रि, ऋषि कपूर, अमरीश पुरी, सनी देओल, कुलभूषण खरबंदा और परेश रावल जैसे बेहतरीन कलाकारों से सजी इस फिल्म को बॉलीवुड में बनी अब तक की सबसे शानदार महिला-केंद्रित फिल्मों में गिना जाता है, जिसे आज एक कल्ट क्लासिक का दर्जा हासिल है.

सिस्टम

​अश्विनी अय्यर तिवारी के निर्देशन में बनी 'सिस्टम' में सोनाक्षी सिन्हा, ज्योतिका और आशुतोष राणा मुख्य भूमिकाओं में हैं. कहानी पर नज़र डालें तो तनाव तब बढ़ जाता है जब एक मशहूर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की हत्या हो जाती है, जो नेहा को एक बेहद चुनौतीपूर्ण कानूनी लड़ाई में खींच ले जाती है. अपने करियर का यह बेहद महत्वपूर्ण 10वां केस जीतने और सिस्टम के पीछे छिपे अन्याय का पर्दाफाश करने के लिए नेहा, सारिका के साथ हाथ मिलाती है. यह फैसला उसे कोर्टरूम के भीतर अपने ही पिता और बेहद रसूखदार व मशहूर डिफेंस अटॉर्नी रवि राजवंश के खिलाफ आमने-सामने खड़ा होने पर मजबूर कर देता है. फिल्म में सोनाक्षी, ज्योतिका और आशुतोष की ऐसी कमाल की तिकड़ी देखने को मिलती है जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी और सभी ने इसमें अपनी बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है. दर्शकों से भरपूर प्यार बटोर रही 'सिस्टम' एक बेहद आकर्षक कोर्टरूम ड्रामा है, जो दर्शकों पर अपनी एक अलग छाप छोड़ता है.

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जय भीम

साल 2021 में आई 'जय भीम' टी. जे. ज्ञानवेल द्वारा निर्देशित एक बेहद प्रशंसित भारतीय तमिल-भाषा की लीगल ड्रामा फिल्म है. इस फिल्म में सूर्या मुख्य भूमिका में हैं, जिनके साथ लिजोमोल जोस और मणिकंदन ने बेहद दमदार अभिनय किया है. यह कहानी एक बहादुर एक्टिविस्ट-वकील के इर्द-गिर्द घूमती है, जो न्याय के लिए तब कानूनी जंग छेड़ता है जब चोरी के झूठे आरोप में फंसाया गया एक गरीब आदिवासी व्यक्ति पुलिस हिरासत से अचानक लापता हो जाता है. जहाँ इस फिल्म को देश भर से अपार प्यार और सराहना मिली, वहीं यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में अब तक के सबसे प्रभावशाली कोर्टरूम ड्रामाज़ में से एक बनकर उभरी.

सेक्शन 375

​साल 2019 में रिलीज़ हुई और अजय बहल द्वारा निर्देशित 'सेक्शन 375' एक बेहतरीन कोर्टरूम ड्रामा फिल्म थी, जिसमें अक्षय खन्ना, ऋचा चड्ढा, मीरा चोपड़ा और राहुल भट्ट ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थीं. यह फिल्म भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 पर आधारित है और रोहन खुराना नाम के एक मशहूर फिल्म मेकर की कहानी बयां करती है, जिस पर एक जूनियर कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर अंजलि डांगले द्वारा बलात्कार का आरोप लगाया जाता है, और बाद में सेशंस कोर्ट द्वारा उसे दस साल जेल की सज़ा सुनाई जाती है. कलाकारों के दमदार अभिनय से सजी यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मोहक और बांधकर रखने वाले कोर्टरूम ड्रामाज़ में से एक है.

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​पिंक

​साल 2016 में आई 'पिंक' का निर्देशन अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने किया था और इसमें अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी, एंड्रिया तारियांग, अंगद बेदी, तुषार पांडे, पीयूष मिश्रा और धृतिमान चटर्जी जैसे कलाकारों ने काम किया था. इस फिल्म की कहानी दिल्ली में रहने वाली तीन कामकाजी महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें एक जानलेवा हमले के मामले में झूठा फंसा दिया जाता है. तब उनकी ढाल बनकर एक बीमार और रिटायर्ड वकील कोर्ट में उनका केस लड़ने आता है, जो अदालती बहस के दौरान भारतीय समाज में गहराई तक समाई महिला-विरोधी मानसिकता और पाखंड का पर्दाफाश करता है. जहाँ इस फिल्म को देश-विदेश में समीक्षकों की भारी सराहना मिली, वहीं इसने 'अन्य सामाजिक मुद्दों पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म' का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी अपने नाम किया.

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