पंजाब में लोगों ने फिल्म सतलुज को सेवा बना लिया है. गांव-गांव में लोग प्रोजेक्टर लगाकर इसे दिखा रहे हैं. फिल्म को लेकर काफी विवाद और चर्चा चल रही है. फिल्म 3 जुलाई को रिलीज हुई थी और 5 जुलाई को ZEE5 से हटा दी गई. एनडीटीवी ने फिल्म के अभिनेता सुरविंदर विक्की से खास बातचीत की, जो फिल्म में एक पुलिस अधिकारी का रोल निभा रहे हैं. नीचे पढ़ें सुरविंदर विक्की के साथ बातचीत के अंश:-
प्रशांत: सुरविंदर जी, फिल्म सतलुज 3 जुलाई को रिलीज हुई और सिर्फ 2 दिन बाद ZEE5 से हटा दी गई. 3 साल की मेहनत के बाद फिल्म आई और अचानक हटा दी गई. उस समय आपकी क्या भावनाएं थीं?
सुरविंदर: देखिए, यह पूरी तरह अनएक्सपेक्टेड था. फिल्म रिलीज होने की किसी को खबर नहीं थी — हनी सर और प्रोड्यूसर्स को छोड़कर शायद हमें भी नहीं. हमें तो बस इधर-उधर से पता चला कि फिल्म आ रही है. अंदर से बहुत खुशी हुई. लेकिन फिल्म उतरते ही सब कुछ अचानक खत्म हो गया.कुछ ऐसा कुछ एक्सपेक्टेशन नहीं थी कि ऐसा कुछ होने वाला है तो यह एक्सपेक्ट कर रहे थे कि भाई ठीक है फ़िल्म चाहे ओटीटी पर आई है तो लगा की अब यह जैसे एक प्रॉपर्टी बनके रह जाती है ना कि अब हमेशा ओटीटी पर पड़ी रहेगी तो मैं बहुत खुश था कि यार मैं तो ईवन जो बाहर भी कोई रिश्तेदार है उनसे सबसे बात कर रहा था कि भाई चिंता मत करो, फ़िल्म तो है ही, है ना? ZEE5 पर तो कभी भी देखी जा सकती है. तो थोड़ा अचंभा तो हुआ की यह क्या हो गया तो उस तरह का एक रिएक्शन था.
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प्रशांत: लेकिन विदेश में तो फिल्म उपलब्ध है. बहुत से लोग देख रहे हैं. आपके विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों ने फिल्म देखी? उनकी प्रतिक्रिया कैसी रही?
सुरविंदर: हां, विदेश में बहुत प्यार मिल रहा है. फिल्म की पहले से ही काफी हाइप थी. लोग सालों से इंतजार कर रहे थे. पंजाब 95 के नाम से जब से चर्चा शुरू हुई, तब से अखबारों और इंटरव्यूज में बनी रही. भारत में तो आप देख ही रहे हैं पंजाब में गांवों में लोग प्रोजेक्टर लगाकर फिल्म दिखा रहे हैं. बठिंडा इलाके में लोगों ने गांव बांट लिए. कोई कहता है ये गांव मेरे, ये तेरे. जैसे गुरुपर्व या त्योहार पर सेवा लगती है कोई पानी देता है, कोई लंगर, कोई जूते साफ करता है वैसे ही लोग फिल्म दिखाने की सेवा कर रहे हैं. सच में यह फिल्म सेवा बन गई है.
सुविंदर: नहीं बिल्कुल बहुत ज्यादा प्यार मिल रहा है फिल्म को और जैसे मैंने पहले कहा कि फ़िल्म की काफी ज्यादा हाइप क्रिएट थी और लोगों को इंतजार बहुत था, फ़िल्म मीडिया के थ्रू अखबारों में, खबरों में, चर्चा में तो रही है, मतलब जब इनिशियली पंजाब 95 के नाम से थी तो हमेशा बनी रही है चर्चा में कुछ ना कुछ इंटरव्यूज हनी के या मेकर्स की तरफ से या कभी-कभार हमसे भी पूछा गया . इन फैक्ट जब मेरा कोई भी शो के लिए मैं प्रमोशन के लिए जाता था तो 95 की बात होती थी हमेशा, तो अच्छी प्रतिक्रिया रही है, बहुत बढ़िया ग्लोबली तो खैर बहुत ही ज्यादा और बाकी अपने देश में या पंजाब में, इंडिया में तो आप देख ही रहे हो कि किस तरह से अब तो शोज जो हैं इसके गांव में लोग प्रोजेक्टर्स के थ्रू दिखा रहे हैं और एक ना जैसे जब गुरपुरब या हम अगर इधर बात करें, कभी कोई त्योहार होता है सिक्खिज्म से जुड़ा हुआ तो ना एक सेवा लगती है. सेवा मतलब एक सब-सब कोई शबील की सेवा कर रहा है, पानी पिला रहा है, कोई लंगर की सेवा कर रहा है, कोई जूते साफ करने की सेवा तो यह भी लोग यहां मेरे को ऐसे सुनने में मिला कि कहीं किसी एरिया में बठिंडा साइड में, लोग अपने प्रोजेक्टर उठाकर गाँव में इस फ़िल्म को दिखा रहे हैं, उन्होंने गाँव बांट लिए है जैसे इतने गांव ये ये गांव मेरे और ये तेरे, यह मेरे, यह तेरे कि मैं सेवा लगा रहा हूं लाइक मतलब फिल्म दिखाने की. मतलब जैसे ये फिल्म एक सेवा बन गई है.
प्रशांत: एक चीज जो मैं पूछना चाहूंगा कि फिल्म क्योंकि उतार दी गई, इसलिए और ज्यादा चर्चा में आ गई. आपको लगता है कि इसकी वजह से फ़िल्म को और पब्लिसिटी मिल गई?
सुविंदर: हां, मतलब कह सकते हैं क्योंकि वही जब क्युरियोसिटी लोगों को हो जाती है जब किसी चीज की बार-बार हो रही हो और जो चीज ना मिले तो उसको तो फिर हर कोई कहता कि यार ये तो मैं पा के रहूंगा तो शायद यह चीज तो हो रही है.
प्रशांत: आपको कुछ इस बात का अंदाजा लगा कि क्या वजह रही फिल्म को हटाने के पीछे क्योंकि सिर्फ इंडिया से हटी, बाकी जगह से नहीं हटी है?
सुविंदर: नहीं-नहीं सर मुझे तो फ्रैंकली मतलब यह अब क्या इसके पीछे वजह हो सकती है, यह क्या कौन लोग हो सकते हैं, अब इस चीज का तो कोई किसी तरह से अंदाजा नहीं है. मतलब ऑफ एंड ऑन जब भी बात होती थी जब कभी मैं और हनी पाजी मिलते थे तो वही होता था कि पाजी कुछ नहीं समझ आ रहा मतलब वाकई समझ से बाहर ही थी चीज कि हो क्या रहा है, मतलब ऐसा क्या गुनाह हो गया इस फिल्म को बना के कि फिल्म जिन लोगों के लिए बनाई है उन लोगों तक ही नहीं पहुंच रही, जो एक्चुअल प्रॉपर्टी तो उनकी है ना यह, कला पर अब किसी का अधिकार तो है नहीं किसी एक की एक छत्र राज वाली बात तो है नहीं कि भाई यह मेरी चीज है, यह फ़िल्म तो लोगों के लिए है, मासेस का मीडिया है तो जो कहानी कह रही है फिल्म या जो चीज बताना चाह रही है तो उन तक तो पहुंचनी चाहिए, तो नहीं पहुंची तो पता नहीं अब ऐसा इसके पीछे क्या कारण हो सकता है. इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है.
प्रशांत: लोग कह रहे हैं कि फ़िल्म एक पॉलिटिकल सवाल खड़ा कर रही है शायद यह एक वजह हो सकती है और आप खुद एक पुलिस वाले का किरदार निभा रहे हैं क्योंकि पुलिस के बारे में बहुत बोला गया है उस टाइम पर, बहुत अत्याचार हुए थे. तो क्या आपको यह किरदार करने के बाद ऐसा लगा कि अत्याचार जैसे लगा था और दूसरा बात ये कि क्या पॉलिटिकल सवाल उठा रही है फिल्म?
सुविंदर: जहां तक कैरेक्टर का सवाल है तो मतलब अगर मैं अपने पर्सनल लेवल पर यह चीज बोलूं तो क्योंकि पंजाब से जुड़ा हूं, मैं कहीं ना कहीं इस फिल्म का हिस्सा जरूर बनना चाहता था. हनी पाजी ने जब रोल बताया तो मैं बहुत उत्साहित था. मैंने कहा पाजी मुझे फ़िल्म करनी है मेरे को तो आप नहीं छोड़ना. मुझे इस फिल्म का हिस्सा होना मतलब अपने आप में एक बहुत गर्व और मान महसूस करने वाली बात है. एक्टर के तौर पर यह मेरे लिए बड़ा चैलेंज था. मैं पहले से ही दो-तीन पुलिस रोल कर रहा था. कोहरा और सतलुज की शूटिंग साथ-साथ चल रही थी. दिन में कोहरा, रात में यह फिल्म. मैंने कोशिश की कि दोनों रोल अलग-अलग लगें. अगर वो घटनाएं सच हुईं, तो यह अन्याय था. शूटिंग के बाद कभी-कभी मन में सोच आती थी कि यह फिल्म नहीं, असलियत है.
प्रशांत - लेकिन बतौर इंसान आप इस किरदार को कैसे देखते हैं या उस वक्त का जो पुलिस का रोल रहा उसको किस तरह से देखते हैं?
सुविंदर: देखिए, अगर सही मायने में यह चीज हुई है तो यह हैपनिंग्स हैं तो यह तो फिर मतलब आप यह समझो कि थोड़ा गलती हुआ है, यह तो एक अन्याय वाली बात है. वह कैरेक्टर करते हुए या करने के बाद एक सोच जरूर आती थी, एक एक्टर के तौर कि फिल्म सोचने को मजबूर करती है कि यही असलियत है ब्रो, यह हुआ है. तो वह कौन क्या महानता उन लोगों की जिन लोगों पर यह सख्ती हुई हैं. लेकिन फिर अगेन वह सिक्के के दो पहलू हैं. हम लोग तो काफी छोटे हुआ करते थे तब, 12 साल की उम्र थी मेरी. तो तब इतना तो अखबारों वगैरह में ही पढ़ते थे तो राइट बस यह है कि फिल्म ने इतना जरूर बता दिया कि भाई एक कहते हैं ना कि एक ऐसा हीरा और हीरो पंजाब में भी हैं जिनका नाम खालरा साहब है, तो जसवंत सिंह, जसवंत सिंह खालरा साहब जी.
प्रशांत -आखिरी दो चीज पूछूंगा. एक तो यह, कि जैसे मैंने पूछा था कि आपको लगता है कि इस फिल्म ने एक पॉलिटिकल सवाल खड़ा किया है और दूसरा यह कि हनी तराहानी बाकी लोगों से आपकी टीम में बात हुई और अब क्या आगे की रणनीति है?
सुविंदर: एक्चुअली पर्सनली तो हम लोग रणनीति में क्या ही पार्टिसिपेशन करेंगे, बस यह है कि लोगों से इतनी अपील है और ज्यादा से ज्यादा क्योंकि यह समझ लो आज के यूथ का जिन लोगों को नहीं पता या जिनको पता भी है, वह कोई किसी के दुखती रग पर हाथ रखने के लिए फिल्म नहीं बनी, और मैं समझता हूं कि आज का जो वक्त है यार मेरे ख्याल से हर कोई इतना ज्यादा कैपेबल है. मतलब पुराने जख्म हरे हो जाएंगे, नहीं ऐसा नहीं है . वह हो चुका है, मतलब उसकी सोच है, यादें हैं. हम उस चीज का सामना कर सके. वह शक्ति वह वह एक इंस्टिंक्ट जो है, वह सब में है और जो आज का हमारा यूथ है जिनको इस तरह का अभी तक नहीं पता कि ऐसा भी कुछ हुआ है, तो उन लोगों तक यह चीज बस पहुंचेगी, बाकी रणनीति का तो क्या कोई ऐसा युद्ध या कोई लड़ाई वाली बात नहीं है.
प्रशांत - रणनीति से मतलब कि फिल्म को दोबारा रिलीज करने का सोच रही है फ़िल्म की टीम ?
सुरविंदर- सर ये प्रोड्यूसर्स का कॉल होगा. उनका सवाल है यह. और मेरे ख्याल से वह ही इसका बेहतर उत्तर दे पाएंगे