41 साल पुराना वो गाना फौजी मिथुन चक्रवर्ती ने डफली बजाकर बताया था दिल का हाल, लता मंगेशकर-शब्बीर कुमार की आवाज ने बनाया अमर

मिथुन चक्रवर्ती का 41 साल पुराना ये गाना चार दशकों से दर्द भरे दिलों का सहारा बना हुआ है. गुलजार के लिखे बोलों ने दिल की गहराई को ऐसे छुया कि ये गाना आज भी लोगों की प्लेलिस्ट में शामिल है.

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41 साल पुराना मिथुन चक्रवर्ती का गाना, जो आज भी सदाबहार
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नई दिल्ली:

41 Year Old Mithun Chakraborty Song: हिंदी फिल्मों के गानों में बड़े बड़े शायरों और कवियों की रचनाओं को अक्सर जगह मिली है. खासतौर से गोल्डन एरा की फिल्मों में तो इनका खास योगदान रहा है. यही वजह है कि कई गाने ऐसे हैं जिनके बोल आपको बिना किसी डिक्शनरी के शायद समझ ही ना आएं. 1985 में आई फिल्म गुलामी में भी एक गाना कुछ इसी तरह का था. मिथुन चक्रवर्ती का ये गाना आज भी खूब सुना जाता है लेकिन फिर भी इसका मतलब और इसके लिरिक्स कोई एक बार में सही बोल जाए तो वो अपने आप में किसी धुरंधर से कम नहीं. हम जिस गाने की बात कर रहे हैं वह अमरी खुसरो की एक पुरानी फारसी-उर्दू रचना से निकला है. 

कौनसा है ये गाना जिसकी गुत्थी सुलझाना हो जाता है मुश्किल?

मिथुन चक्रवर्ती के जिस गाने की हम बात कर रहे हैं वो है जिहाल-ए-मिस्कीं. यह गाना लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार की आवाज में है. इस गाने को संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया था और इसके बोल गुलजार ने लिखे थे. यह गाना अमीर खुसरो की एक पुरानी फारसी-उर्दू रचना से प्रेरित है. गुलजार ने इसे फिल्म के लिए फिर से लिखा. गाने की शुरुआती लाइनों का भाव कुछ ऐसा है: जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन बा-रंजिश, बहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है. इसका मतलब है मेरे बेचारे दिल की हालत पर नाराजगी या दुश्मनी से मत देखो. यह दिल जुदाई के दर्द से अभी भी घायल और बेहाल है. जिसकी धड़कन सुनाई देती है, वह तुम्हारा दिल है या मेरा?

यह गाना प्रेम, जुदाई, शर्माहट, हल्की खुशी और हल्के गम का मिक्स है. शाम हसीन हो जाती है जब प्रेमी पास होता है, लेकिन दिल थोड़ा उदास भी हो जाता है. आंखें मिलते ही झुक जाती हैं, पलक से गिरती ओस आंखों में रुक जाती है. ये सब प्रेम की नाजुक और गहरी भावनाओं को दिखाता है. फिल्म में यह गाना मिथुन चक्रवर्ती और अनीता राज पर फिल्माया गया है. राजस्थान की खूबसूरत लोकेशन (जोधपुर के आसपास, मंडोर गार्डन, पंचकुंडा की छतरियां) पर शूट हुआ यह गाना आज भी बहुत पॉपुलर है.

फिल्म “गुलामी” की कहानी

डायरेक्टर जे.पी.दत्ता की पहली फिल्म गुलामी (1985) राजस्थान के एक गांव (फतेहपुर के आसपास) में जाति-व्यवस्था, जमींदारी और शोषण के खिलाफ किसानों के विद्रोह की कहानी है. धर्मेंद्र रंजीत सिंह चौधरी का किरदार निभाते हैं. एक जाट किसान का बेटा जो बचपन से ही अन्याय के खिलाफ बगावत करता है. गांव में ठाकुर जमींदार परिवार किसानों को पीढ़ियों से कर्ज में जकड़े हुए है. कर्ज चुकाने के नाम पर जमीन, फसल और इज्जत सब छीन ली जाती है. रंजीत शहर चला जाता है, लेकिन पिता की मृत्यु पर वापस आता है. उसे पता चलता है कि पिता के कर्ज की वजह से अब उसकी जमीन भी जब्त होने वाली है. वह कर्ज चुकाने से इनकार कर देता है और विद्रोह शुरू कर देता है.

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मिथुन चक्रवर्ती एक सेना के जवान (जब्बर) के रूप में रंजीत का साथ देते हैं. कुलभूषण खरबंदा हवलदार गोपी दादा का किरदार निभाते हैं. स्मिता पाटिल (सुमित्रा) ठाकुर की बेटी हैं जो रंजीत से प्यार करती हैं, लेकिन परिवार के दबाव में पुलिस अधिकारी (नसीरुद्दीन शाह) से शादी कर लेती हैं. रीना रॉय, रंजीत की पत्नी मोरन के रूप में हैं. फिल्म में किसान ठाकुरों के कर्ज के खातों को जलाने और सदियों पुरानी गुलामी से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष करते हैं. इसमें प्यार, बलिदान, अन्याय और विद्रोह की कहानी है. अमिताभ बच्चन ने फिल्म की कथा सुनाई थी.

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यह गाना और फिल्म दोनों ही उस दौर की याद दिलाते हैं जब बॉलीवुड सामाजिक मुद्दों को मजबूत कहानियों और यादगार संगीत के साथ पेश करता था. लता जी की आवाज में “जिहाल” शब्द सुनते ही दिल में एक अलग ही एहसास जाग उठता है. यही इसकी असली ताकत है.

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