भारतीय सिनेमा में किसी किताब को बड़े पर्दे पर उतारना कोई नई बात नहीं है. लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो पर्दे पर आने के बाद भी अपनी रहस्यमयी गहराई नहीं खोतीं. सोचिए, एक ऐसा इंसान जिसे कभी लोग ठग मानते हैं, तो कभी संत का दर्जा दे देते हैं. प्यार, धोखा, पछतावा और खुद को जानने की तलाश से गुजरता उसका सफर दर्शकों को अंत तक तक बांधे रखता है. दिलचस्प बात यह है कि यह कहानी किसी फिल्म लेखक की कल्पना नहीं थी, बल्कि भारतीय साहित्य के एक फेमस उपन्यास से निकली थी. हम बात कर रहे हैं देव आनंद की सदाबहार फिल्म 'गाइड' की.
आर. के. नारायण के मशहूर उपन्यास पर आधारित थी फिल्म
1965 में रिलीज हुई 'गाइड' भारतीय सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में गिनी जाती है. यह फिल्म मशहूर साहित्यकार आर. के. नारायण के चर्चित उपन्यास 'द गाइड' (The Guide) पर आधारित थी. उपन्यास ने अपनी कहानी, किरदारों और सामाजिक संदेश के कारण साहित्य जगत में बड़ी पहचान बनाई थी. फिल्म की कहानी एक पूर्व टूर गाइड राजू के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी जिंदगी कई उतार-चढ़ाव से गुजरती है. फिल्म में देव आनंद ने राजू गाइड, जबकि वहीदा रहमान ने रोजी का किरदार निभाया है.
राजू गाइड की जिंदगी में मोड़ तब आता है, जब मार्को नाम का एक अमीर व्यक्ति अपनी पत्नी रोजी के साथ शहर आता है. मार्को अपने काम में इतना व्यस्त रहता है कि रोजी को नजरअंदाज करता है. इसी दौरान राजू और रोजी एक-दूसरे के करीब आते हैं. रोजी को डांस करने का शौक होता है, लेकिन मार्को इसे अपनी बेइज्जती समझता है. इसके बाद रोजी और मार्को का तलाक हो जाता है. इस बीच रोजी आत्महत्या करने की कोशिश करती है लेकिन राजू उसे बचा लेता है. राजू रोजी को अपने घर ले आता है और समाज की परवाह किए बिना उसे एक मशहूर डांसर बना देता है. रोजी बहुत बड़ी स्टार बन जाती है और दोनों अमीर हो जाते हैं. लेकिन इसके साथ ही, राजू के मन में लालच, शराब की लत और अहंकार आ जाता है.
सफलता के नशे में राजू रोजी पर अपना हक जताने लगता है और दोनों के बीच दूरियां आ जाती हैं. गुस्से में आकर, राजू अनजाने में रोजी के डॉक्युमेंट्स पर जाली साइन कर देता है. इस जुर्म में उसे जेल हो जाती है. अंत में जेल से छूटने के बाद राजू अपने घर जाने के बजाय एक गांव में भटकता हुआ पहुंचता है. वहां के लोग उसे साधु समझ लेते हैं. राजू धीरे-धीरे उनकी इस भावना को स्वीकार कर लेता है और लोगों के दुख दूर करने लगता है. जब गांव में भारी सूखा पड़ता है, तो लोग राजू से बारिश के लिए व्रत रखने की प्रार्थना करते हैं. राजू बिना कुछ खाए 11 दिनों का कठिन उपवास रखता है. इस दौरान कमजोरी के बावजूद राजू शांति का अनुभव करता है और कहानी के अंत में बारिश के साथ-साथ उसकी मृत्यु को दिखाया जाता है.
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विजय आनंद का मास्टरपीस, लेकिन सवाल भी उठे
इस फिल्म के डायरेक्टर विजय आनंद थे, जिन्हें उनकी शानदार कहानी कहने की शैली और बेहतरीन स्क्रीनप्ले के लिए जाना जाता है. वहीं, एस. डी. बर्मन का म्यूजिक और शैलेन्द्र के गीत आज भी म्यूजिक लवर्स की पसंद बने हुए हैं. "आज फिर जीने की तमन्ना है", "गाता रहे मेरा दिल" और "तेरे मेरे सपने" जैसे गीत आज भी सदाबहार माने जाते हैं.
हालांकि 'गाइड' को क्रिटिक्स और दर्शकों से जबरदस्त सराहना मिली, लेकिन साहित्य प्रेमियों का एक वर्ग मानता है कि फिल्म मूल उपन्यास के साथ पूरी तरह न्याय नहीं कर पाई. कई आलोचकों का मानना था कि आर. के. नारायण के उपन्यास में हर किरदार के व्यक्तित्व में कई परतें और ग्रे शेड्स थे, जिन्हें मेकर्स बड़े पर्दे पर उतारने में कामयाब नहीं हो पाए.
भले ही फिल्म और उपन्यास के बीच तुलना होती रही हो, लेकिन 'गाइड' भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है. दमदार एक्टिंग, शानदार संगीत और गहरी कहानी ने इसे एक ऐसी क्लासिक बना दिया, जिसे आज भी नई पीढ़ी उतने ही उत्साह से देखती है.