अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के चीफ गुप्त यात्रा पर रूस क्यों गए थे?
रैटक्लिफ की मॉस्को यात्रा से जुड़े कई पेचीदा पहलू उन दो नेताओं के बीच असाधारण रिश्तों में एक दिलचस्प नया मोड़ लाते हैं, जो एक जैसी रणनीतिक उलझन का सामना कर रहे हैं और जो उनकी विरासत तय कर सकती है.
अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA के डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ इस हफ्ते मॉस्को पहुंचे.इस बारे में सीआईए की तरफ से तो कुछ नहीं बोला गया है पर अलग-अलग रिपोर्ट में इसको लेकर बात की गई है. खबरों के मुताबिक, रूसियों को यह बताने के लिए कि वे यूक्रेन में अपनी बुरी तरह नाकाम हो रही जंग हार रहे हैं तो उनके मेजबानों ने निश्चित रूप से इस बात की विडंबना को समझा होगा.
रूसी जासूसी एजेंसियों के प्रमुखों ने शायद यह बात भी उठाई होगी कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तरह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी एक ऐसी जंग में फंसे हुए हैं ईरान के साथ जिसे न तो वह जीत सकते हैं और न ही खत्म कर सकते हैं. अलग-अलग संघर्षों में शामिल दो नेताओं के सामने एक जैसी मुश्किल है: वे युद्ध में अपने मकसद पूरे नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन वे पीछे हटकर अपनी इज्जत भी नहीं बचा सकते.
जानी दुश्मन एक जैसे हालात
दोनों ने अपने दुश्मनों की मजबूती और क्षमता को कम आंका और लड़ाई शुरू कर दी, जबकि उन दुश्मनों की सेनाएं अमेरिका और रूस की पारंपरिक ताकत और हथियारों के मुकाबले बहुत कमजोर थीं. पुतिन और ट्रंप, दोनों ने देखा कि यूक्रेन और ईरान के 'अपरंपरागत' और 'असममित' तरीकों ने उनके रणनीतिक सैन्य फायदे को कमजोर कर दिया. इन देशों ने ड्रोन जैसी सस्ती नई तकनीकें अपनाईं और युद्ध के एक नए दौर की शुरुआत की. रैटक्लिफ़ की यात्रा के बारे में अपनी रिपोर्ट में, 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने वॉशिंगटन के विदेश नीति समुदाय में लंबे समय से चली आ रही एक चिंता का ज़िक्र किया: पुतिन को युद्ध की दिशा के बारे में सही जानकारी नहीं मिल रही है. कई जानकारों को यह भी लगता है कि ईरान के मामले में ट्रंप का यह सोचना कि अमेरिका की जीत होगी, कहीं इसलिए तो नहीं है कि उनके करीबी लोग उन्हें बुरी खबरें नहीं देना चाहते?

वॉशिंगटन और मॉस्को के लिए महंगे विदेशी झगड़ों में उलझना कोई नई बात नहीं है; उदाहरण के लिए, दोनों ही अफगानिस्तान में हुई लड़ाइयों में बुरी तरह नाकाम रहे थे. यूक्रेन में रूस की बर्बादी कुछ-कुछ वियतनाम में अमेरिका की हार की याद दिलाती है. फिर भी, उन दो मज़बूत नेताओं के बीच समानताएं — जो अब खुद शुरू की गई लड़ाइयों में फंसे हुए हैं — भले ही सही हों, लेकिन वे एक हद तक ही लागू होती हैं.
ट्रंप ने पुतिन की उस गंभीर गलती को नहीं दोहराया जिसमें उन्होंने जमीनी सैनिकों को एक ऐसी मुश्किल स्थिति में झोंक दिया था — एक ऐसा फैसला जिसके कारण 'सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़' के अनुसार, 14 लाख से ज्यादा युवा रूसी या तो मारे गए, घायल हुए या लापता हो गए. पुतिन घरेलू हालात के मामले में ट्रंप की तुलना में कम बंधे हुए हैं. अमेरिका में इतना बड़ा नुकसान राजनीतिक रूप से बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
जबकि पुतिन मिसाइल और ड्रोन हमलों से यूक्रेन के शहरों और पावर प्लांट पर तबाही और मौत बरसा रहे हैं, वहीं ट्रंप ने अपनी जंग में आम नागरिकों और आम लोगों के काम आने वाले बुनियादी ढांचे को जान-बूझकर निशाना बनाने से काफी हद तक परहेज किया है. हालांकि, उन्होंने फरवरी में ईरान के एक स्कूल पर हुए मिसाइल हमले के बारे में पूरी सार्वजनिक जानकारी देने से इन्कार कर दिया है; इस हमले में लगभग 200 बच्चे और वयस्क मारे गए थे और ऐसा लगता है कि यह हमला पुरानी खुफिया जानकारी के इस्तेमाल का नतीजा था.
रैटक्लिफ का रूस का अचानक दौरा ऐसे समय में हुआ है जब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उथल-पुथल और चिंताजनक संकेत दिखाई दे रहे हैं; यूक्रेन और ईरान में चल रहे युद्धों के कारण पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता फैल रही है, दुनिया की बड़ी ताकतें इनमें उलझ रही हैं और भू-राजनीतिक टकराव के और बढ़ने का डर पैदा हो रहा है.
CIA चीफ का एजेंडा काफी बड़ा था
इस मामले की जानकारी रखने वाले दो लोगों ने CNN को बताया कि उन्होंने रूस को NATO के इलाके पर किसी भी खुले या छिपे हमले के खिलाफ चेतावनी दी. यूरोप में यह डर बढ़ रहा है कि पुतिन NATO की सुरक्षा व्यवस्था की परीक्षा ले सकते हैं. रैटक्लिफ ने रूसी खुफिया अधिकारियों के साथ अपनी बैठकों का इस्तेमाल रूस को ईरान को दी जा रही आर्थिक और सैन्य मदद रोकने के लिए मनाने में भी किया.

उनका यह मिशन अमेरिका के उन सहयोगियों को कुछ राहत दे सकता है जो लंबे समय से NATO और उसकी सुरक्षा गारंटी के प्रति ट्रंप की प्रतिबद्धता को लेकर चिंतित रहे हैं. और यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की अमेरिका की नई कोशिश का व्यापक रूप से स्वागत किया जाएगा, भले ही राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की की सरकार को दी जाने वाली सैन्य मदद में कटौती करने के राष्ट्रपति ट्रंप के फैसले से उनके इरादों पर शक पैदा होता हो. ट्रंप ने अभी तक उस प्रस्ताव पर कोई कदम नहीं उठाया है जो उन्होंने इस गर्मी में दिया था, जिसमें यूक्रेन को पैट्रियट एंटी-मिसाइल सिस्टम के उत्पादन का लाइसेंस देने की बात कही गई थी.
रूस कर रहा ईरान की मदद
ट्रंप ने एक बार दावा किया था कि वे 24 घंटे में यूक्रेन युद्ध खत्म कर सकते हैं, लेकिन शांति की उनकी कोशिशें बेनतीजा रही हैं. पुतिन शांति चाहते हैं, उनके इस बार-बार किए जाने वाले दावे को घटनाएं लगातार गलत साबित करती रही हैं. शुरुआत से ही अमेरिका यूक्रेन युद्ध में सीधे तौर पर शामिल नहीं रहा है, बल्कि दूर से ही अपनी भूमिका निभाता रहा है. वहीं, ईरान के मामले में रूस की अपनी अहम भूमिका रही है.
इस हफ्ते ईरान को लेकर अमेरिका की गलतियां खास तौर पर चर्चा में हैं, क्योंकि इस युद्ध को छह महीने पूरे हो चुके हैं और अमेरिकी प्रशासन अब सैन्य कार्रवाई के बजाय पूरी तरह से आर्थिक युद्ध की रणनीति अपना रहा है.
ईरान के मामले में ट्रंप की मुश्किलों को कम करने में रूस की शायद ही कोई रणनीतिक दिलचस्पी हो. यूक्रेन से जुड़ा कोई भी 'लेन-देन' वाला समझौता सफल नहीं हो पाएगा, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति पहले भी कीव को जमीन छोड़ने के लिए मजबूर करने में नाकाम रहे हैं.

मार्च में CNN ने रिपोर्ट किया था कि रूस ने ईरान को अमेरिकी सैनिकों, जहाजों और विमानों की लोकेशन और गतिविधियों के बारे में खुफिया जानकारी दी है. इस मामले से जुड़ी अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों की जानकारी रखने वाले कई लोगों ने यह बात बताई है. रूस ने ईरान के साथ जो ज्यादातर खुफिया जानकारी साझा की है, वह मॉस्को के एडवांस्ड सैटेलाइट नेटवर्क से ली गई तस्वीरें हैं.
पुतिन के पश्चिमी-विरोधी रुख का मतलब है कि रूस लगातार मिडिल ईस्ट और दूसरी जगहों पर अमेरिका और पश्चिमी देशों के असर का मुकाबला कर रहा है. हो सकता है कि वह ट्रंप के मुकाबले लंबी अवधि की रणनीति पर काम कर रहे हों, क्योंकि ट्रंप का कार्यकाल ढाई साल में खत्म हो जाएगा.
फिर भी, ईरान को पूरी तरह से आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की अपनी नई नीति के लिए वॉशिंगटन को मॉस्को — और बीजिंग — की मदद की जरूरत पड़ सकती है.
क्या नाटो देशों पर हमला करेंगे पुतिन
मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका के लिए यूरेशिया ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर फिरास मक्सद ने गुरुवार को CNN इंटरनेशनल को बताया, "आर्थिक दबाव का असर दिखाने के लिए, (ट्रंप को) चीनियों, रूसियों और इलाके के दूसरे अहम देशों से सहयोग हासिल करना होगा, जो ईरान के मुख्य व्यापारिक साझेदार हैं. मुझे लगता है कि चीनियों का सहयोग हासिल करना उनके लिए बहुत मुश्किल होगा... रूस के मामले में भी स्थिति वैसी ही है."
गुरुवार को जब रैटक्लिफ की यात्रा के नतीजों पर गौर किया गया, तो 'वॉशिंगटन पोस्ट' ने खबर दी कि उनकी यात्रा से पहले अमेरिका को नई खुफिया जानकारी मिली थी. इस जानकारी से पता चलता है कि क्रेमलिन का मानना है कि ईरान युद्ध की वजह से अमेरिका कमजोर हो गया है. इस टकराव में निर्णायक जीत हासिल न कर पाने की वजह से न सिर्फ अमेरिका की साख को नुकसान पहुंचा है, बल्कि गोला-बारूद भी कम हुआ है और नौसेना व वायु सेना पर भी दबाव बढ़ा है. इसलिए, अगर रूस और चीन जैसे अमेरिका के विरोधी देश यूरोप या एशिया में किसी संकट का जवाब देने की वॉशिंगटन की क्षमता या दिलचस्पी पर सवाल उठाते हैं, तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी.

एरिजोना के डेमोक्रेटिक सीनेटर मार्क केली ने गुरुवार को CNN की ब्रियाना कीलर से कहा, "क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप ने बिना किसी रणनीतिक लक्ष्य, बिना किसी योजना, बिना किसी समय-सीमा और बिना किसी वापसी के रास्ते के ईरानियों के खिलाफ युद्ध छेड़ने का फैसला किया और अब वह फंस गए हैं — तो हां, निश्चित रूप से, इससे रूसियों को फायदा होता है. और वैसे, रूसी ईरानियों की मदद भी कर रहे हैं."
हालांकि, ट्रंप का तर्क है कि पुतिन के साथ उनके दोस्ताना रिश्तों से दुनिया ज्यादा सुरक्षित है. उन्होंने गुरुवार को जोर देकर कहा कि पुतिन के ऐसा कोई कदम उठाने का कोई खतरा नहीं है जिससे पश्चिम के साथ टकराव हो. ओवल ऑफ़िस में CNN की क्रिस्टन होम्स से उन्होंने कहा, "मेरी उनसे अच्छी बातचीत हुई है. वह NATO के किसी इलाके पर हमला नहीं करने वाले हैं."
फिर भी, रैटक्लिफ की मॉस्को यात्रा से जुड़े कई पेचीदा पहलू उन दो नेताओं के बीच असाधारण रिश्तों में एक दिलचस्प नया मोड़ लाते हैं, जो एक जैसी रणनीतिक उलझन का सामना कर रहे हैं और जो उनकी विरासत तय कर सकती है. ईरान के साथ युद्ध शायद ट्रंप के राजनीतिक और व्यक्तिगत अस्तित्व के लिए उतना अहम न हो, जितना यूक्रेन का टकराव पुतिन के लिए है. लेकिन क्रेमलिन में अपने दोस्त की तरह, वह भी अपने ही छेड़े गए युद्ध में घिर गए हैं.
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