शोले की धन्नो को जाएंगे भूल, जब सुनेंगे 49 साल पुराना ये गाना, फिल्म नहीं कर पाई कमाल, लेकिन आरडी बर्मन की आवाज ने बनाया सदाबहार

बॉलीवुड में कई फिल्में अपनी कहानी के लिए नहीं बल्कि अपने गानों के लिए जानी जाती हैं. आज हम आपको एक ऐसे ही गाने के बारे में बताएंगे जो 49 साल बाद भी अपना जादू बिखेरे हुए है.

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49 साल पहले आया ऐसा गाना, जिसने फिल्म को दिलाई थी पहचान

बॉलीवुड में हर साल न जाने कितनी फिल्में आती हैं, कितने गाने रिलीज होते हैं. लेकिन हर फिल्म हिट हो या हर गाना हिट हो जाए ऐसा जरूरी नहीं होता है. कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो बॉक्स ऑफिस पर अपनी कहानी से ज्यादा अपने गानों के लिए जानी जाती हैं. आज हम आपको एक ऐसी ही फिल्म के बारे में बताएंगे जो आज से 57 साल पहले 1977 में आई थी. फिल्म का नाम था 'किताब'. इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं किया था, लेकिन इस फिल्म का एक गीत आज भी पसंद किया जाता है. 

आरडी बर्मन ने गाया था ये गाना

किताब फिल्म का गाना 'धन्नों की ऑखों में है रात का सुरमा' लोगों ने पसंद किया था. इस गाने के बोल गुलजार साहब ने लिखे थे. इस गीत को संगीत आर.डी. बर्मन ने दिया था और उन्हीं ने इस गाने को गाया था. उनके शानदार आवाज ने इस गाने को सदाबहार बना दिया था. 

क्या थी फिल्म की कहानी

किताब फिल्म की कहानी की बात करें तो गुलजार जी ने ही इस फिल्म को लिखा और डायरेक्ट किया था. ये फिल्म एक बच्चे की इर्द-गिर्द घूमती है. जो पढ़ाई करने के लिए अपनी बहन के पास शहर जाता है. लेकिन पढ़ाई में मन न लगने की वजह से उसको डांट पड़ती है. इसी तरह फिल्म का कहानी आगे बढ़ती है. पढ़ाई से मन चुराकर वो वापस गांव भागने की कोशिश करता है, लेकिन उसके साथ रास्ते में कुछ ऐसा हो जाता है कि वो वापस शहर लौट आता है और मन लगाकर पढ़ाई करने का वादा करता है. 

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इस फिल्म में बाबला का किरदार राजू श्रेष्ठा ने निभाया है. उनकी बालपन का अदाएं और शरारतें लोगों को पसंद आई थी. 

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